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गुरुवार, 31 मार्च 2011

थेंक्स पाकिस्तान,कुछ मीठा हो जाएं ?

थेंक्स पाकिस्तान,कुछ मीठा हो जाएं ?

http://mktvfilms.blogspot.com/2011/03/blog-post_31.html
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स्पष्टता- यह केवल व्यंग्य-वार्ता है, किसी भी जाति विशेष का दिल दुखाने का, लेखक का कतई इरादा नहीं है । कृपया लेख के तत्व को, अपने माथे पर न ओढें..धन्यवाद ।

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सोहेब (सहवाग से)," छक्का लगा के दिखा?"


सहवाग (सचिन की ओर इशारा करके)," सामने तेरा बाप खड़ा है, उसे जाकर बोल..!!"


कमेन्टेटर- " और, सोहेब की गेंद पर, सचिन का ये बेहतरीन छक्का..!!"


( सभी दर्शक,खड़े होकर - `हो..हो..हो..हो.ओ..ओ..!!`)

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चम्पक और चम्पा नाचते-गाते हुए, स्टेज पर प्रवेश करते हैं ।

"लगा सचिन का छक्का,देखो गीलानी के माथे..!!
भागा शाहिद दुम दबाकर `शहीदों` से आगे..!!
हे..ई, ता..आ, थै..ई..या, थैया, ता...आ..आ थै..!!"

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चम्पा," हे..ई, चम्पक, हिंदुस्तान-पाकिस्तान का सेमी फ़ाइनल मैच तुने देखा क्या?"

चम्पक," ऐसा क्यों पूछती हैं, हमने साथ बैठ कर तो देखा था..!! भूल गई क्या?"

चम्पा," अरी बुद्धु, मैं तो ये पूछ रही थीं की, क्या तुमने मैच ध्यान से देखा था?"

चम्पक," हाँ भाई हाँ, ध्यान से ही देखना चाहिये ना?"

चम्पा," अच्छा? बोल, क्या-क्या देखा था?"

चम्पक,"हैं ना..आ..आ, पाकिस्तान की आख़िरी विकेट गिरी तब, वो, केटलकांड वाले शशीभाई, देश भ्रमण-मस्त राहुल बाबा, परम आदरणीय गंभीर-वदन सोनियाजी और दूसरे कई गणमान्य बड़े-बड़े महानुभवों को, नन्हे मुन्ने बच्चों को, खड़े होकर ताली बजाते देख, मुझे बहुत मज़ा आया ।"

चम्पा,"चम्पक, तुम तो, बुद्धु के बुद्धु ही रहे..!! ताली-ढोल-नगाड़ा-फटाकों का आनंद तो, खुशी से सारा देश एक साथ मना रहा था । इसमे नयापन क्या है?"

चम्पक," चम्पा-चम्पा, अब तु ही बता दे ना? मेच में, तुने क्या खास देखा?"

चम्पा,"हमारे गाँव में, बहुत पुराना भगवान श्रीभोलेनाथजी का एक मंदिर है । उस..में...!!

चम्पक,(चम्पा की बात काटते हुए ।)" मैच की बातों में मंदिर कहाँ से आ गया?"

चम्पा, " अगर बीच में बोला तो, मैं कुछ भी न बताउंगी..हाँ..!!"

चम्पक," अच्छा बाबा, बीच में नहीं टोकूंगा, अब तो बता?"

चम्पा," हमारे गाँव के मंदिर के पुजारी ४० साल के हो गये मगर बेचारे कुँवारे ही रह गये थे । उनको, पैसों के बदले में, शादी कराने वाला, कोई दलाल मिल गया और उसने ढेर सारे रुपये के बदले में पुजारी की शादी एक `दिग्विजया` नामक, बड़ी ही सुंदर कन्या से शादी करवा दी, पुजारी की शादी के जुलूसमें सारा गाँव उल्लासपूर्वक सामिल हुआ ।"


चम्पक," फिर..,फि..र, क्या हुआ?"


चम्पा," फिर क्या? सुहाग रात को पुजारी को पता चला की, दलाल ने उन्हें ठग लिया था और सुंदर कन्या से शादी रचाने के नाम पर, सुंदर `छक्का` हाथ में थमा दिया था..!!"

चम्पक," ही..ही..ही..ही.. ये तो.. ही..ही..ही..,बहुत बुरा हुआ..!! फिर क्या हुआ?"


चम्पा," सब गाँव वालों को जब पता चला, तब कई लोग अपनी हँसी न रोक पाए और कई समझदार लोगों ने अफसोस व्यक्त किया । किसी ने पुजारी से पूछा की वह अब क्या ये छक्के को तलाक दे देगा? तब पुजारी ने सिर्फ इतना ही कहा की, ये जो भी है, जैसा भी है..!! मेरे लिए दाल-रोटी बना देंगा तो, कम से कम मेरे पेट की भूख तो शांत होगी?"


चम्पक," ही..ही..ही, ये सब तो ठीक है पर, मेच की बात में पुजारी कहाँ से आ गया?"

चम्पा," अरी,मूर्ख, देख हमारे प्रधानमंत्रीजीने, पाकिस्तान के प्रधानमंत्रीजी को बैंड-बाजा-बारात के साथ `दिविजया` नामक सुंदर कन्या से शादी के लिए आमंत्रित किया?"

चम्पक," हाँ किया, तो..ओ..!!"

चम्पा," क्या, तो.ओ..!! फिर पाकिस्तान के प्रधानमंत्रीजी की शादी `दिग्विजया` नामक सुंदर कन्या के बजाय `पराजय` नामक बेहतरीन `छक्के` से करवाई ना..?"

चम्पक," हाँ..आँ..यार, तेरी बात तो बिलकुल सही है?"

चम्पा," ओर सुन, ३० मार्च की सेमी फ़ाइनल मेच के दो दिन बाद कौन सी तारीख आती है?"

चम्पक," पहली अप्रैल..!!"

चम्पा," अब पाकिस्तान के प्रधानमंत्रीजी, बैंड-बाजा-बारात से साथ, हिंदुस्तान में,`दिग्विजया` से शादी करने के,बडे अरमान लेकर आएं हो और यहाँ सबने उनको एडवांस में अप्रैल फूल बनाकर,शादी के नाम पर,`पराजय` नामक छक्का गले बांध दिया हो, ऐसे में पुरे देश में ढोल-नगाडे-फटाके और आनंदोत्सव का माहौल का होना स्वाभाविक ही तो है..!!"

चम्पक," वाह..रे..मेरी चम्पाकली, तुम तो बहुत ही अक़्लमंद गई हो ना..!! वाह..भाई..वाह..!!"

चम्पा," चम्पक, तुमने क्या, किसी देशवासी ने, ग़लती से भी, श्रीमती सोनियाजी को दोनों हाथ उपर करके कूदते हुए, राहुलबाबा को खुशी से चीखते हुए, और श्रीमनमोहनसिहजी को दंतावली दिखा कर हँसते, तालियाँ बजाते हुए, इतने बरसों में कभी देखा है?"

चम्पक," नहीं जी, कभी नहीं? सब खुश थे ।"

चम्पा,"तभी तो..!! हमारे क्रिकेट के सारे खिलाड़ियों ने पाकिस्तान को समझा दिया है की, अगर हमारा लाडला सचिन ज़िद करें की, यह मेरा आखिरी वर्ल्ड कप है और मुझे कप चाहिए । तो बिना ज्यादा प्रयत्न किए, हम सचिन के बच्चों को खेलने के लिए, वर्ल्ड कप का खिलौना भी आसानी से दिला सकते हैं । तो फिर..?"

चम्पक," फिर..? फिर क्या?"

चम्पा," सचिन की ज़िद पर हम उसे वर्ल्ड कप दे सकते हैं तो, हिंदु,मुस्लिम,सिख,ईसाई सारे देशभकत हिंन्दुस्तानीओं की ज़िद पर हम कश्मीर की एक इंच ज़मीन भी पाकिस्तान को लेने नहीं देंगे ।"

चम्पक," सही है,पर चम्पा ये तो बता?अब `पराजय` नामक छक्के से शादी तो पाकिस्तानी प्रधानमंत्रीजीने कर ली है, मगर उसे पाकिस्तान ले जाकर उसका क्या करेंगे?""


चम्पा," हाँ, बात तो सोचने वाली है..!! अब श्री युसूफ़ रझा गीलानीजी, `पराजय` को अपने घर में तो रखेंगे नहीं ? शायद पाकिस्तान जाकर उनकी सुप्रसिद्ध `हिरामंडी` बाजार में में दलालों के हवाले कर देंगे..!!"

चम्पक," ही..ही..ही..ही..ई..ई..ई..!!"

चम्पा," इतना हँस क्यों रहा है?"

चम्पक," अब मैं तूझे राज़ की एक बात बताऊं?"

चम्पा, "क्या?"

चम्पक," पाकिस्तानी प्रधानमंत्री युसूफ़ रझा गीलानीजी के हाथ में `छक्का` थमाने की साज़ीश में, सारे पाकिस्तानी ख़िलाडी शादी करानेवाले दलाल के साथ मिले हुए थे?"


चम्पा," हें..ई..ई..ई, शाबाश चम्पक, ये क्या कह रहा है?"

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" ANY COMMENT?"

मार्कण्ड दवेः दिनांक- ३१ मार्च २०११.
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बुधवार, 30 मार्च 2011

वह 28 साल के हैं, और मैं 25 की.......

http://3.bp.blogspot.com/_gCPx33D-x5s/THU0xx5QXbI/AAAAAAAAATw/GP9YfZ1Uxk4/s1600/090712061807_jinn_226.jpg
एक नवविवाहित युवक अपनी पत्नी को अपनी पसंदीदा जगहों की सैर करा रहा था, सो, वह पत्नी को उस स्टेडियम में भी ले गया, जहां वह क्रिकेट खेला करता था...

अचानक वह पत्नी से बोला, "क्यों न तुम भी बल्ले पर अपना हाथ आज़माकर देखो... हो सकता है, तुम अच्छा खेल पाओ, और मुझे अभ्यास के लिए एक साथी घर पर ही मिल जाए..."

पत्नी भी मूड में थी, सो, तुरंत हामी भर दी और बल्ला हाथ में थामकर तैयार हो गई...

पति ने गेंद फेंकी, और पत्नी ने बल्ला घुमा दिया...

इत्तफाक से गेंद बल्ले के बीचोंबीच टकराई, और स्टेडियम के बाहर पहुंच गई...

पति-पत्नी गेंद तलाशने बाहर की तरफ आए तो देखा, गेंद ने करीब ही बने एक सुनसान-से घर की पहली मंज़िल पर बने कमरे की खिड़की का कांच तोड़ दिया है...

अब पति-पत्नी मकान-मालिक की गालियां सुनने के लिए खुद को तैयार करने के बाद सीढ़ियों की तरफ बढ़े, और पहली मंज़िल पर बने एकमात्र कमरे तक पहुंच गए...

दरवाजा खटखटाया, तो भीतर से आवाज़ आई, "अंदर आ जाओ..."

जब दोनों दरवाजा खोलकर भीतर घुसे तो हर तरफ कांच ही कांच फैला दिखाई दिया, और उसके अलावा कांच ही की एक टूटी बोतल भी नज़र आई...

वहीं सोफे पर हट्टा-कट्टा आदमी बैठा था, जिसने उन्हें देखते ही पूछा, "क्या तुम्हीं लोगों ने मेरी खिड़की तोड़ी है...?"

पति ने तुरंत माफी मांगना शुरू किया, परंतु उस हट्टे-कट्टे आदमी ने उसकी बात काटते हुए कहा, "दरअसल, मैं आप लोगों को धन्यवाद कहना चाहता हूं, क्योंकि मैं एक जिन्न हूं, जो एक श्राप के कारण, उस बोतल में बंद था... अब आपकी गेंद ने इस बोतल को तोड़कर मुझे आज़ाद किया है... मेरे लिए तय किए गए नियमों के अनुसार मुझे खुद को आज़ाद करवाने वाले को आका मानना होता है, और उसकी तीन इच्छाएं पूरी करनी होती हैं... लेकिन चूंकि आप दोनों से यह काम अनजाने में हुआ है, इसलिए मैं आप दोनों की एक-एक इच्छा पूरी करूंगा, और एक इच्छा अपने लिए रख लूंगा..."

"बहुत बढ़िया..." पति लगभग चिल्ला उठता है, और बोलता है, "मैं तो सारी उम्र बिना काम किए हर महीने 10 करोड़ रुपये की आमदनी चाहता हूं..."

"कतई मुश्किल नहीं..." जिन्न ने कहा, "यह तो मेरे बाएं हाथ का खेल है..."

इतना कहकर उसने हवा में हाथ उठाया, और उसे घुमाते हुए बोला, "शूं... शूं... लीजिए आका, आपकी 10 करोड़ की आमदनी आज ही से शुरू..."

फिर वह पत्नी की तरफ घूमा, और शिष्ट स्वर में पूछा, "और आप क्या चाहती हैं, मैडम...?"

पत्नी ने भी तपाक से इच्छा बताई, "मैं दुनिया के हर देश में एक खूबसूरत बंगला और शानदार कार चाहती हूं..."

जिन्न ने फिर हवा में हाथ उठाया, और उसे घुमाते हुए बोला, "शूं... शूं... लीजिए मैडम, कागज़ात कल सुबह तक आपके घर पहुंच जाएंगे..."

...और अब जिन्न फिर पति की तरफ घूमा और बोला, "अब मेरी इच्छा... चूंकि मैं लगभग 200 साल से इस बोतल में बंद था, सो, मुझे किसी औरत के साथ सोना नसीब नहीं हुआ... अगर अब आप दोनों अनुमति दें, तो मैं आपकी पत्नी के साथ सोना चाहता हूं..."

पति ने तुरंत पत्नी के चेहरे की ओर देखा, और बोला, "अब हमें ढेरों दौलत और बहुत सारे घर मिल गए हैं, और यह सब तुम्हारी वजह से ही मुमकिन हुआ है, सो, यदि मेरी पत्नी को आपत्ति न हो, तो मुझे इसे तुम्हारे साथ बिस्तर में भेजने में कोई आपत्ति नहीं है..."

जिन्न ने मुस्कुराते हुए पत्नी की ओर नज़र घुमाई तो वह बोली, "तुम्हारे लिए मुझे भी कोई आपत्ति नहीं है..."

पत्नी का इतना कहना था कि जिन्न ने तुरंत उसे कंधे पर उठाया, और दूसरी मंज़िल पर एक बंद कमरे में ले गया, जहां पांच-छह घंटे तक पत्नी के साथ धुआंधार मौज की...

सब तूफान शांत हो जाने के बाद जिन्न बिस्तर से निकलता है, और कपड़े पहनता हुआ पत्नी से पूछता है, "तुम्हारी और तुम्हारे पति की उम्र क्या है...?"

पत्नी मुस्कुराते हुए बोली, "वह 28 साल के हैं, और मैं 25 की..."

जिन्न भी मुस्कुराते हुए तपाक से बोला, "इतने बड़े-बड़े हो गए, अब तक जिन्न-भूतों में यकीन करते हो, बेवकूफों..."

मंगलवार, 29 मार्च 2011

छींटाकशी -2

छींटाकशी - 2

कसम गीता और कुरान की ले,
गर सभी सच बोलें यहाँ,
तो वकीलों की जिरह की,
बँध रहा है क्यों समा ?
.................................

भीड़ से कतराए जो,
उनको ये मंशा दीजिए,
जाकर कहीं एवरेस्ट पर,
एक कमरा लीजिए.
......................................

भूख लगती है उसे तो,
दूध से नहलाइए,
एक कतरा मुँह न जाए,
अच्छी तरह धमकाइए.
.......................................

बालकों ने गर उधम की,
इसकी सजा उनको मिले,
मत भिड़ो के है मुसीबत,
ये लूटते हैं काफिले.
.........................................

घिस रहा हूँ मैं कलम,
कोइ तलवे घिस रहा,
रगड़ ली है नाक उसने,
खूँ न फिर भी रिस रहा.
.........................................

साल भर हम सो रहे थे,
एक दिन के वास्ते,
जागते ही ली जम्हाई,
और फिर हम सो गए.
.........................................

सोमवार, 28 मार्च 2011

रास्ता साफ है क्या...!!!!


गजोधर एक कंपनी में काम करते थे जहा पर उनकी ड्यूटी अक्सर रात की हुआ करती थी

एक रात गजोधर और उसकी पत्नी अपने बेडरूम में आराम से सो रहे थे,

और अचानक रात को दो बजे फोन की घंटी बजी...

दोनों की नींद खुल गई,

गजोधर ने फोन उठाया, इससे पहले कि वह कुछ कह पाता,

दूसरी तरफ से आवाज़ आनी शुरू हो गई, गजोधर सुनता रहा,

और अचानक चीखकर बोला, "साले, मैं क्या म्यूनिसिपैलिटी में काम करता हूं..."

जब चीख-चिल्लाकर गजोधर ने फोन पटक दिया,

पत्नी ने प्यार से पूछा, "कौन था, जानू...?"

गजोधर ने उखड़े सुर में जवाब दिया,

"पता नहीं, कौन कमीना था... साला, मुझसे पूछ रहा था, रास्ता साफ है क्या...?"

चड्डी सँभाल तोरी,नेताजी ।

चड्डी सँभाल तोरी,नेताजी ।

http://mktvfilms.blogspot.com/2011/03/blog-post_28.html
" इज़्ज़त  का  फालुदा  तेरा, जगह जगह  बिकता है ।
  लिज्ज़त लेकर, ईर्षालु देख, भीतर भीतर जलता है ।"


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प्यारे दोस्तों,

आजकल हमें तो बहुत ही मज़ा आ रहा है ..!!

विकिलीक्स का `चड्डी खींच, लिकेज कर अभियान`,  रोज़ नये-नये लोगों की चड्डी खींच रहा है और सभी, सम्माननीय महानुभव जो की आजतक दूसरों की `चड्डी की खींचतान` के अद्भुत नज़ारे का लुत्फ़ बड़े चाव से उठा रहे थे, वही लोग अब अपनी-अपनी चड्डी सँभालने में जुट गये हैं । ये तो वही बात हुई की..!!

" न खलु अक्षिदुःखितः अभिमुखे दीपशिखां सहते । "

अर्थात - नज़र का बीमार आदमी दीपशिखाकी रौशनी को सहन नहीं कर सकता ।   

`विक्रमोर्वशीयमम्` - महाकवि कालिदास ।

अब आप के मन में सवाल उठने वाला है की,"विकिलीक्स द्वारा जितने  नेताओं की चड्डी खींची गई है, उनको आइन्दा अपनी चड्डी सँभालने के बारे में क्या-क्या सावधानी बरतनी चाहिए?"


इसी संदर्भ में, मुझे बचपन का, हमारे गाँव का, एक क़िस्सा याद आ रहा है । मैं  करीब ६-७ साल का था । हमारे गाँव में एक विवाहित महिला का पति और सास-ससुर, उसे  दहेज़ के लिए हर क्षण प्रताड़ित करते रहते थे । विवाहिता को फटीचर साडीमें देखकर,उसी  गाँव में, खेतीबाडी करते, विवाहित महिला के पिता और भाई का दिल बहुत दुखता था । पर क्या करें?


एक बार त्योहार के मौके पर,वह महिला के पिता और भाई ने  उपहार के रुप में बेटी-बहन को नयी महँगी साड़ी दिलाई । अब वह विवाहिता की सास ने नयी अच्छी सी साड़ी देखकर, ज़बरदस्ती बहु से  साड़ी लेकर झट से, ये नयी महँगी साड़ी, पास ही में ब्याही अपनी बेटी को  भेंट कर दी । अपने पिता और भाई का दिया हुआ उपहार, अपनी ननन्द को देने से, फटेहाल साड़ी में लिपटी हुई, विवाहिता के मन को बहुत ग़हरी ठेस पहुँची ।


ससुर पक्ष को सबक सीखाने के लिए, वह ग़ुस्साई बहु ने बड़ा अजीब सा तरीक़ा अपनाया । फिल्म `राजा बाबू`में, विलन कॉमेडियन शक्ति कपूर ने पहनी थीं वैसी ही,अपने पति की लंबी, धूटनों तक पहुँचती  नाडा लटकी चड्डी (कच्छा) और पति का लंबा शर्ट पहनकर गाँव के दूसरे छोर पर, नदी से  पानी भरने के लिए, सिर पर घड़ा उठाए विवाहिता, सरे बाज़ार, गाँव की भीड़भाड़ भरी गलीओं के बीच होते हुए चल पड़ी ।


गाँव की बहु-बेटी की इज़्ज़त तार-तार करनेवाला, आधातजनक दृश्य देखकर सारा गाँव मारे शर्म के पानी-पानी हो गया । मामला गाँव की बहु-बेटी के संबंधित था, अतः  ये  मामला गाँव के प्रतिष्ठित पंच के पास पहुंचा, सारे गाँव के सामने पंचोने, इस विवाहिता की सासरीवालों को बहुत जमकर फटकार लगाई और आगे से अपनी बहु को बेटी मानकर, बहु को अच्छे से रखने का आदेश दिया । बहु की साड़ी पर हक़ जमाने वाले सासरीवालों की खुद की चड्डी बहु ने सरे आम खींची । बाद में बहु के साथ,समय रहते, सब कुछ अच्छा हो गया ।


पता नहीं..!! विकिलीक्सवाले जूलियन असांजे दुनियाभर के महान नेताओं की चड्डी खींच कर, उन चड्डीओं का क्या करना चाहते हैं ? हमें तो लगता है, विकिलीक्स के सारे दस्तावेज़ लिक हो जाने के बाद,जूलियन असांजे,  सारे महान, प्रातःस्मरणीय, आदरणीय इंटरनेशनल नेताओं की, ईकठ्ठी की गई बहुमूल्य चड्डीयों का बड़ा...सा  शॉ-रूम शुरू करेंगे ।


आजकल जूलियन असांजे ने, रोज़ `एक तीर से  एक साथ कई नेताओं की चड्डी खींचाई अभियान`` के तहत,  आज फिर से भाजपा के नेता श्रीअरूण जेटली की चड्डी खींची है । अब, हम क्या करें?


वैसे तो `चड्डी खींचतान अभियान` का अर्थ होता है,`किसी की इज़्ज़त का फालुदा करना, किसी का अपमान करना, वग़ैरह, वग़ैरह..!!


सब से बड़ा सवाल यह है की, विकिलीक्स क्या सब के साथ मज़ाक कर रहा है?


लेकिन, मज़ाक में तो एक हद होती है और इस `चड्डी खींचाई अभियान` बेहद है ?


विकिलीक्स आयें दिन जो भी लिक कर रहा है, वह बहुत बदबूदार है..!! लिक हो रहे सारे दस्तावेज़, किसी की मज़ाक उड़ाने के हेतु सार्वजनिक नहीं हो रहे, मगर बड़े लोग की, निजी सोच और सार्वजनिक सोच में, सचमुच  उत्तर-दक्षिण  दिशा का अंतर होने के साथ ही, ये सारे नेताओं की सोच कितनी घटिया और दोगली होती है, यही बात, वह उजागर कर रहे हैं ।


हर एक दस्तावेज़ के सार्वजनिक होने के साथ, संबंधित सब की चड्डी खींच के, जूलियन असांजे  अपने नये शॉ-रूम के लिए मानों,  अमूल्य चड्डीओं का, `ऑक्सन-नीलामी` करने के लिए नेताओं की चड्डीओं को जमा कर रहे हैं और जिसकी चड्डी खींची गई हो, वह सार्वजनिक तौर पर सरे-आम नंगा दिखने लगता है ।


दोस्तों, आप को तो पता ही है की, सन-१९७० तक दूर-दराज़ के देहाती इलाक़ो में रेडियो, पुरे गाँव में  शायद ही, किसी एक-दो घर में सुनने को मिलता था । गाँववालों मे से, टी.वी. तो ख़्वाब में भी शायद ही किसी ने देखा हो । ऐसी स्थिति में गाँव की सारी महिलाएँ किसी एक महिला के  घर के बरामदे में इकट्ठा होकर, हर रोज़ दोपहर घर के कार्यावकाश के समय, समाज के बड़े-बड़े सूरमाओं के घर-कुटुम्ब की पोल खोलने,`चड्डी खींचाई परिषद में` प्रवृत्त हो जाती थीं । इस परिषद में `चड्डी खींचाई अभियान` द्वारा सारे गाँव के  अच्छे बुरे समाचार में अपनी ओर से, नमक, मिर्च, मसालों का बढ़िया तड़का लगाकर, समाचार को विकृत कर के, `सर्व स्वीकृत` होने लायक टेस्टी बनाकर , कहाँ से कहाँ तक कर्णोपकर्ण पहुंचाने की क्षमता रखती थीं । हाँ, ये बात ओर है की महिला मंडल के संनिष्ठ प्रयत्न के कारण, कई बार सच्चे समाचार का पूरा स्वरूप ही बदल जाता था ।


ऐसे समाचार का स्रोत कुछ भी हो सकता था, जैसे की `बरामदा महिला मंडल` में, उपस्थित-अनुपस्थिति सास-बहु, माँ-बेटी,ननन्द-भाभी और कई बार पांच-दस पैसे की लालच में हमारे जैसे छोटे-बड़े बच्चें भी, इस महिला परिषद के, ख़बरी बनने को तैयार हो जाते थे ।


हालांकि, शास्त्रोंमें अपने घर की बातें सार्वजनिक करने के बारे में कहा गया है कि,


"अपृष्टो नैव कथयेद गृहकृत्यं तु कं प्रति।
बहवार्थाल्पाक्षरं कुर्यात्‌ सल्लापं कार्यसाधकम्‌ ॥ "



अर्थात - कई लोगों को अपने घर की निजी बातें जाहिर करने की खराब आदत होती है । अपने घर या कार्य संबंधी बातों को किसी के पूछने पर ही जाहिर करना चाहिए । हमेशा अर्थ पूर्ण, संक्षिप्त और कार्य सिद्ध करानेवाले  उत्तर देने की आदत डालनी चाहिए ।


चड्डी खींचाई अभियान और हम..!!


यह सन-१९५८ की बात है, मैं उस वक़्त बहुत छोटा सा था इसलिए दोपहर की बरामदा-महिला परिषद में मुझे एक एडवान्टेज मिलता था,`इतना छोटा बच्चा,महिलाओं की निजी बातों को क्या समझेंगा?` ऐसा मानकर मेरी उपस्थिति का कोई महिला कभी विरोध नहीं करती थीं ।


ये सभी महिलाएँ, जब कभी किसी की निजी सेक्सी बातें करनी हो तो, इशारे से अथवा तो प्रत्येक शब्द के आगे `अस्म-कस्म-मस्म-चस्म` जैसा कुछ जोड़कर, कोड वर्ड की भाषा का प्रयोग करती थी और बाद में पता नहीं, सारी महिला परिषद ज़ोर-ज़ोर से ठहाका मार कर हँसती थीं। (ऐसे में मुझे बहुत बुरा लगता था- मेरे जैसे छोटे बच्चे के साथ इतना बड़ा चिटींग-ख़ुफ़ियापन?)


बरामदा महिला परिषद में शृंगार रस और साहस से भरी रसवंत बातचीत का दौर शुरु होते ही, बात लंबी चलने की आशंका के कारण कई महिलाएं, पहले ही बाथरुम हो आती थीं, जिससे बात में रसक्षति का ख़तरा टल जाए ।


मैं भी इधर-उधर देखकर,मानो कुछ न समझने का ढोंग रचा कर, किसी कुशल अभिनेता की भाँति असरदार अभिनय कर के,  मेरे कान को ओर तेज़ कर लेता था । वैसे तो उस वक़्त मुझे ठीक से चड्डी पहनना भी आता नहीं था । शायद इसी वजह से यह निंदा-रसिक महिलाओं की कुछ-कुछ बातें मेरी समझ सीमा के पार होती थीं ।


हाँ, अक्सर ऐसा होता था उन महिलाओं की बातों के बीच अगर कोई बाल कथा जैसा प्रसंग आ जाए, तब मैं उसे ध्यान से सुनता, बार बार रटता और फिर उसमें नमक, मिर्च, मसाला डालकर अच्छा सा तड़का लगाकर, इस कथा को और रोचक बनाकर हमारे बच्चों की महोल्ला परिषद में उसे पेश करके, दूसरे बच्चों से ज्यादा, विद्वान और ज्ञानी होने का दंभ मैं रचाता था ।(शायद, आज भी मैं वैसा ही हूँ..!!)


अमेरिकन मेजर लिग बेसबॉल के स्पेशयल आसिस्टन्ट जनरल मैनेजर मिस्टर-रॉबर्ट स्कॅफर का कहना है की," आपकी अंगत परेशानियाँ किसी ओर को मत सुनाईए क्योंकि सुनने वालों में से ज्यादातर व्यक्तिओं को इसकी कोई दरकार नहीं होती और बाकी व्यक्ति इसे सुनकर मन ही मन खुश होगें ।"


मिस्टर रॉबर्ट की यह बात सुनकर, आप सबको भी हैरानी होती होगी की, अपने-अपने क्षेत्र में सर्वोच्च शिखर तक पहुँच कर भी, विकिलीक्स जिन महानुभवों की चड्डी खींच रहा है, उनको क्या इतना भी ज्ञान नहीं है की अपने मन का भेद किसे बताना चाहिए और किसे नहीं ? ये सारे सम्माननीय नेता ऐसी बेवकूफी कैसे कर सकते हैं..!!


मेरे खयाल से,पंडित नहेरुजी के समय से, किसी गोरी चमड़ी को देखकर, उनसे अत्यंत प्रभावित होने की, या फिर अपने देश या पक्ष की थोड़ी बहुत जानकारी की लॉलीपोप अमेरिकन राजदूतोंको चटा कर, अमेरिका से अपने कुछ निजी स्वार्थ साधने की चेष्टा के कारण ही, ऐसी बेवकूफी हो सकती है । फिर ख़ुदग़र्ज़ नेताओं को ये थोड़े ही पता था की, जूलियन असांजे, शाम सवेरे, हाथ धो कर, उनकी चड्डी के पीछे पड़ने वाला है?


खैर, अब  जो हो रहा है, उसे  कोई रोक तो नहीं सकता । मगर ऐसे नंगेपन की ये सारे नेता लोग आदत तो डाल ही सकते हैं ।


हिन्दी फिल्म,`वक़्त`में  महामंडलेश्वर श्री..श्री..श्री..पूज्य १००८ संत शिरोमणि अभिनेता श्रीराजकुमारजी (जा..नी..ई..ई,) ने सही फरमाया है, "जो खुद शीशे के घर में रहते हो, वह किसी दूसरे के घर पर पत्थर नहीं फेंका करते जा..नी..ई..ई..!!"


अ..हा..हा..हा..!! कल्पना मात्र से, मैं रोमांचित हो उठता हूँ । ज़रा आप भी कल्पना कीजिए, विकिलीक्स के द्वारा सभी देशों के मांधाताओं की  सारी चड्डीयां  खींच ली गई है  और अब मिस्टर जूलियन असांजे ने, अपने चड्डीओं के शॉ-रुम के बाहर, सारे नेताओं से, ईकठ्ठी की  गई  तमाम चड्डीओं  पर, उन सब नेताओं के नाम का टॅग लगाकर, `सार्वजनिक चड्डी ऑक्सन`(नीलामी) आयोजित किया है ।


 अ..हा..हा..हा..!! हम जैसे लोगों के लिए `सार्वजनिक चड्डी नीलामी` का,  ये अद्भुत नज़ारा कितना`रोचक` होगा और जिन महानुभवों की चड्डीओं की नीलामी हो रही है, उन सब नेताओं के लिए ये नज़ारा कैसा `रेचक` रहेगा..!!


हालांकि, `चड्डी खींचाई अभियान` का सच्चा लुत्फ़ तो सारे प्रिंट और न्यूज़ टीवी, मिडीयावाले उठा रहे हैं? विकिलीक्सके खुलासेमें, जो महानुभव पकड़े जाते हैं, उनकी बॉडी लेन्ग्वेझ से लेकर उनकी सात पुश्तों तक की जानकारी लेने-देने में सब संवाददाता एक साथ जुट जाते हैं..!! चलो, उनका  पेट भरने की ज़िम्मेदारी भी इन्हीं चड्डी-दाता नेताओं पर ही तो है..!!


वैसे, पेट भरने से याद आया, हिन्दी फिल्मोमें शक्तिकपूर से पहले, आग़ा, धुमाल, मुकरी, केस्टॉमुखर्जी, महमूद, असरानी जैसे कई कॉमेडियन्स कई फिल्मों में, चड्डी पहनकर ही, दो पैसे कमाकर अपना पेट भरते थे..!!

इसी तरह, स्टेन्डअप कॉमेडी करके अपना पेट पालनेवाले कॉमेडियन राजु श्रीवात्सवजी, जब `बीगबोस सीज़न-३` में हिस्सा ले रहे थें तब, अपनी शरारती कॉमेडी के ज़रिए कई बड़े-बड़े सूरमाओं की चड्डी खींचनेवाले, राजु की खुद की चड्डी, इसी शॉ की चूलबूली प्रतियोगी कुमारी शमीता शेट्टी, अदिती और तनाझ बखत्यारने  मिलकर खींची थीं,जिस दृश्य को भारत सरकार के ईन्फरमेशन और ब्रॉडकास्टींग मिनिस्टरीने, पांच दिन की शोर्ट नोटिस भेजकर,  राजु की चड्डी खींचाई का  भद्दे  मजाकवाला दृश्य एडिट करवाया था ।


ऐसा ही एक किस्सा,`U.K. Big Brother` की आठवीं सिरीज़ के दौरान हुआ था । नोर्थ लंदन  के सुप्रसिद्ध मॉडल ,` Zachary Sami "Ziggy" Lichman` (जन्म- ५ फरवरी १९८१.) प्रतिस्पर्धि, बिग ब्रधर शॉ शुरु होने के बाद तीन दिन के पश्चात शॉ में दाखिल हुए थे और इस शॉ की कुछ नटखट कुँवारी (??) कन्या प्रतियोगीने मिलकर` झिग्गीभाई` की चड्डी सचमुच खींच ली थीं । इसका वीडियो आज भी ,` YOU TUBE` पर उपलब्ध है । इस शॉ के विजेता`,`Brian Belo` हुए थे ।


चाहे `मुन्नाभाई MBBS` हो या फिर`थ्री ईडियट`फिल्म के कॉलेज का रेगिंग दृश्य? ये चड्डी खींचाई का सब्जेक्ट, हर एक फिल्म डायरेक्टर के मन को, इतना भा गया है की ये सभी डायरेक्टर को हम कह सकते हैं,`जहाँपनाह तु सी ग्रेट हो..!!`


फिल्म,`थ्री ईडियट्स`में विकिलीक्स की पेटर्न पर, ऐसे ही भाषण के दस्तावेजमें `चमत्कार` शब्द की जगह `बलात्कार` शब्द बदली करके, ज़ुल्मी मेन्टोर सहस्त्रबुद्धे (बोमन ईरानी) की चड्डी सब स्टूडन्ट्सनें बराबर खींची है ।


वैसे यह समाचार एकदम ताज़ा है की, अभी-अभी गुजरात के सी.एम.श्रीनरेन्द्र मोदीजीने, अमेरिकन कॉन्स्यूलेट जनरल मि.माईकल ऑवन की चड्डी कुछ ऐसे खींच ली थी की, अब माइकल ऑवन की चड्डी आजकल कहाँ है ? उसका ऑक्सन होगा की नहीं? ये बात कोई नहीं जानता ।

दोस्तों, अंतिम समाचार प्राप्त होने तक, आधुनिक शॉरुम में, पर्याप्त चड्डी ईकठ्ठी हो जाने पर,थोड़े ही दिनों पहले, जूलियन असांजे ने, महान नेताओं की `चड्डीओं का ऑक्सन`(नीलामी) आयोजित किया था ।


अभी-अभी प्राप्त समाचार मुताबिक, जूलियन असांजे आयोजित, विश्व भर के नेताओं की `चड्डीओं के ऑक्सन`में असांजे को बहुत भारी मुनाफ़ा प्राप्त हुआ है ।


चड्डीओं की नीलामी के दौरान एक अनहोनी भी हो गई थीं ।


ऑक्सन-हॉल में, हॉल के ग़रीब चपरासी  की  फटीं चड्डी,  ग़लती से नीलामीमें  शामिल हो गई थी, जिसकी अच्छी-ख़ासी बोली लगने के बावजूद, वह ग़रीब चपरासीने जूलियन असांजे को, ये कहकर अपनी चड्डी बेचने से,  इनकार कर दिया की,


" हमारी चड्डी भले ही फटीं हुई है, मगर इसे मैंने अपने पसीने की कमाई से खरीदी है । ज्यादा फट जायेगी, तब  मेरी पत्नी इसे काट-छांट कर, मेरे छोटे बच्चे की चड्डी बना लेगी और मेरे बच्चे की चड्डी भी फट जायेगी तब, उसको घर के पोंछे के तौर पर इस्तेमाल करेगी । असांजे साहब, हम ग़रीब ज़रूर हैं पर, अपने फटे कपड़े और  बूढ़े  माता-पिता से, आखिरी सांस तक, न तो कभी शरमातें हैं, ना ही कभी उनको, किसी ओर के हवाले करते हैं ।"


हे  कुर्सी मैया, ऑक्सन (नीलामी) हॉल के यह ग़रीब चपरासी से, हमारे  सारे महान, प्रातःस्मरणीय, आदरणीय  नेता  क्या  कुछ शिक्षा  ग्रहण  करेंगे..!!

"मगर..हाय.. वो दिन कहाँ की मियाँ के पाँव में जुती..!!"

फिलहाल  तो, जूलियन असांजे  बड़ी  उलझनमें हैं  की,

"क्या ये यही देश है जहाँ, ताक़तवर,अमीर,सत्ताधारी नेता लोग भ्रष्टाचार के पैसों से खरीदी हुई, परदेश की अत्यंत महँगी चड्डी उतर जाने पर भी, अपने नंगेपन पर गर्व महसूस करते हैं और इससे बिलकुल विपरीत, इसी देशमें एक ग़रीब चपरासी अपने पसीने की कमाई से खरीदे  हुए,  फटें कपडों को, बूढ़े माता-पिता जितना ही प्यार करके, उसकी नीलामी करने से परहेज़ करता है? "


मेरे प्यारे, मिस्टर जूलियन असांजे साहब, यही तो है, मेरा महान भारत ।


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"ANY COMMENT?"


मार्कण्ड दवे । दिनांकः २७ -०३-२०११.

रविवार, 27 मार्च 2011

कनपुरिया होली .......

हरीश प्रकाश गुप्त जी की यह पोस्ट हमने हमारे ब्लॉग ‘मनोज’ पर लगाया था। आज इसे

हास्य व्यंग ब्लोगर्स महासभा में पेश कर रहा हूं। क्योंकि यह आपके चेहरे पर एक मुस्कुराहट लाने का प्रयास, हँसे क्योंकि इससे तनाव दूर होता है और स्वास्थ्य उत्तम रहता है..

व्यंग्य

कनपुरिया होली .......

हरीश प्रकाश गुप्त

यदि आप हमारे कानपुर नगर के इतिहास, भूगोल और संस्कार से परिचित नहीं हैं तो मान लीजिएगा कि आपकी जानकारी का लेविल कुछ कम है। बात कुछ कड़क लग रही हो तो कृपा करके इसे थोड़ा घुमाकर समझ लीजिए। यह आपका ही काम है। लेकिन सच तो सच ही है। हो सकता है कि आपने अभी तक इस शहर के दर्शन ही न किए हों। यह भी हो सकता है कि आपने यहाँ की पावन महिमा का बखान किसी के श्रीमुख से सुन रखा हो। फिर भी, यदि यह सच है तो आप अभी तक इस धरती की रज से पवित्र हुए बिना ही शेष धरा पर विचरण कर रहे हैं।

बात यदि दो चार सिद्धियों की हो तो उनका क्रमशः वर्णन कर दिया जाए। लेकिन यहाँ तो हरि अनंत “हरि कथा अनंता” की भाँति कोई ओर-छोर ही नहीं है। विश्वास नहीं तो आप कश्मीर से कन्याकुमारी तक अथवा कोटा से कोलकाता तक के रास्ते में कहीं भी कानपुर की चर्चा छेड़ दीजिए। बस। आपको अधिक कुछ कहने की आवश्यकता नहीं रहेगी। आपके इर्द-गिर्द दो चार विद्वतजन जरूर मौजूद होंगे जो यहाँ की महिमा को अनेकानेक विशेषणों से विभूषित करते हुए विभिन्न उद्धरणों की मदद से इति सिद्धम करते हुए अविराम गतिमान रखेंगे।

यहाँ प्रसंग को आप अन्यथा न लें। मतलब वृत्तांत की दिशा आज वह नहीं है जिसे आप समझ बैठे। यहाँ पर बात होली की हो रही है। केवल होली की। दुनियाँ भर में अगर यहाँ और बरसाने की होली को छोड़ दें तो बाकी जगह होली तो बस हो ली की तरह बीती बात की तरह होकर रह जाती है। बरसाना तो ठहरा राधा जी का मायका। वहाँ की बराबरी कौन करे। वहाँ के लोग आज भी इसे दिल से मनाते हैं। महीने भर होली मनाते हैं कि कन्हैया आवें और पूरा गाँव उन्हें रंग में डुबो-डुबोकर होली खेले। लेकिन पहुचते हैं वहाँ ढीठ गोकुल वाले। सबके सब अपने को कृष्ण कन्हैया समझ बरसाने की ग्वालनों का सामीप्य और स्पर्श पाने का सपना संजोए पँहुच जाते हैं हर बार। अब वो द्वापर वाली ग्वालनें तो हैं नहीं, जो वंशी की तान सुनते ही अपना सब कुछ बिसराकर खुद ही समर्पण करने चली आवेंगी। भगाने के कितने उपाय तो कर लिए उन्होंने। होली के नाम पर नए नए हथकण्डे तक ईजाद कर लिए, मसलन लट्ठमार होली, कपड़ाफाड़ होली, कोड़ामार होली आदि, आदि। अभी बरसाने वालियों पर से देश की संस्कृति, मर्यादा और परम्परा का भार पूरी तरह उतरा नहीं है सो गज भर का लम्बा घूँघट काढ़कर गोकुल वालों पर लट्ठ बरसाती हैं कि एक-आध सही जगह पड़ जाए तो अकल ठिकाने आ जाए। हो सकता है कि उनके इस कला में पारंगत होने के कारण ही उनके गाँव का नाम बरसाना पड़ा हो। वे गोकुलवालों के कपड़े फाड़-फाड़कर अधनंगा कर भिगो-भिगो कर कोड़े मारती हैं । लेकिन गोकुलवासी इसे अपनी लज्जा से न जोड़ते हुए प्रेमरस भरे रंग की फुहार मान वापस लौट जाते हैं अगली बार अधिक जोश और उल्लास से सराबोर होकर वापस आने का संकल्प लेकर। शायद अगली बार सफल हों। तो देखिए कनपुरिया होली का रंग।

दृश्य - 1

कनपुरियों का कहना है कि होली में गोकुलवासियों को लज्जा नहीं आती तो हमें काहे की लज्जा। आनी भी नहीं चाहिए। कैसा भी कर्म हो, बस संकल्प के साथ किया जाए। और यह नगरी कोई भगवान की नगरी तो है नहीं। न द्वापर के कृष्ण की, न त्रेता के राम की। ये नगरी है छज्जू और बाँके की। बरसाने में रंग एक महीने चलता है तो होली में रंग यहाँ भी हफ्ते भर से कम नहीं चलता और छज्जू, बाँके की रंगबाजी भी कुछ कम नहीं चलती। हफ्ते भर की होली में मार्केट-वार्केट सब बन्द। प्रतिदिन आठ से बारह का टाइम शेड्यूल रहता है होली का। खूब खेलो। होली कम हुड़दंग ज्यादा। व्यापारी लोग भी सोचते हैं कि अपनी तहस-नहस कौन कराए और सरकारी विभागों की त्यौहारी वसूली से नोच खसोट कौन कराए। सो जिनका बस चलता है, निकल लेते हैं वार्षिक छुट्टी पर सैर करने। पुलिस प्रशासन अमला जमला मुस्तैद रहता है, चौक चौराहे या मेन मेन लोकेशन्स पर, ताकि दिखे कि वे मुस्तैद हैं। गलियाँ जाएं चूल्हे भाड़ में।

बस यही वो पेच है जिसकी आस छज्जू, बाँके को खास रहती है पूरे साल भर। दोनों के पेशे अलग अलग हैं। पेशा कोई खास नहीं। एक सरकारी विभाग में मुलाजिम है पाव टके दर्जे का। लेकिन विभाग धमकदार है। आई मीन, हिन्दी में कहें तो तीस तारीख की पगार चायपानी और एक आध बैठकी में ही पानी माँग जाती है। लेकिन उसकी फिकर किसे है। जब भी जेब हलकी लगी, घुस लिए किसी फर्म, फैक्टरी, दुकान, दालान का इन्सपेक्शन करने। विभाग का रसूख और बड़ी बड़ी मूँछों का मायाजाल ऐसा कि तुम्बा भी गुलदार सी बातें करना न भूले। बस अपना मान सम्मान अँजुरी में सामने रखकर चलना होता है।

होली की साप्ताहिक बन्दी में व्यस्तता कुछ अधिक ही बढ़ जाती है। रात बारह बजे तक पार्टियों के साथ चाही अनचाही बैठकें चलती हैं तो दिन के बारह तक आफिस में नींद के झोके। होली दीवाली ही तो पेशे की सहालग हैं, सो वह चैन-सुख और नैन-निद्रा को खूँटे से बाँध निकल पड़ता हाड़ तोड़ मेहनत के लिए। सो वह मेहनत एक बार फिर हाड़ तोड़ साबित हुई।

दो दिन बाँके नहीं दिखा तो छज्जू ने उसकी खैर खबर ली। बिस्तर पर बाँके। पैर में पलस्तर। टाँग आसमान की ओर उठी और दो ईंटों के ट्रैक्सन से खिंची। दो्स्त को देखा तो भावुकता में नैनों से नीर नदी सा बह निकला। उसकी घरवाली पड़ोसन को बता रही थी – किसी ने इनके स्कूटर में पीछे से टक्कर मार दी। देख तक न पाए। यह टाँग तीसरी बार उसी जगह से टूटी है। हाय री किस्मत। रंग का त्यौहार ही बदरंग हो गया।

वही टाँग, वही जगह, वही चोट ... वही छुट्टियाँ। छज्जू ने अश्रुधारा पर एक बार फिर दृष्टि डाली और इसके उद्गम के विषय, आहत और आह का विश्लेषण करने लगा। फिर उसने मसखरी के अन्दाज में एक प्रश्न उछाल दिया “यार मुझे तो सच बताओ। गए कहाँ थे. कहीं फिर वहीं पुराने जाजमऊ में, नफीस कटोरी के दालमिल कम्पाउण्ड में टेढे नाले के पास ......” “कभी चुप भी रहा करो। इज्जत पर पलीता लगाकर ही दम लोगे क्या. अरे यहाँ पर तो कुछ ढका छुपा रहने दो।” कहकर बाँके वर्तमान में आया और चेहरे पर कस के गमछा रगड़ लिया।

दृश्य -2

आज होली मेला है। दिन में खूब रंगबाजी हुई है। सड़कें हुसैन की चित्रकारी सरीखी रंगी हैं। नालियों में आज गंदे पानी पर रंग सवार होकर बहा है। कहीं तो सड़कें और दीवारें अभी तक सूख भी नहीं पाई हैं। लोगों ने शाम को मेला की तैयारी में खुद को रगड़-रगड़ कर साफ किया है तो कुछ का चेहरा जैसा अब जान पड़ने लगा है वर्ना सुबह तो पहचानना कहाँ से शुरू करें, यही तय करना मुश्किल हो रहा था। रंग के ठेले में जो गुम हो गया, सो हो गया। सभी लाल, हरे, पीले, काले रंग में डूबे पुतले की तरह ही जान पड़ रहे थे।

गोधूलि की बेला होने को है। पतित पावनी गंगा के तट पर भारी भीड़ जमा है। धुले, उजले, नवीन, रंगीन परिधानों में अधरंगे, रंग अभी तक पूरी तरह छूटा नहीं है, चेहरों वाले लोग किसी विशिष्ट समुदाय अथवा आधुनिक वस्त्रों में सुशोभित दूरदराज की वनजातियों के समूह से लग रहे हैं। बहुत चहल-पहल है। कहीं संगीत का कार्यक्रम चल रहा है, तो कहीं होली के लोकगीत का। कहीं बच्चे भी उत्साह से उल्लास में शामिल हैं। जगह-जगह छोटे बड़े टेन्ट, तम्बू, पाण्डाल, और शिविर लगे हैं। अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार। शासन-प्रशासन का टेन्ट, राजनीतिक, सामाजिक संगठनों के पाण्डाल, विभिन्न समुदायों, वर्गों, जातियों के तम्बू और स्वयंसेवी संस्थाओं के शिविर। सभी ने होली मिलन समारोह में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। थालियों में एक ओर अबीर और गुलाल सजा है, तो दूसरी ओर जलपान के लिए तमाम आइटमों के साथ गुझिया नवयौवना सी इतरा रही है। मिलन में अब सूखे रंग का तिलक ही लगेगा। तरल में ठण्डाई मिलेगी, हरी वाली भी। पीछे वाली लेन के और पीछे मेज के नीचे माधुरी भी उपलब्ध है, लेकिन यह केवल विशेष पास धारकों के लिए ही है।

इस भीड़-भाड़ से थोड़ा हटकर गंगा की तरफ एक तखत पड़ा है। उधर ज्यादा लोग नहीं आ-जा रहे हैं। दस-बीस लोग ही बैठकी लगाए हैं। आज तो सभी एक रंग में ही रंगे नजर आ रहे हैं, तो फिर ऐसा रंगभेद क्यों। लोग उस समूह से इतनी दूरी क्यों बनाए हैं। उत्सुकता ने कदमों को उधर ही खदेड़ना शुरू कर दिया। यह क्या ? देखा तो पहले आँखों पर विश्वास ही न हुआ। सब रंगों के मिक्स्चर से रंगे-सने काले कलूतड़े टेक्स्चर का एक व्यक्ति हिप-हिप-हुर्रे और यप्पी-यप्पीईई करते हुए पास आया और एक हाथ में हरी-हरी बड़ी सी गोली रखते हुए दूसरे हाथ में एक गिलास ठण्डाई पकड़ा गया। फिर कान में फुसफुसाया “ठण्डाई विद करण”। तभी बुर्राक सफेद कुर्ता पायजामें में एक सज्जन नदी की ओर से आते दिखाई दिए। धीरे-धीरे वे पास आ रहे हैं। शक्ल तो कुछ-कुछ करण जैसी ही लग रही है, रंगीन टेक्स्चर वाली। केवल कुर्ता पायजामा से तो पहचान होती नहीं, परंतु गीली मिट्टी पर उनके पैरों के निशान साफ दिख रहे हैं। पता चला कि कोई पहचान ही नहीं पा रहा था इसलिए नदी के पानी में अपना चेहरा एक बार फिर साफ करने गए थे। मनोज जी हैं भाई।

तखत पर आचार्य राय जी विराजमान हैं। आज उनका व्याख्यान काव्यशास्त्र पर नहीं हो रहा है। बताते हैं करण ने ओवर डोज दे दी है। होली के दिन बात हुई थी तो करण ने कहा था सारी भाँग रख दी है अगली होली के लिए। इसी विश्वास में आचार्य जी चार गिलास गटक गए। एक जिज्ञासु पधारे हैं जो उनकी शिष्यता और सान्निध्य पाने के उपक्रम में उन्हें प्रभावित करने के लिए उनसे प्रश्न पर प्रश्न किए जा रहे हैं और आचार्य जी हैं कि उन्हें टाल रहे हैं। उनका फिर एक प्रश्न आया – आचार्य जी ज्ञानचंद और मर्मज्ञ में क्या अंतर है, क्या दोनों का अर्थ एक सा नहीं है। यदि ऐसा है तो इनके एक साथ प्रयोग में पुनरुक्ति दोष नहीं होगा। इस बार आचार्य जी से नहीं रहा गया, बोले – वत्स, इसका लक्षण न तो पंडितराज जगन्नाथ ने रस गंगाधर में दिया है, न आनन्दवर्धन ने ध्वन्यालोक में। आचार्य ममम्ट भी इस पर मौन हैं। इसकी व्याख्या आधुनिक भृंग सम्प्रदाय के आचार्य ही कर सकते हैं। इनके आदि आचार्यों का तो ज्ञान नहीं। इनके कुछ शिष्यों में करण आदि का नाम आता है। इनका निवास बंगलौर के आसपास है। वैसे, प्रश्न किया है तो इसका विस्तृत उत्तर इसी मंच से अगली होली के अवसर पर दिया जाएगा। तब तक प्रतीक्षा करें।

अरुण राय ने खाँटी देशज अंदाज में होली खेली है, गोबर से। अपनी कमीज खराब न हो इसलिए बाबूजी की कमीज कल से ही पहने घूम रहे हैं। इस बार एक तो खोए के भाव आसमान को छू गए, ऊपर से मिलावटी खोए से दुखी होकर उन्होंने तय किया कि बिना खोए की, केवल चीनी की ही गुझिया बनेगी। जिसने भी उनकी गुझिया खाई गीली चीनी का स्वाद बहुत भाया। एक बुजुर्ग महिला संदूकची लेकर पधारी हैं। उन्होंने तखत पर संदूकची खोल कर पलट दी है। गुझिया, पापड़, चिप्स वगैरह सहित तरह-तरह के नमकीन व मीठे स्नैक्स का ढेर लग गया। धुंधलका होना शुरू हो गया है। दिन के स्वामी अर्थात भगवान भास्कर अस्ताचलगामी हो रहे हैं। लोगों की मस्ती गहराती जा रही है। तभी, जिसे लोग अभी तक रंग का ढेर समझ रहे थे, उसमें कुछ हलचल हुई। रंग झड़ा तो बड़ी-बढी दाढ़ी और बड़े-बड़े बालों वाले व्यक्ति का आकार उभरा। जब उन्होंने अपने सिर को एक बार और झटका दिया तो आकृति कुछ स्पष्ट हुई। लेकिन यह अभी भी सभी ब्लागर्स की समझ से बाहर थी। मैंने आवाज लगाई। अरे भई, दादा श्याम सुन्दर चौधरी हैं। कुछ ज्यादा ही चढ़ गई थी, करण के रहमो करम से। अच्छी तरह पहचान लीजिए। जल्दी ही इनसे आपकी फिर भेंट होने वाली है। अब हम लोग भी चलते हैं। फिर मिलेंगे। आप सबको होली की बहुत बहुत शुभकामनाएं।

गुरुवार, 24 मार्च 2011

पहला पोस्ट हास्य व्यंग ब्लॉगर्स महासभा में...

मुर्दा नाचा

मुर्दा नाचा
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कल के उस फिल्मी दौर को,
याद करने से दुख होता है कि
हम आज कहाँ हैं ?

समाज का वह दर्पण जिसे
फिल्मी साहित्य के नाम से जानते हैं,
आज बाजारु हो गई है,
जिज्ञासा को परत दर परत ,
नोंच-नोंच कर आवरण रहित कर दिया है,

अर्धनग्नता की कामुता को,
नग्नता ने अश्लील बना दिया है।
हीरो व विलेन में अन्तर उतना ही बचा है,
जितना हीरोइन व कैबरे डाँसर में रह गया है।

गानों के वे वर्ण, छंद राग व वे चित्रण,
अब नहीं मिलते,
जिसमें कविता का आनंद था,
साहित्य का भी मान था,
राग की सलिलता थी,
और चित्रण न भावों को
आपस में बाँधने वाला माध्यम।
 
इससे हर तरह से आनंदमय
वातावरण बन जाता था।
सभी पारिवारिक सदस्यों के साथ
फिल्म देखने का,
एक अनूठा आनंद था,

अब या तो प्रेमी प्रेमिका,
या फिर पति पत्नी ही फिल्म को ,
साथ बैठ कर देख सकते हैं,
कॉलेज से भाग कर जाने वाले
छोरे छोरियों की छोड़ो,
दलों का मजा लेने वाले,
दलदल में भी खुश रहते हैं.

और कोई पारिवारिक सदस्य गर
साथ साथ फिल्म देखें तो-
क्या होगा ..
शायद भगवान भी
जानना नहीं चाहेगा।

गीत के बोल बातूनी,
छंद-लय की कहा सुनी, सुनी
ताल बेताल के,
और साज होगा जाज,
तारतम्यता लुप्त,
तौहीन साहित्य का,
सुप्तावस्था भी नयन फोड़,
खड़ी हो जाती है।

उन पुरीने गीतों की,
उनके लय की,
मधुरता और प्रवाह,
मानसिक शांति देती है,
और तन मन को तनाव मुक्त कर,
शवासन प्रदान करती है।
और आज ?
शायद मरघट पर,
आज के गीत बजाए जाएँ तो,
मुद भी खड़े होकर नाचने लगेंगे।
...........................................

भड़कीले सवाल - चटकीले जवाब भाग -१.

भड़कीले सवाल - चटकीले जवाब भाग -१.
 
http://mktvfilms.blogspot.com/2011/03/blog-post_24.html

भड़कीला SMS सवाल-"सवेरे-सवेरे मेरे नयन में आज कुछ चुभ रहा है प्रिया, कल रात ख़्वाब में शायद तुम्ही आयी थी क्या ?"
 
चटकीला जवाब - "ओह.., मेरे प्यारे भाई साहब, अगर आप मुझसे  मुख़ातिब है तो  हम, रक्षा-बंधन के शुभ पर्व पर अवश्य मिलेंगे और अगर आपने ये सवाल आपकी भावी सास (मेरी मम्मी) से किया है, तब तो  ख़ुदा ख़ैर करे ।"  
 
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प्यारे दोस्तों,
 
फ़र्स्ट अप्रैल का अप्रैलफूल-डे नज़दीक आ रहा है । हमारे कुछ दोस्तों ने, अपने मन की भड़ास निकालने के लिए, हमसे कुछ भड़कीले सवाल पूछे हैं ।
 
उन सारे सवालों का जवाब देना, हमारा परम मानव धर्म एवं एकमेव कर्तव्य है ।  दोस्तों, हम जवाब तो दे रहें हैं पर उसमें बताए गए, उपाय खुद अपनी ज़िम्मेदारी पर ही आज़माना, किसी विपरीत अंजाम के लिए हम कतई ज़िम्मेदार नहीं रहेंगे, कह देते हाँ..!!
 
(स्पष्टता- वैसे,यह जवाब सिर्फ हास्य-व्यंग-विनोद के लिए हैं, 
आज़माने के लिए नहीं ।)
 
`SO, LET`S  START MY FRIENDS.`
 
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भड़कीला सवाल- " मैं  २२ साल का नवयुवक हूँ मेरी गर्लफ़्रेंड के  बग़ैर,  मैं सूना सूना सा पड़ गया हूँ, क्या करुं?
 
चटकीला जवाब -" गर्लफ़्रेंड का दुपट्टा ओढ़कर आईने  के सामने, (ब्वॉयफ़्रेंड - गर्लफ़्रेंड) दोनों  रोल खुद करके देखें, शायद दिल को करार आ  जाए..!!
 
भड़कीला सवाल- " मेरी गर्लफ़्रेंड जब रोती है तब मुझे हमेशा हँसी निकल आती है, गर्लफ़्रेंड चीड़कर रूठ जाती है । मैं क्या करुं?"
 
चटकीला जवाब -"अपनी गर्लफ़्रेंड के पापा और भाई से एकबार रूबरू हो आओ,गर्लफ़्रेंड के साथ-साथ आपको भी रोना आ जायेगा..!!"
 
भड़कीला सवाल-" मेरी शादी हो जाने के बाद मुझे पता चला है की, मेरी  पत्नी बहिरी है । अब क्या करुं?"
 
चटकीला जवाब - "ओह..,ये तो बहुत बड़े फ़ायदे वाली बात है । आप अपनी बाहर वाली `वोह`से, फोन पर अब खुल कर बातें कर सकेंगे..!! हाँ, SMS मत करवाना, घर वाली बहिरी है-अंधी नहीं..!! "
 
भड़कीला सवाल-"मेरी गर्लफ़्रेंड के पापा पुलिस ईन्स्पेक्टर है और मेरे पापा शहर के बहुत बड़े डॉन है । क्या हम दोनों की शादी संभव है?"
 
चटकीला जवाब - "दोस्त, ये तो सोने पर सुहागा जैसी बात हो गई । शादी की बात आगे बढ़ाइए..!!"
 
भड़कीला सवाल-"मेरा अभी-अभी एंगेजमेन्ट हुआ है । मेरी भावी पत्नी ज़रा कम अक्ल है और मुझे अब मेरी साली पसंद है । क्या करुं?"
 
चटकीला जवाब - " आपके किसी कम अक्ल दोस्त के साथ, कम अक्ल भावी पत्नी से परिचय करवा कर,साली राज़ी हो तो,उसके साथ भाग जाएं..!! (पुख़्त वय का होना ज़रुरी है)"
 
भड़कीला सवाल-" मेरी पसंद की हुई कन्या मेरे माता-पिता को पसंद नहीं आती । ऐसा करते-करते, मैं ३४ साल तक कुँवारा रह गया । क्या करुं?"
 
चटकीला जवाब -" वॅ..री सिम्पल..!! माता-पिता के सामने, आप किसी ब्वॉयफ़्रेंड से शादी बनाना चाहते हैं, ऐसा ज़ाहिर कर दीजिए । सप्ताह भर में, आप की मनपसंद कन्या से शादी हो जाएगी..!!"
 
भड़कीला सवाल-"मुझे मेरी गर्लफ़्रेंड की सिर्फ आंखे पसंद है, गर्लफ़्रेंड नहीं, क्या करुं?"
 
चटकीला जवाब - "शादी के बाद काजल की फ़ैक्टरी लगाकर, गर्लफ़्रेंड-पत्नी की आंखों चौबीसों घंटे काजल लगाते रहना..!!"
 
भड़कीला सवाल-"मेरी गर्लफ़्रेंड ने मेरा गिफ्ट किया हुआ गुलाब का फूल, पैरों तले कुचल डाला । क्या यह सही है, अब मैं क्या करुं?"
 
चटकीला जवाब - " दोस्त, अब की बार,गर्लफ़्रेंड को फूलगोभी देना । कम से कम उसे तो,कुचल नहीं पाएगी,O.K?"
 
भड़कीला सवाल-" मैं मेरी गर्लफ़्रेंड के साथ, गार्डन में, बस ऐसे ही बैठा था,अचानक पुलिस आकर मुझे थाने ले गई । ऐसा क्यों?"
 
चटकीला जवाब - "दोस्त, ऐसे ही क्यों बैठा था? कुछ न करने वाले, अ-कर्मी प्रेमीओं के उपर वैसे भी पुलिस ज़्यादा ही चिढ़ती रहती है ..!!"
 
भड़कीला सवाल-" मेरा नाम कपिल है । मुझे वैलेंन्टाईन डे पर बजरंगदलवालोंने  खूब पिटा । क्या प्यार करना गुनाह है?"
 
चटकीला जवाब - " आपको पहले ही अपना नाम बता देना चाहिए था, कपिल का अर्थ बजरंग होता है । मगर,आप ऐसा बंदर पना करते ही क्यूँ है?"
 
भड़कीला सवाल-" मेरी पत्नी मुझे पालतू कुत्ता समझती है । क्या करुं?"
 
चटकीला जवाब - " वफ़ादारी के लक्षण को कस कर पकड़े रखो..!!"
 
भड़कीला सवाल-"मेरी तुलना में,मेरी पत्नी अधिक सुंदर है । अभी-अभी शादी के बाद, उसके ढेर सारे देवर उसके आसपास मंडराने लगे हैं । क्या करुं?"
 
चटकीला जवाब - " आपकी पत्नी को समझा दो, हर एक देवरसे, दो-दो लाख रुपया शादी का उपहार माँगे ।दूसरे दिन से एक भी बंदा,  भाभी तो क्या, आपके घर के आसपास भी दिखेगा नहीं..!!"
 
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"ANY COMMENTS."
 
मार्कण्ड दवे । दिनांक- २४-०३-२०११.

मंगलवार, 22 मार्च 2011

"ढाक के तीन पात" का क्या अर्थ है?

पति: आज खाने में क्या बनाओगी?
पत्नि: जो आप कहें
पति: वाह, ऐसा करो आज दाल चावल बना लो।
पत्नि: अभी कल ही तो खाया था।
पति: तो सब्जी रोटी बना लो!
पत्नि: बच्चे नहीं खायेंगे।
पति: छोले पूरियां बना लों, कुछ चेंज हो जायेगा।
पत्नि: मुझे भारी भारी लगता है
पति: ओके, आलू कीमा बना लो
पत्नि: आज मंगलवार है मीट की दुकान बंद होगी।
पति: तो गोभी के पराठें बना लो।
पत्नि: सुबह यही तो खाये थे।
पति: चलो, आज होटल से खाना मंगवा लेते हैं।
पत्नि: इस महंगाई में रोज रोज बाहर से खाना मंगाना ठीक नहीं।
पति: तो एक काम करो कढ़ी चावल बना लो।
पत्नि: अब इस वक्त दही कहां मिलेगा।
पति: ...पुलाव बना लो...
पत्नि: इसमें बहुत टाइम लगता है
पति: पकोड़े बना लो, इसमें टाइम नहीं लगता
पत्नि: खाने के टाईम पर पकोड़े अच्छे नहीं लगते
पति: फिर क्या बनाओगी ?
पत्नि: मेरा क्‍या है.... जो आप कहें।
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पि‍ता पुत्र से - आज तक तुमने कोई ऐसा काम कि‍या जि‍ससे मेरा सि‍र ऊंचा होता हो ?
पुत्र - आप भूल गये पि‍ता जी... याद करि‍ये परसों ही तो टीवी देखते समय जब आपने लेटना चाहा तो मैंने आपके सि‍र के नीचे दो तकि‍ये लाकर रखे थे।

गुरुवार, 10 मार्च 2011

हमारे बाथरूम में......


नर्सरी क्लास में छोटे बच्चों से पुछा गया "भगवान कहाँ है?"


एक बच्चे ने जोर जोर से हाथ हिलाया "मुझे पता है!!"



टीचर ने कहाँ "अच्छा बताओं"



बच्चे ने बताया "हमारे बाथरूम में"



एक पल के लिये टीचर चुप! फ़िर संभलते हुए बोली "तुम्हे कैसे पता?"



बच्चा बोला "रोज सुबह जब पापा उठते है,

बाथरूम का दरवाजा पिटते हुए कहते
है -

हे भगवान ! तुम अब तक अंदर ही हो!"

सोमवार, 7 मार्च 2011

धक धक बजट