मंच पर सक्रिय योगदान न करने वाले सदस्यो की सदस्यता समाप्त कर दी गयी है, यदि कोई मंच पर सदस्यता के लिए दोबारा आवेदन करता है तो उनकी सदस्यता पर तभी विचार किया जाएगा जब वे मंच पर सक्रियता बनाए रखेंगे ...... धन्यवाद   -  रामलाल ब्लॉग व्यस्थापक

हास्य जीवन का अनमोल तोहफा    ====> हास्य जीवन का प्रभात है, शीतकाल की मधुर धूप है तो ग्रीष्म की तपती दुपहरी में सघन छाया। इससे आप तो आनंद पाते ही हैं दूसरों को भी आनंदित करते हैं।

हँसे और बीमारी दूर भगाये====>आज के इस तनावपूर्ण वातावरण में व्यक्ति अपनी मुस्कुराहट को भूलता जा रहा है और उच्च रक्तचाप, शुगर, माइग्रेन, हिस्टीरिया, पागलपन, डिप्रेशन आदि बहुत सी बीमारियों को निमंत्रण दे रहा है।

शनिवार, 30 अप्रैल 2011

आधुनिक बोधकथाएँ -४. सुंदर गायिका ।

अकबर-बिरबल ।

 (सौजन्य-गुगल)
सुंदर गायिका ।


अकबर - "बिरबल,तानसेनजी एक माह की पी.एल. (छुट्टी) पर जानेवाले हैं । यार, उनकी जगह मन बहलाने लिए, इस बार अगर सुंदर गायिका का प्रबंध हो जाए, तो मझा आ जाए..!!"

बिरबल -" बादशाह सलामत, एक काम करते हैं । सारे राज्य में ढिंढोरा पिटवा के, सुंदर गायिका का इंटरव्यू करते हैं ना, ठीक है?"

अकबर -" वैरी गुड आइडिया, बिरबल ऐसा ही करते हैं । तानसेनजी एक हफ़्ते के बाद, छुट्टी पर जानेवाले है,उससे पहले गायिका का एपॉइन्टमेन्ट हो जाना चाहिए,क्या?"


बिरबल - " डॉन्ट वरी, जहाँपनाह, मैं हूँ ना..!!  ऐसा ही होगा, आप निश्चिंत रहें ।"


तुरंत, सारे राज्य में ढिंढोरा पिटवाया गया । कई रूपमती,नाज़ुक,सुंदर गायिका इंटरव्यू के लिए उपस्थित हो गई । इनमें से कुछ स्वरूपवान गायिका,  सेमी फ़ाइनल राउंड के लिए सिलेक्ट भी हुई ।

इसी दौरान, एक दिन बादशाह अकबर, बड़े गभराये से, बौखलाये से ,बिरबल के पास पहुँचे..!!

चेहरे पर आतंक के भाव के साथ,बादशाह ने बिरबल से कहा," यार, बिरबल, महल में, मेरी बेग़म को पता चल गया है कि, हम तानसेन की एवज़ में सुंदर गायिका ढूंढ रहे हैं । पता नहीं कहाँ से, उसकी कोई सहेली आ धमकी है? अब बेग़म ने पूरा महल सर पे उठा लिया है कि अगर गायिका सिलेक्ट करना है तो, उसे ही एपॉइन्ट करना पड़ेगा..!! बिरबल,यु...नॉ..तु तो समझता है ना, हम सुंदर गायिका क्यों ढूंढ रहे हैं? जल्दी कुछ कर यार,कुछ कर...!!"

बिरबल- "जहाँपनाह, आप बेग़म से इतना डरते क्यों हैं..!! अगर ऐसी बात है तो, आप सबकुछ मुझ पर छोड़ दीजिए, मैं कुछ करता हूँ ।"

तुरंत,सिर पर पैर लिए, बिरबल, महल की ओर भागे..!! बेग़म साहिबा को,पता नहीं बिरबल ने क्या समझाया कि, शाम होते होते ही, बेग़म ने ज़िद त्याग कर, अपनी सहेली को उसके गाँव परत भेज दिया..!!

बादशाह को जब, ये बात  ज्ञात हुई कि, बेग़म की सहेली वापस गाँव चली गई है तब,उन्होंने बिरबल को, ढेर सारे इनाम से नवाज़ा और पूछा,

"यार..तुमने ऐसा क्या किया कि, बेग़म ने अपनी ज़िद त्याग कर, अपनी सहेली को,गाँव  भगा दिया?

बिरबल ने गंभीर होकर,बादशाह सलामत से कहा-" कुछ खास नहीं,जहाँपनाह..!! मैंने तो बेग़म साहिबा को सिर्फ इतना ही कहा कि, बादशाह सलामत, भरे दरबार में बूढ़े तानसेन के आलाप सुन सुन कर बोर हो गए हैं..!!  इसलिए अब एक माह के लिए, जहाँपनाह को, भरे दरबार की जगह, हमामख़ाने में, अपने मनोरंजन के लिए, अत्यंत सुंदर, रूपमती, बाथरूम सिंगर को एपॉइन्ट करना है..!!"

बादशाह, " यु आर वैरी स्मार्ट,बिरबल..,फिर क्या हुआ?"

बिरबल," फिर क्या? बेग़म साहिबा को मैंने समझाया, आपकी सहेली बहुत खूबसूरत है, अगर बादशाह ने, उसे हमेशा रख लिया तब तो पक्का, आपका स्थान ख़तरे में है..!!"

बादशाह-"शाबाश, बिरबल, ये ले, उपहार में, ये नौलखा हार भी रख और बता, बाद में क्या हुआ?"

बिरबल -" बाद में? बाद में, बेग़म साहिबा ने, तानसेनजी को तलब करके उनकी पी.एल (छुट्टियाँ) रद्द कर दी..!!"

बादशाह-" अ...रे, या..आ..आ..र..!! ये क्या हो गया?"

आधुनिक बोध- नारी को समझाने के लिए, नारीमें छुपे जन्मजात इर्ष्याभाव को जाग्रत करके उसका कुशलता से सदुपयोग करने में कोई बुराई नहीं है..!!


मार्कण्ड दवे ।दिनांक-३०-०४-२०११.
=============

प्यारे दोस्तों,
अगर आप मूल रचनाकार हैं,तो आपके सृजनकी रक्षा के लिए, निम्न आलेख, मेरे ब्लॉग पर, आकर ज़रूर पढें ।

कॉपीराइट एक्ट | HELPFUL HAND BOOK

http://mktvfilms.blogspot.com/2011/04/helpful-hand-book.html

(प्रतिलिपि अधिकार अधिनियम)

 (HELPFUL HAND BOOK)


भड़कीला सवाल- " डॉमेस्टिक वायॉलन्स एक्ट २००५ भी, एक तरह से कॉपी राइट भंग का कानून है क्या?"


चटकीला जवाब-"शायद, मगर अच्छा है कि,किसी के सास-ससुर, अपने मौलिक सृजन,(बेटी) का विवाह करने के पश्चात उसे, अपनी कॉपी राइट प्रोटेक्टेड मिल्कियत मान कर, बेटी में देखे गए, शारीरिक,मानसिक,आर्थिक और सामाजिक स्तर के बदलाव का हिसाब माँगकर, कॉपी राइट एक्ट उल्लंघन का नोटिस नहीं भेजते हैं वर्ना, कोई भी दामाद का बच्चा, सास-ससुर के इस अनमोल मौलिक सृजन को, शादी के दिन जैसा, तरोताज़ा कहाँ रख पाता है?"

मार्कण्ड दवे । दिनांक- २७ नवम्बर २०१०.

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

बेवकूफ पत्नी से डरना चालाक पतियों की चतुराई है ..........अरशद अली

शर्मा जी आधुनिकता का मजाक उड़ा रहे थे.
आँखे गोल-गोल नचा रहे थे

तभी फोन घनघना गया
भरी मीटिंग को एक कॉल खा गया

फोन उठते हीं मिसेज शर्मा ने नमस्कार किया
अनमने ढंग से शर्मा जी ने नमस्कार सिव्कार किया

पत्नी का एक तुगलकी फरमान आया था
शाम में बच्चों को घुमाने ले जाना है,याद कराया था

मैंने पूछा

मिसेज शर्मा तो बड़ी शालीनता से बात कह गयीं

शर्मा जी कहे,

पत्नी की शालीनता एक तरह की शामत है.....
कहते हीं शर्मा जी चुप हो गए

पूछा विषय तो अच्छा चुना है,मौन क्यों धारण कर गए

शर्मा जी कहे,

जैसे वाक्य कहा पत्नी का ख्याल आ गया
अच्छा आप भी अन्य पतियों की तरह ,पत्नी से डर गए

कौन कहता है ,सारे पती डरते हैं
पत्नी तो डराने के लिए हीं बनी है

मगर चालाक पती तो डरने का नाटक करते हैं

पूछा ,चलिए नाटक हीं सही
अब इस नाटक का कारण तो बतलाइये

शर्मा जी ने कहा,

शादी के बाद हर शेर को सवा शेर मिल जाता है
हेकड़ी पती करे या पत्नी,चोट तो पती को हीं आता है

अतः पत्नी के दहाड़ का उत्तर मिमिया के देने में भलाई है
बेवकूफ पत्नी से डरना चालाक पतियों की चतुराई है

चलिए बात को यहीं बिराम देता हूँ
पत्नी ने जल्दी बुलाया है इसी बात पर ध्यान देता हूँ

अन्यथा इस बात पर पत्नी को चिल्लाना होगा
खामखा मुझे उसके सामने फिर से मिमियाना होगा...


---अरशद अली---

उल्लू बनाती हो?


एक दिन मामला यों बिगड़ा
कि हमारी ही घरवाली से

हो गया हमारा झगड़ा
स्वभाव से मैं नर्म हूँ

इसका अर्थ ये नहीं
के बेशर्म हूँ

पत्ते की तरह काँप जाता हूँ
बोलते-बोलते हाँफ जाता हूँ

इसलिये कम बोलता हूँ
मजबूर हो जाऊँ तभी बोलता हूँ

हमने कहा-"पत्नी हो
तो पत्नी की तरह रहो

कोई एहसान नहीं करतीं
जो बनाकर खिलाती हो

क्या ऐसे ही घर चलाती हो
शादी को हो गये दस साल

अक्ल नहीं आई
सफ़ेद हो गए बाल

पड़ौस में देखो अभी बच्ची है
मगर तुम से अच्छी है

घर कांच सा चमकता है
और अपना देख लो

देखकर खून छलकता है
कब से कह रहा हूँ

तकिया छोटा है
बढ़ा दो

दूसरा गिलाफ चढ़ा दो
चढ़ाना तो दूर रहा

निकाल-निकाल कर रूई
आधा कर दिया

और रूई की जगह
कपड़ा भर दिया

कितनी बार कहा
चीज़े संभालकर रखो

उस दिन नहीं मिला तो नहीं मिला
कितना खोजा

और रूमाल कि जगह
पैंट से निकल आया मोज़ा

वो तो किसी ने शक नहीं किया
क्योकि हमने खट से

नाक पर रख लिया
काम करते-करते टेबल पर पटक दिया-

"साहब आपका मोज़ा।"
हमने कह दिया

हमारा नहीं किसी और का होगा
अक़्ल काम कर गई

मगर जोड़ी तो बिगड़ गई
कुछ तो इज़्ज़त रखो

पचास बार कहा
मेरी अटैची में

अपने कपड़े मत रखो
उस दिन

कवि सम्मेलन का मिला तार
जल्दी-जल्दी में

चल दिया अटैची उठाकर
खोली कानपुर जाकर

देखा तो सिर चकरा गया
पजामे की जगह

पेटीकोट आ गया
तब क्या खाक कविता पढ़ते

या तुम्हारा पेटीकोट पहनकर
मंच पर मटकते

आगे जारी ....

प्रस्तुत कविता पृसिद्ध हास्य कवी श्री शैल चतुर्वदी जी की है और कविता कोष से साभार ली गयी है

गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

किसकी प्रॉबलम ज्यादा बड़ी है !!

दो व्यक्ति एक बार में बैठे थे .....

एक ने कहा ...." यार.... बहुत फेमिली प्रॉब्लम है

"दूसरा व्यक्ति : तु पहले मेरी सुन.......
मैंने एक विधवा महिला से शादी की
जिसके एक लड़की थी ...
कुछ दिनों बाद पता चला कि

मेरे पिताजी को उस विधवा महिला कि पुत्री से प्यार है ..
और उन्होने इस तरह मेरी ही लड़की से शादी कर ली ..

अब मेरे पिताजी मेरे दामाद बन गए और मेरी बेटी मेरी माँ बन गयी..
और मेरी ही पत्नी मेरी नानी हो गयी !!

ज्यादा प्रॉब्लम तब हुई जब जब मेरे लड़का हुआ
अब मेरा लड़का मेरी माँ का भाई हो गया तो

इस तरह मेरा मामा हो गया . परिस्थिति तो तब ख़राब हुई
जब मेरे पिताजी को लड़का हुआ

मेरे पिताजी का लड़का यानी मेरा भाई मेरा ही नवासा हो गया
और इस तरह मैं स्वयं का ही दादा हो गया
और स्वयं का ही पोता बन गया

और तू कहता है कि तुझे फेमिली प्रॉब्लम है !!

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

दो और दो कितने होते हैं...


एक सरकारी कार्यालय में एकाउन्टेन्ट के पद के लिए एक उम्मीदवार का इंटरव्यू लिया जा रहा था...

परीक्षक ने पूछा : दो और दो कितने होते हैं...?

सवाल सुनकर उम्मीदवार उठा और आहिस्ते से कमरे का दरवाजा खोलकर बाहर झांका...

फिर उसने झुककर मेज के नीचे झांका... कहीं कोई न था...

फिर वह सारे खिड़की-दरवाजे बन्द कर परीक्षक के कान में फुसफुसाया :

कितने होते हैं, इसको मारिए गोली... आप बताइए सर, आप कितने करवाना चाहते हैं...?

उसे बिना और कोई सवाल पूछे नौकरी पर रख लिया गया.

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

दीपक बुझाने के लिए...


एक युगल की शादी को कई साल हो गए, लेकिन उनके घर बच्चा न हुआ...

डॉक्टरों-हकीमों की भी मदद ली, लेकिन व्यर्थ...

आखिरकार, वे ईश्वर की सहायता लेने के उद्देश्य से एक साधु के पास पहुंचे...

साधु ने उनकी व्यथा सुनकर द्रवित होते हुए आश्वासन दिया,

"बेटे, तुम बिल्कुल सही समय पर आए हो...

मैं कुछ वर्ष के लिए तपस्या करने हिमालय पर्वत पर जा रहा हूं...

उसी तपस्या के दौरान मैं तुम दोनों के लिए भी एक दीपक जलाऊंगा,

जिससे तुम्हें अवश्य ही संतान प्राप्त होगी..."

लगभग 15 वर्ष बाद तपस्या के समापन पर जब साधु महाराज लौटे,

उस दंपति का हाल जानने के लिए उनके घर पहुंचे...

जैसे ही दरवाजा खुला, साधु ने देखा कि लगभग एक दर्जन बच्चे आंगन में

धमा-चौकड़ी कर रहे हैं और हैरान-परेशान-सी वही महिला उनके बीच खड़ी है...

साधु ने महिला से पूछा, "बेटी, क्या ये सब तुम्हारे ही बच्चे हैं...?"

महिला ने प्रणाम कर जवाब दिया, "जी महाराज..."

साधु बोला, "प्रभु को कोटि-कोटि धन्यवाद... मेरी तपस्या सफल हुई...

अच्छा, यह बताओ, तुम्हारे पति दिखाई नहीं दे रहे, कहां गए हैं...?"

महिला ने जानकारी दी, "महाराज, वह हिमालय पर्वत पर गए हैं..."

साधु ने हैरान होकर पूछा, "वह हिमालय पर्वत पर क्या करने गए हैं...?"

महिला ने उत्तर दिया, "जो दीपक आपने जलाया था, उसे बुझाने के लिए..."

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

नेता है तो देश है..!!

नेता है तो देश  है..!!




(courtesy Google Images)


नेता नेता क्या करता है, नेता है तो देश  है..!!
छद्म छलावा, रूप निराला,क्यों करता अंदेश* है? (संदेह)*

 
क्यों करता अंदेश* है?मौज उड़ा ले,जश्न मना ले,
नानी तेरी मर गई क्या, फटीं हुई क्यों  ड्रेस है?
नेता नेता क्या करता है, नेता है तो देश  है..!!


फटीं हुई क्यों ड्रेस है,पहन साड़ी,खादी पहन,
नहीं तो तु,बर्बादी पहन,तेरे नाम संदेश है..!!
नेता नेता क्या करता है, नेता है तो देश  है..!!


तेरे नाम संदेश है,गांधी बेच दिया,नेहरू बेचा,
तु  है बाक़ी,तु  भी आजा,क़ीमत राशि कैश  है..!!
नेता  नेता  क्या  करता है, नेता है तो देश  है..!!


क़ीमत राशि कैश है,बिका नहीं तो,रह जायेगा,
जो  मिले  अमृत  बराबर,किस्मत तेरी ऐश है..!!
नेता  नेता  क्या  करता  है, नेता है तो देश  है..!!

 
किस्मत तेरी ऐश है,कल बिका तो ज़हर बराबर,
देख ले अपनी  ओर  ज़रा, लगता तु दरवेश है..!!
नेता  नेता  क्या  करता  है, नेता  है  तो देश  है..!!

 
लगता  तु  दरवेश है, भूखों मरेगा,कष्ट सहेगा,
मस्त हो जा, भ्रष्ट हो जा, हमें देता क्यों ठेस है..!!
नेता  नेता  क्या  करता  है, नेता है तो देश  है..!!
छद्म  छलावा, रूप निराला, करता क्यों संदेह है?


मेरा ब्लॉगः-
http://mktvfilms.blogspot.com/2011/04/blog-post_25.html
मार्कण्ड दवे । दिनांक-२५-०४-२०११.

'कबीर' नहीं बन सकता .....

हमनें एक बेरोज़गार मित्र को पकड़ा
और कहा, "एक नया व्यंग्य लिखा है, सुनोगे?"

तो बोला, "पहले खाना खिलाओ।"
खाना खिलाया तो बोला, "पान खिलाओ।"
पान खिलाया तो बोला, "खाना बहुत बढ़िया था
उसका मज़ा मिट्टी में मत मिलाओ।
अपन ख़ुद ही देश की छाती पर जीते-जागते व्यंग्य हैं

हमें व्यंग्य मत सुनाओ
जो जन-सेवा के नाम पर ऐश करता रहा
और हमें बेरोज़गारी का रोजगार देकर
कुर्सी को कैश करता रहा।

व्यंग्य उस अफ़सर को सुनाओ
जो हिन्दी के प्रचार की डफली बजाता रहा
और अपनी औलाद को अंग्रेज़ी का पाठ पढ़ाता रहा।

व्यंग्य उस सिपाही को सुनाओ
जो भ्रष्टाचार को अपना अधिकार मानता रहा
और झूठी गवाही को पुलिस का संस्कार मानता रहा।

व्यंग्य उस डॉक्टर को सुनाओ
जो पचास रूपये फ़ीस के लेकर
मलेरिया को टी०बी० बतलाता रहा
और नर्स को अपनी बीबी बतलाता रहा।

व्यंग्य उस फ़िल्मकार को सुनाओ
जो फ़िल्म में से इल्म घटाता रहा
और संस्कृति के कपड़े उतार कर सेंसर को पटाता रहा।

व्यंग्य उस सास को सुनाओ
जिसने बेटी जैसी बहू को ज्वाला का उपहार दिया
और व्यंग्य उस वासना के कीड़े को सुनाओ
जिसने अपनी भूख मिटाने के लिए
नारी को बाज़ार दिया।

व्यंग्य उस श्रोता को सुनाओ
जो गीत की हर पंक्ति पर बोर-बोर करता रहा
और बकवास को बढ़ावा देने के लिए
वंस मोर करता रहा।

व्यंग्य उस व्यंग्यकार को सुनाओ
जो अर्थ को अनर्थ में बदलने के लिए
वज़नदार लिफ़ाफ़े की मांग करता रहा
और अपना उल्लू सीधा करने के लिए
व्यंग्य को विकलांग करता रहा।

और जो व्यंग्य स्वयं ही अन्धा, लूला और लंगड़ा हो
तीर नहीं बन सकता
आज का व्यंग्यकार भले ही "शैल चतुर्वेदी" हो जाए
'कबीर' नहीं बन सकता।

प्रस्तुत कविता पृसिद्ध हास्य कवी श्री शैल चतुर्वदी जी की है और कविता कोष से साभार ली गयी है

आपने कहाँ किया निवेश ....

सोना - 29 प्रतिशत
XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX
चांदी - 74 प्रतिशत
XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX
कच्चा तेल - 40 प्रतिशत
XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX
सेन्सेक्स -36 प्रतिशत
XXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXXX
...और

प्याज़ -980 प्रतिशत...

अरे यार ,

एक लाख के प्याज़ खरीदे होते,
तो आज करोडपति हो जाता

रविवार, 24 अप्रैल 2011

लौट के बुद्धु आया घर ....

गधे नें सीख लिया कंप्यूटर

बैठा रहता दिन-दिन भर

वो अपने काम को जाता

न ही बच्चों से बतियाता

करता रहता दिन भर चैट

दोस्त बन गए उसके रैट

आया जीवन में बदलाव

खाने लगा गधा भी भाव

कुछ दिन तक तो चली कहानी

खत्म हो गया राशन पानी

गधी नें बेलन एक उठाया

गधे के जा सर पर घुमाया

भागा अपनी बचा के जान

पहुंचा धोबी की दुकान

दिन भर बोझा खूब उठाया

शाम को घर जब वापिस आया

चूर हो गया गधा थक कर

सोया खूब पेट भर कर

भूल गया उसको कंप्यूटर

लौट के बुद्धु आया घर

यह कविता http://www.nanhaman.blogspot.com/ से ली गयी है

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

रिजेक्स्न लैटर या अपोइंटमेंट लैटर !


लालू प्रसाद जी ने अपना बायो-डाटा माइक्रोसॉफ्ट कारपोरेशन,

युएसए
में नौकरी के पाने के लिए अप्लाई किया!

कुछ
दिनों बाद वहां से रिप्लाई आया :


Dear Mr. Laloo Prasad,
You do not meet our requirements.

Please do not send any further correspondence.


No phone call shall be entertained.


Thanks Bill Gates.


लालू प्रसादजी खुशी के मारे उछलने लगे इस रिप्लाई को पड़ने के बाद.

और उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस की व्यवस्था की :


"भाइयों और बहनों,आप को जान कर ख़ुशी होगी की हमको अमेरीका में नौकरी मिल गयी है।

" हर कोई आश्चर्य चकित था .
लालू जी बोलते रहे ... ..

"अब हम आप सब को अपना अपोईंमेंट लैटर पढ़कर सुनाऊंगा,

पर लैटर अंग्रेजी में है - इसलिए साथ साथ हिंदी में ट्रांसलेट भी करूंगा।

प्यारे लालू प्रसाद भैय्या

You do not meet----आप तो मिलते ही नहीं हो


our requirement --हमको तो ज़रुरत है


Please do not send any further correspondence --

अब लैटर वैटर भेजने का कौना ज़रुरत नाही


No phone call----फोनवा का भी ज़रुरत नाही है


shall be entertained ---बहुत खातिर की जायेगी.


Thanks----आपका बहुत बहुत धन्यवाद.


Bill Gates----तोहार बिलवा.

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

"क्या सभी मर गये थे ???"


नेताओं से भरी एक बस जा रही थी. अचानक बस रोड़ छोड़ कर नीचे खेत में एक
पेड़ से जा टकरायी.

एक बुढ़ा किसान जिसका वह खेत था दौड़ता हुआ आया. सब कुछ
देख उसने एक गड्ढा खोदना शुरू किया और फ़िर उसमे नेताओं को दफ़ना दिया.

कुछ दिन बाद स्थानीय प्रशासन को बस के एक्सीडेंट के बारे में पता लगा,
उन्होने किसान से पुछा की सारे नेता कहाँ गये.

किसान ने बताया की उसने सभी को दफ़ना दिया है..
"क्या सभी मर गये थे???" आश्चर्यचकित हो पुछा गया

किसान ने बताया " नही! कुछ कह रहे थे की वो नही मरे,
पर आप तो जानते ही है की ये नेता झुठ कितना बोलते है..."

गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

औरत पालने को कलेजा चाहिये .....

एक दिन बात की बात में
बात बढ़ गई
हमारी घरवाली
हमसे ही अड़ गई
हमने कुछ नहीं कहा
चुपचाप सहा

कहने लगी-"आदमी हो
तो आदमी की तरह रहो
आँखे दिखाते हो
कोइ अहसान नहीं करते
जो कमाकर खिलाते हो
सभी खिलाते हैं
तुमने आदमी नहीं देखे
झूले में झूलाते हैं

देखते कहीं हो
और चलते कहीं हो
कई बार कहा
इधर-उधर मत ताको
बुढ़ापे की खिड़की से
जवानी को मत झाँको
कोई मुझ जैसी मिल गई
तो सब भूल जाओगे
वैसे ही फूले हो
और फूल जाओगे

चन्दन लगाने की उम्र में
पाउडर लगाते हो
भगवान जाने
ये कद्दू सा चेहरा किसको दिखाते हो
कोई पूछता है तो कहते हो-
"तीस का हूँ।"
उस दिन एक लड़की से कह रहे थे-
"तुम सोलह की हो
तो मैं बीस का हूँ।"

वो तो लड़की अन्धी थी
आँख वाली रहती
तो छाती का बाल नोच कर कहती
ऊपर ख़िज़ाब और नीचे सफेदी
वाह रे, बीस के शैल चतुर्वेदी

हमारे डैडी भी शादी-शुदा थे
मगर क्या मज़ाल
कभी हमारी मम्मी से भी
आँख मिलाई हो
मम्मी हज़ार कह लेती थीं
कभी ज़ुबान हिलाई हो

कमाकर पांच सौ लाते हो
और अकड़
दो हज़ार की दिखाते हो
हमारे डैडी दो-दो हज़ार
एक बैठक में हाल जाते थे
मगर दूसरे ही दिन चार हज़ार
न जाने, कहाँ से मार लाते थे

माना कि मैं माँ हूँ
तुम भी तो बाप हो
बच्चो के ज़िम्मेदार
तुम भी हाफ़ हो
अरे, आठ-आठ हो गए
तो मेरी क्या ग़लती
गृहस्थी की गाड़ी
एक पहिये से नहीं चलती

बच्चा रोए तो मैं मनाऊँ
भूख लगे तो मैं खिलाऊँ
और तो और
दूध भी मैं पिलाऊँ
माना कि तुम नहीं पिला सकते
मगर खिला तो सकते हो
अरे बोतल से ही सही
दूध तो पिला सकते हो

मगर यहाँ तो खुद ही
मुँह से बोतल लगाए फिरते हैं
अंग्रेज़ी शराब का बूता नहीं
देशी चढ़ाए फिरते हैं
हमारे डैडी की बात और थी
बड़े-बड़े क्लबो में जाते थे

पीते थे, तो माल भी खाते थे
तुम भी चने फांकते हो
न जाने कौन-सी पीते हो
रात भर खांसते हो

मेरे पैर का घाव
धोने क्या बैठे
नाखून तोड़ दिया
अभी तक दर्द होता है
तुम सा भी कोई मर्द होता है?

जब भी बाहर जाते हो
कोई ना कोई चीज़ भूल आते हो
न जाने कितने पैन, टॉर्च
और चश्मे गुमा चुके हो

अब वो ज़माना नहीं रहा
जो चार आने के साग में
कुनबा खा ले
दो रुपये का साग तो
अकेले तुम खा जाते हो

उस वक्त क्या टोकूं
जब थके मान्दे दफ़्तर से आते हो
कोई तीर नहीं मारते
जो दफ़्तर जाते हो
रोज़ एक न एक बटन तोड़ लाते हो

मैं बटन टाँकते-टाँकते
काज़ हुई जा रही हूँ
मैं ही जानती हूँ
कि कैसे निभा रही हूँ
कहती हूँ, पैंट ढीले बनवाओ
तंग पतलून सूट नहीं करतीं

किसी से भी पूछ लो
झूठ नहीं कहती
इलैस्टिक डलवाते हो
अरे, बेल्ट क्यूँ नहीं लगाते हो
फिर पैंट का झंझट ही क्यों पालो
धोती पहनो ना,
जब चाहो खोल लो
और जब चाहो लगा लो

मैं कहती हूँ तो बुरा लगता है
बूढ़े हो चले
मगर संसार हरा लगता है
अब तो अक्ल से काम लो
राम का नाम लो
शर्म नहीं आती
रात-रात भर
बाहर झक मारते हो

औरत पालने को कलेजा चाहिये
गृहस्थी चलाना खेल नहीं
भेजा चहिये।"

यह कविता श्री शैल चतुर्वेदी जी की है और कविता कोश से साभार ली गयी है

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

परिवार की पत संभाले, वही है पत्नी..!!(इज्जत)

परिवार की पत संभाले, वही है पत्नी..!!(इज्जत)
(Courtesy Google images)

प्रिय मित्र,
 
एक बार, एक पति देव से किसी ने सवाल किया,"पति-पत्नी के बीच विवाह - विच्छेद होने की प्रमुख वजह क्या है?"
 
विवाहित जीवन से त्रस्त पति ने कहा,"शादी..!!"
 
हमें तो इनका जवाब शत-प्रतिशत सही लगता है.!!
 
मानव नामक नर-प्राणी,  वयस्क होते ही, अपना जीवन साथी पसंद करने के बारे में, अपनी बुद्धिमत्ता और समझदारी से,कुछ ख्याल को पाल-पोष कर,उसके अनुरूप किसी नारी के साथ विवाह के बंधन में बंध जाता है । 

फिर आजीवन ऐसी गलतफ़हमी में जीता है कि, मेरी पत्नी, मेरे उन ख्याल के अनुरूप, बानी-व्यवहार अपना कर,सहजीवनका सच्चा धर्म निभा रही है..!!
 
पर, सत्य हकीक़त यही होती है कि, विवाह के पश्चात, पति देव के ख्यालात आहिस्ता-आहिस्ता कब बदल कर पत्नी के रंग में रंग जाते हैं,पता ही नहीं चलता..!!
 
वैसे, अगर कोई पति अपने सारे विचार पत्नी के विचारों से एकाकार कर दें, इसमें कोई बुराई नहीं है ..!! पर हाँ, पत्नी के अलावा, परिवार के बाकी सदस्य को, अपने बेटे-भाई के ऐसे भोलेपन पर एतराज़ ज़रूर हो सकता है?
 
हालाँकि, पति देव के मुकाबले, जगत की सभी पत्नीओं की, छठी इंद्रिय (sixth sense) बचपन से ही, जाग्रत होने की वजह से, वह ये बात अच्छी तरह जानती हैं कि, विवाहित जीवन सुखद बनाने के लिए, पति को समझने में ज्यादा समय व्यतित करना चाहिए और  उसे प्यार करने में कम से कम..!!
 
इसी तरह, पति देव भी, अपने नर-प्राणी होने की गुरूताग्रंथी से ग्रसित होकर, शादी के बाद थोड़े ही दिनों में समझ जाता है कि, विवाहित जीवन सुखद बिताने के लिए, पत्नी को प्रेम करने का दिखावा करने में ज्यादा समय देना चाहिए और उसे समझने के लिए कम से कम..!! (जिसे बनाने के बाद, खुद ईश्वर आजतक समझ न पाया हो, उसे कोई पति क्या ख़ाक समझ पाएगा?)
 
इसीलिए,ऐसा कहा जाता है कि, जीवन में दो बार आदमी, औरत को समझ नहीं पता,(१) शादी से पहले (२)शादी के बाद..!!
 
पत्नी को समझने में अपना दिमाग ज्यादा खर्च न करने के कारण ही, विवाहित पुरूष,किसी कुँवारे मर्द के मुकाबले ज्यादा लंबी आयु बिताते है, ये बात और है कि, विवाह करने के बाद, ज्यादातर पति देव (मर्द) लंबी आयु भुगतने के लिए राज़ी नहीं होते..!!
 
हिंदुस्तान में पत्नी की परिभाषा |
 
भारत में हिंदु धर्म के अनुसार, `पत्नी` ऐसी नारी है, जो अपने पति के साथ, अपनी पहचान सहित, घर संसार के सभी विषय,चीज़ में,समान अधिकार रखती हो,जीवन के निर्णय एक दूसरे के साथ मिलकर करती हो,अपने परिवार के सभी सदस्य के आरोग्य,अभ्यास एवं अन्य ज़िम्मेदारी का वहन करती हो । 
 
हमारे देश में करीब, ९० % विवाह,पति-पत्नी के दोनो परिवारों की सहमति से  (Arranged Marriages) किए जाते हैं । जिस में धर्म,जाति,संस्कृति और एक जैसी आर्थिक सक्षमता-समानता को ध्यान में रख कर, ये विवाह संबंध जोड़े जाते हैं।

सन-१९६०-७० के दशक तक तो, भारत के कई प्रांत में,घर के मुखिया की पसंद के आगे, नतमस्तक होकर, हाँ-ना कुछ कहे बिना ही विवाह करने का रिवाज़ अमल में था । हालाँकि, ऐसे रिवाज़ के चलते कई पति-पत्नी आज भी मन ही मन अपना जीवन, किसी बेढंगी बैलगाडी की रफ़्तार से, मजबूर होकर, बेमन से संबंध निभा रहे होंगे..!!
 
मुझे सन-१९५८ का एक,ऐसा ही किस्सा याद आ रहा है, हमारे गुजरात के एक गाँव में, किसी कन्या को देखने के लिए गए हुए,एक युवक और उसके माता पिता को, भोजन का समय होते ही, कन्या के माता-पिता ने, मेहमानों को भोजन ग्रहण करने के लिए प्रेमपूर्वक आग्रह किया, जिसे मेहमान ठुकरा न सके । उधर  कन्या के परिवार को लगा कि, विवाह के लिए सब राज़ी है,तभी तो हमारे घर का भोजन मेहमानोंने ग्रहण किया है..!! अतः विवाह वांच्छूक युवक की झूठी थाली में, उस कन्या को उसकी माता ने भोजन परोसा । मारे शर्म के कन्या ने, अपने होनेवाले पति का झूठा  भोजन ग्रहण किया..!! हिंदु शास्त्र की मान्यता के अनुसार, जो कन्या ऐसे समय किसी युवक का झूठा खा लेती हैं तो, वह दोनों विवाह के लिए राज़ी है ऐसा माना जाता है ।
 
हालाँकि,बाद में पता चला कि, कन्या का वर्ण  श्याम होने के कारण, युवक इस कन्या से विवाह करने को राज़ी न था, पर परिवार के मुखिया के दबाव में आकर, उस युवक को अंत में, उसी कन्या से शादी करनी पड़ी..!!
 
"न हि विवाहान्तरं वरवधूपरीक्षा ।"  
 
अर्थातः- विवाह संपन्न होने के बाद  वर-वधु की जाति पूछना निरर्थक है ।   
 
पत्नी कैसी होनी चाहिए? सर्वगुण संपन्न पत्नी की व्याख्या यह है कि,
 
कार्येषु मंत्री, करणेषु दासी, भोज्येषु माता, शयनेषु रम्भा   ।
धर्मानुकूला क्षमया धरित्री । भार्या च षाड्गुण्यवतीह दुर्लभा ॥

 
कार्य प्रसंग में मंत्री, गृह कार्य में दासी, भोजन कराते वक्त माता, रति प्रसंग में रंभा, धर्म में सानुकुल, और क्षमा करने में धरित्री; इन छे गुणों से युक्त पत्नी मिलना दुर्लभ है ।
 
तमिल भाषा में, पत्नी को, “Manaivee”, अर्थात `घर का प्रमुख प्रबंधक` कहा गया है ।
 
आज भी ऐसी मान्यता है कि,"शादी-ब्याह, ईश्वर के यहाँ, पहले से तय हो जाते हैं । हम तो सिर्फ निमित्तमात्र है ।"
 


आलेख के प्रारंभ में, भले ही मैंने ये लिखा है कि, नारी को समझने का प्रयत्न,पुरूष को नहीं करना चाहिए..!! पर सच्चाई ये है कि,अगर विवाह वांच्छुक युवक-युवती, उनकी पहली मुलाकात के वक़्त ही पर्याप्त सावधानी बरतें, तो विवाहित जीवन सुखद होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है ।
 
सन-१९७० के बाद, जाति के बंधन टूटने का चलन बढ़ने की वजह से, आजकल ऐसा समय आ गया है कि, युवक-युवती शादी का फैसला खुद करते हैं जिसमें बाकी परिवारवालों को, अपने मन या बेमनसे, सिर्फ सहमति जताना बाकी होता है । इसके कई कारण है,जैसे कि, आज़ाद पीढ़ी के, आज़ाद नये विचार, सेटेलाईट क्रांति के चलते, पश्चिमी विचारधारा का बढ़ता प्रभाव, परिवार में बड़े-बुजुर्ग का घटता मान और घर से दूर, देश-परदेशमें नौकरी-धंधे के कारण, अपने समाज से अलग होने के संयोग, संतान के पुख्त होने के बाद,उनके स्वतंत्र निर्णय अधिकार के समर्थन में बने कड़े कानून,वगैरह,वगैरह..!! वैसे यह बात अलग है कि, मुग्धावस्था में शारीरिक आकर्षण के कारण, विवाह करने के, त्वरित लिए गए फैसले, कई बार ग़लत साबित होते हैं और पति-पत्नी दोनों,`न घर के न घाट के` हो जाते हैं..!!
 
हमारे देश में मनोरंजन के नाम पर, प्रसारित हो रही करीब-करीब सारी सिरियल्स में, परिवार की किसी एक बहु को `वॅम्प-अनिष्ट`के रूप में पेश करके, कथा को रोचक बनाने के मसाले कूटे जाते हैं, यह देखकर मैं सोचता हूँ, ये सारे चेनल्सवाले,किसी भी नारी को इतना ख़राब क्यों दर्शाते हैं? मगर कहानियाँ भी तो वास्तविक जीवन से ही लिखी जाती है, क्या पुरूष-क्या नारी? समाज में ऐसे अनिष्ट मौजूद है, इतना ही नहीं, ये बड़े दुर्भाग्य की बात है कि, उनकी देखा देखी, दूसरे अच्छे लोग भी, अपनी मनमानी करने के लिए, ऐसे बुरे शॉर्ट कट अपनाने लगे हैं ।
 
कर्कशा पत्नी का क्या करें?
 
हमारे देश की संस्कृति में जहाँ,`नारी को नारायणी (देवी)` का रूप माना गया हैं, उससे बिलकुल विपरीत, ऐसी कहावत भी प्रचलित है कि, "नारी अगर वश में रहे तो अपने आप से, और अगर बिगड़े तो जाएं सगे बाप से..!!" 

अर्थात नारी को प्यार से रखें तो किसी एक पुरूष के अधिपत्य में आजीवन रहती है, पर एक हद से ज्यादा, उसे प्रताडित किया जाए, तो वह अपने सगे बाप का अधिपत्य भी स्वीकारने से इनकार कर सकती है..!!"
 
हालाँकि,कर्कशा पत्नीओं की कलयुगी कहानी कोई नयी बात नहीं है, राम राज्य में भी कैकेयी-मंथरा की जुगलबंदीने, राजा दशरथ को सचमुच खटीया (मृत्युशैया) पकड़ने पर मजबूर करके, राजा  की खटीया खड़ी कर दी थी । इसी प्रकार महाभारत का भीषण युद्ध भी इर्षालु कर्कशा पत्नीओं के कारण ही हुआ था..!!

 
महान आयरिश नाट्य कार, जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ( George Bernard Shaw 26 July 1856 – 2 November 1950) कहते हैं कि," जिसकी पत्नी कर्कशा-झगड़ालू होती है, उसका पति बहुत अच्छा कवि-चिंतक-विवेचक-नाट्य कार बन सकता है..!! (इस श्रेणी में, मुझे मत गिनना, मैं अपवाद हूँ..!!)
 
एकबार, एक कंपनी की ऑफ़िस में, काम से सिलसिले से मैं गया । वहाँ दोपहर की चाय-पानी का विराम काल था और कंपनी  के आला अधिकारी के साथ पूरा स्टाफ मौजूद था, ऐसे में किसी बात पर स्टाफ के एक मेम्बर ने कबूल कर लिया कि, घर में उसकी पत्नी का राज है और वह अपनी पत्नी का चरण दास है..!! फिर तो क्या था..!! जैसे अपने मन में भरे पड़े, दबाव से सब लोग छुटकारा चाहते हो, धीरे-धीरे सब स्टाफ मेम्बर्स ने कबूल किया कि, वे सब पत्नी के चरण दास है और पत्नी के आगे उनकी एक नहीं चलती..!! बाद में, सारे स्टाफ मेम्बर्स चेहरे पर मैंने,`शेठ ब्रधर्स का हाजसोल चूरन` लेने के बाद हल्के होने के भाव को उभरते देखा..!!
 
कर्कशा पत्नी को सुधारने का सही उपाय शायद यही है कि, आप पूर्ण निष्ठा भाव से, उनके चरण दास बन जाइए, बाकी सबकुछ अपने आप ठीक हो जाएगा? अगर कुछ  ठीक नहीं भी हो पाया तो, कम से कम, घर का माहौल ज्यादा बिगाड़ने से तो बच ही जाएगा..!! वर्ना..किसी रोज़ घरेलू हिंसा के, तरकटी मुक़द्दमों में फँस कर, पुलिसस्टेशन - कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने शुरू हो सकते हैं?
 
प्यारे दोस्तों,सत्य तो यही है कि,
 
१. तमाम जगह और घर-परिवार में आप पत्नी का आदर करें ।
 
२. पत्नी को ग़ुलाम या बगैर वेतन की काम वाली बाई जैसा मत समझें ।
 
३. पत्नी के प्रति आपके प्यार को, मन में ही दबाकर मत रखें, समय-समय पर उसके साथ वक़्त बीता कर, उससे प्यार का इज़हार करें ।
 
४. कम से कम अपने घर में, ऑफ़िस का रूआब मत झाड़िए,याद रखें, घर में आपकी पत्नी ही आपकी बॉस होती है..!!
 
५. सिर्फ पैसा कमाने के उद्यम में मत उलझे रहें, साल में एक-दो बार पत्नी को, दूसरे-तीसरे-चौथे प्रमोदकाल (Honey-Moon) पर ले जाएं ।
 
अगर, उपर दर्शाये सारे उपाय भीम घर का माहौल सुधारने के लिए कारगर साबित न हो,तो फिर,`आशा अमर है ।`
 
सूत्र को आत्मसात करके, कर्कशा पत्नी आज नहीं तो कल सुधर जाएगी, ऐसी उम्मीद पर सारा जीवन बीताएं..!!
एक आखिरी नसिहत,आदरणीय श्री संजीव कुमार, विद्यासिन्हा की फिल्म,"पति-पत्नी और वोह" वाली `वोह` के चक्कर में कभी मत पड़ना, वर्ना आप को भी, रात-दिन ठंडे-ठंडे पानी से नहाने के दिन गुज़ारने का समय आ सकता है..!!
 
वैसे, आज आप भी, अपने सिर पर हाथ रखकर, कसम दोहरायें कि,

"मैं जो कहूँगा सच कहूँगा और सच के अलावा कुछ न कहूँगा..!!"


" क्या आप भी चरण दास हैं?"

"अरे..!! हँसना मना है, भाई..!!"


मार्कण्ड दवे । दिनांक- २०-०४-२०११.

आपमें हिम्मत नहीं की उसे ...


चमन भाई को पता चला की उसके एकाउंटेंट ने उसे ५० करोड़ का चुना लगाया है.

एकाउंटेंट गूंगा और बहरा था. उसे नौकरी पर इसलिये लगाया था की बहरा होने के कारण कभी कोई राज़ की बात सुन नहीं सकेगा, और गूंगा होने के कारण कभी कोर्ट में उसके खिलाफ गवाही नहीं दे सकेगा.

चमन भाई को गूंगे-बहारो के इशारो की समझ नहीं थी इसलिये पूछताछ के लिए अपने दाहिने हाथ "सटकेला" को ले गया जिसे इशारो की समझ थी.

चमन भाई ने एकाउंटेंट से पूछा "बता तुने जो मेरे ५० करोड़ उडाये है वो कहाँ छुपा रखे है?"

सटकेला ने इशारो में एकाउंटेंट से पुछा उसने पैसे कहाँ छुपाये.

एकाउंटेंट ने इशारे में कहाँ : "मैं कुछ नहीं जानता तुम किं पैसो की बात कर रहे हो"

सटकेला ने चमन भाई से कहा: "भाई बोल रहा वो कुछ नहीं जानता हम किं पैसो की बात कर रहे है."

चमन भाई को गुस्सा आ गया और पिस्तौल एकाउंटेंट की कनपट्टी पर रखकर बोला "अब फिर पूछ!"

सटकेला ने इशारों में एकाउंटेंट को कहा: "तुने अगर नहीं बताया और भाई ने घोडा दबा दिया तो समझ ले तेरी वाट लग जायेगी!"

एकाउंटेंट ने डरकर इशारे किये: "अच्छा! में बताता हूँ! मैंने पैसे मेरे चचेरे भाई संतु के घर के पिछवाड़े में गाड़ दिए थे!"

चमन भाई ने पूछा: "क्या बोलता है सटकेला?"

सटकेला ने जवाब दिया: "भाई... बोलता है... की आपमें हिम्मत नहीं की उसे गोली मार सके!!"

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

लालच का अंत ?

       किसी गांव में एक समय चार मित्र बेहतर भविष्य की तलाश में भोजन-पानी की आवश्यक तैयारी के साथ शहर की ओर निकले । रास्ते में विश्राम के समय एक सन्यासी से मुलाकात के बाद उन्होंने अपना मकसद उन सन्यासी को बताया, तब सन्यासी ने उन्हें चार बत्तीयां देते हुए कहा कि सामने दिख रही पहाडी पर तुम जाओ । जहाँ भी कोई बत्ती गिरे वहीं थोडी खुदाई करने पर तुम्हें तुम्हारे उद्देश्य की पूर्ति जितना धन प्राप्त हो जावेगा । सभी ने आपस में विचार-विमर्श कर सन्यासीजी को धन्यवाद दिया और पहाडी की ओर चढना प्रारम्भ किया ।
 
          कुछ दूर चढने पर एक बत्ती गिर गई । सबने वहाँ खुदाई की तो अन्दर लोहा ही लोहा दिखने लगा । एक मित्र ने कहा कि अपना मकसद इस लोहे को बेचकर पूरा हो सकता है । किन्तु बाकि तीनों मित्रों को उसकी बात समझ में नहीं आई । तब वह मित्र वहीं रुककर अपने लिये उस लोहे के भण्डार को ले जाने की व्यवस्था में लग गया और शेष तीनों मित्र आगे निकल गये ।
 
           और थोडी चढाई चढने पर फिर एक बत्ती गिरी । वहाँ तीनों ने खुदाई की तो भरपूर तांबा वहाँ मौजूद पाया । उनमें से फिर एक मित्र बोला ये उस लोहे की तुलना में कहीं अधिक बेहतर विकल्प है और इसमें हम तीनों का भविष्य बन सकता है । तब बाकि दो मित्रों को उसकी बात सही नहीं लगी और वह मित्र तांबे के द्वारा अपना भविष्य संवारने वहीं रुक गया व शेष दोनों मित्र फिर आगे चढने लगे । 
 
            कुछ और उपर चढने पर एक बत्ती फिर गिरी । दोनों मित्रों ने वहाँ खुदाई करके देखा तो वहाँ चांदी की ढेरों सिल्लीयां निकली ।
तब दोनों में से एक मित्र की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा । उसने दूसरे से कहा- वे दोनों तो लोहे और तांबे में ही रह गये यहाँ तो इतनी चांदी मौजूद है कि हमें अब जीवन में कोई कमी ही नहीं रहेगी । किन्तु दूसरे मित्र ने कहा कि ये चांदी तुम ले जाओ मैं अभी और आगे जाऊंगा । तब संतुष्ट मित्र चांदी ले जाने की व्यवस्था में लग गया और दूसरा फिर उपर की ओर निकल गया ।

           वह थोडा ही और उपर पहुंचा कि चौथी बत्ती भी गिरी । उसने वहाँ खुदाई की तो उसकी उम्मीद के मुताबिक वहाँ सोने का खजाना दिखने लगा । अब तो उसकी प्रसन्नता की सीमा न रही । उसने उपर की ओर देखा तो पहाडी की चोटी थोडी ही दूरी पर दिख रही थी । तब उसने सोचा कि ये पहाड तो बहुमूल्य संपदाओं से भरा पडा है और ये बत्तियां तो उन स्वामीजी ने प्रतीक रुप में ही दी हैं । इस सोने पर तो मेरे अलावा अब और किसी का कोई हिस्सा भी नहीं बचा है किन्तु जिस तरह इस पहाड पर लोहा, तांबा, चांदी व सोना मिला है ऐसे ही इस पहाडी की चोटी पर हीरे-जवाहरात भी अवश्य ही मौजूद होंगे । लगे हाथों मैं उस चोटी पर भी देख लूं ।
 
           यह सोचकर वह व्यक्ति उस पहाडी की चोटी पर पहुंचा, लेकिन आश्चर्यजनक तरीके से उसे वहाँ एक ऐसा आदमी दिखा जो हिल-डुल भी नहीं पा रहा था और उसके सिर पर एक बडा सा चक्र धंसा हुआ था जो निरन्तर घूम रहा था । बडे आश्चर्य़ के साथ उसने उस चक्र वाले व्यक्ति से पूछा- आप कौन हैं और आपके सिर में ये चक्र कैसे फंसा घूम रहा है ? उसके इतना पूछते ही चमत्कारिक तरीके से वह चक्र पहले से मौजूद व्यक्ति के सिर से उतरकर पहाड चढने वाले उस अन्तिम चौथे मित्र की सिर में धंस गया । मुक्त होने वाला व्यक्ति उससे बोला- धन्यवाद तुम्हारा जो अपने लालच के कारण तुम उपर तक आगए । अब न तुम्हें कभी भूख-प्यास लगेगी और न ही ये चक्र तुम्हारे सिर से हटेगा । हाँ यदि कोई तुमसे बडा लालची तुम्हारी किस्मत से यहाँ तक आ जावेगा तभी तुम अपनी मुक्ति का कामना कर सकते हो । मैं तो अब इस बोझ से मुक्त होकर जा रहा हूँ ।
 
            पुरातन काल की ये कथा कितनी सत्य या असत्य है ये तो शायद कोई भी नहीं जानता किन्तु लालच का भूत तो ऐसा ही है जिसकी गिरफ्त में देश-दुनिया की नामी-गिरामी शख्सियतें भी सर पर ये चक्र धंसवाए भोजन-पानी कि चिन्ता से कहीं अधिक और बडे भण्डार की तलाश में घूम रही हैं, और भ्रष्टाचार  व विध्वंस के नये-नये तरीके इजाद भी करवा रही हैं ।  आपका
क्या ख्याल है ?


      

हम बहुत बड़ी मुसीबत में फंस गये हैं ......


दो भाई थे। एक की उम्र 8 साल दूसरे की 10 साल। दोनों बड़े ही शरारती थे। उनकी शैतानियों से पूरा मोहल्ला तंग आया हुआ था। मातापिता रातदिन इसी चिन्ता में डूबे रहते कि आज पता नहीं वे दोनों क्या करें।

एक दिन गांव में एक साधु आया। लोगों का कहना था कि बड़े ही पहुंचे हुये महात्मा है। जिसको आशीर्वाद दे दें उसका कल्याण हो जाये। पड़ोसन ने बच्चों की मां को सलाह दी कि तुम अपने बच्चों को इन साधु के पास ले जाओ। शायद उनके आशीर्वाद से उनकी बुध्दि कुछ ठीक हो जाये। मां को पड़ोसन की बात ठीक लगी। पड़ोसन ने यह भी कहा कि दोनों को एक साथ मत ले जाना नहीं तो क्या पता दोनों मिलकर वहीं कुछ शरारत कर दें और साधु नाराज हो जाये।

अगले ही दिन मां छोटे बच्चे को लेकर साधु के पास पहुंची। साधु ने बच्चे को अपने सामने बैठा लिया और मां से बाहर जाकर इंतजार करने को कहा ।

साधु ने बच्चे से पूछा - ”बेटे, तुम भगवान को जानते हो न ? बताओ, भगवान कहां है ?”

बच्चा कुछ नहीं बोला बस मुंह बाए साधु की ओर देखता रहा। साधु ने फिर अपना प्रश्न दोहराया । पर बच्चा फिर भी कुछ नहीं बोला। अब साधु को कुछ चिढ़ सी आई। उसने थोड़ी नाराजगी प्रकट करते हुये कहा - ”मैं क्या पूछ रहा हूं तुम्हें सुनाई नहीं देता । जवाब दो, भगवान कहां है ?” बच्चे ने कोई जवाब नहीं दिया बस मुंह बाए साधु की ओर हैरानी भरी नजरों से देखता रहा।

अचानक जैसे बच्चे की चेतना लौटी। वह उठा और तेजी से बाहर की ओर भागा। साधु ने आवाज दी पर वह रूका नहीं सीधा घर जाकर अपने कमरे में पलंग के नीचे छुप गया। बड़ा भाई, जो घर पर ही था, ने उसे छुपते हुये देखा तो पूछा - ”क्या हुआ ? छुप क्यों रहे हो ?”

”भैया, तुम भी जल्दी से कहीं छुप जाओ।” बच्चे ने घबराये हुये स्वर में कहा। ”पर हुआ क्या ?” बड़े भाई ने भी पलंग के नीचे घुसने की कोशिश करते हुये पूछा।

”अबकी बार हम बहुत बड़ी मुसीबत में फंस गये हैं। भगवान कहीं गुम हो गया है और लोग समझ रहे हैं कि इसमें हमारा हाथ है!”

लोभ का परिणाम

एक लोभी सेठ था एक दिन उसने सोचा की किसी ब्रामण को भोजन कराकर क्यों न पुन्य कमा लिया जाए . इसके लिए उसने एक दुबले पतले ब्रामण की तलाश करना शुरू कर दिया . वह सेठ एक दुबले पतले ब्रामण के पास पहुंचा और उसे भोजन कराने की इच्छा प्रकट की और उससे पूछा - महाराज आप कितना भोजन लेते हैं .

वह ब्रामण उस सेठ को अच्छी तरह से जानता था उसने सेठ से कहा - मैं तो मात्र सौ ग्राम भोजन करता हूँ . सेठ उसकी बात सुनकर बड़ा प्रसन्न हो गया और ब्रामण से बोला - ठीक है महाराज आप भोजन करने घर पर आ जाना और उस समय मैं घर पर नहीं रहूँगा .

सेठ ने घर पहुंचकर अपनी पत्नी को कहा - मुझे जरुरी काम है मैं कल घर पर नहीं रहूँगा ..एक ब्रामण देवता आएंगे तुम उसे भोजन करा देना . दूसरे दिन ब्रामण भोजन करने सेठ के घर पहुंचा . सेठानी ने बड़ी आवभगत की और आदर के साथ पंडित जी से बोली - महाराज आप क्या लेंगें . मौका ताड़ कर ब्रामण ने कहा - बस जादा नहीं दस मन आटा, चार मन चावल और दस सेर घी, एक मन शक्कर मेरे घर पर भिजवा दो और फिर उस ब्रामण ने सेठजी के यहाँ डट कर भोजन किया और वहां से बिदा ली .

घर आकर वह ब्रामण ओढ़ तानकर सो गया और सोते सोते अपनी पत्नी से बोला - सेठजी जब घर आयें तो तुम उन्हें देखते ही रोने लगना और उनसे कहना की जबसे आपके घर से आयें हैं तो तबसे एकदम से सख्त बीमार पड़ गए हैं और उनके बचने की कोई उम्मीद नहीं है . उधर सेठ अपने घर पहुंचा और सारा वृतांत अपनी पत्नी से सुना तो उसके होश उड़ गए और वह बेहोश हो गया .

होश आने पर वह ब्रामण के घर पहुंचा तो तो उसने ब्रामण को बिस्तर पर पड़े देखा और ब्रामण की पत्नी ने रो रोकर आसमान सर पर उठा लिया और सेठ के सामने छाती ठौंककर चीख पुकार करना शुरू कर दिया तो सेठजी की हालत पतली हो गई .
सेठजी ने धीरे से ब्रामण की पत्नी के हाथों में बीस हजार रुपये पकड़ा दिये और बोले ब्रामण जी का अच्छे से उपचार कराओ पर हाँ यह बात ध्यान में रखना और किसी से न कहना की ब्रामण महोदय ने मेरे यहाँ भोजन किये थे . इस तरह लोभी सेठ लुट पिट कर अपने घर की और रवाना हो गया .

"सच है की अति लोभ का परिणाम अच्छा नहीं होता है ."

रविवार, 17 अप्रैल 2011

बिल्कुल सही, पापा..


रोहन के पिता ने उसके स्कूल का रिपोर्ट कार्ड

देखकर गुस्से में कहा,


"इतने कम मार्क्स... दिल करता है,


दो थप्पड़ लगाऊं..."

रोहन ने तपाक से कहा,

"बिल्कुल सही, पापा... चलो मेरे साथ,


मैंने मैडम का घर भी देखा है..."

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

भड़कीले सवाल-चटकीले जवाब-भाग-२.

भड़कीले सवाल-चटकीले जवाब-भाग-२.
(Courtesy Google Images)

मेरा ब्लॉग-
http://mktvfilms.blogspot.com/2011/04/blog-post_16.html प्यारे दोस्तों, पता नहीं क्यों? कुछ पति महाशय अपनी पत्नी की हमेशा बुराई करते नज़र आते हैं..!! उन्होंने  मुझे कुछ भड़कीले सवाल भी भेजे हैं? चलो, ये सारे सवाल का, सही उत्तर पाने का एक प्रयास हम करें,शायद किसी पति-पत्नी का काम बन जाएं..!!

भ.स.-" मेरे पति हमेशा मुझ पर गुस्सा होकर कहते हैं, मेरे अंदर छिपे जानवर को जगाने की कोशिश मत करना, व..र्ना...? ये सुन-सुनकर,मैं तंग आ गई, क्या करूँ?"
 
च.ज.-" कहीं से एक तिलचट्टा (Cockroach) पकड़कर उस जानवर पर फेंके, भीतर का जानवर ड़रपोक है या ख़ूँख़ार, अभी पता चल जाएगा..!!
 
भ.स.- "मेरी पत्नी जब बहुत ज्यादा खुश होती है तब, कुकिंग बुक से रॅसिपी पढ़कर, मुझे कोई भी नयी वानगी पका कर खिलाती रहती है, मगर मेरा तो पेट ही खराब हो जाता है..!! क्या करूँ?
 
च.ज." आपके घर की सभी कुकिंग बुक्स, कूरियर से अपनी सास को भेज दो..!! फिर भुगतेगा आपका ससुर,अपने कुकर्मों का फल..!!
 
भ.स.-" मेरे पति मुझे हमेशा कहा करते है, मेरे जीवन में तुम से बड़ी मुसीबत और कोई नहीं हो सकती? ऐसा सुनकर बहुत बुरा लगता है..!!"
 
च.ज." आज ही,किसी ज्वैलरी शॉप में जाइए और पति देव की औकात से ज्यादा ज्वैलरी खरीदें..!! अगर, पति देव आप पर, भड़क उठे तो कह देना, जितनी बड़ी मुसीबत, उतना ज्यादा नुकसान?"
 
भ.स."मेरी पत्नी सजधज कर रोज़ मुझ से, एक ही सवाल करती है,मैं कैसी दिख रहीं हूँ? रोज़-रोज़ झूठ बोलना मुझे पसंद नहीं है..!! क्या करूँ?"
 
च.ज.-"घर की सभी दीवारों पर शीशें लगवा लें,बाद में भाभीजी अपने आप को आईने में देखकर, खुद ही डर जाएगी क्योंकि, आईना कभी झूठ नहीं बोलता..!!"
 
भ.स. "एक नारी का कौन सा रूप, नर के लिए अच्छा होता है माँ का या पत्नी का?"
 
च.ज. " खुद ही समझ लो..!! एक नारी के (माँ) कारण हम, दुनिया में रोते हुए आते हैं और दूसरी  नारी (पत्नी) हम कहीं रोना बंद न कर दें, इस बात का हमेशा ध्यान रखती है..!!"
 
भ.स.-" मेरे पति मुझे, मेरी साँस तुम ही हो, कह कर बाद में, मेरी ग्रासनली भी तुम हो, कहते हैं..!! श्वास और ग्रासनली, कुछ ग़लत नहीं है? 
 
च.ज." वैरी स्मार्ट बॉय..!! कहीं ग़लती से भी आप श्वास- नली में फँस जाए तो, आप के पति देव तो, बे-मौत ही मर न जाए क्या?
 
भ.स.-"मैंने मेरे पति से, यूँ ही एक सवाल किया, आप को मुझ में कौन सी ख़ासियत अच्छी लगती है? उन्होंने पूछा, क्या मतलब?  जितने दिखते हैं,क्या वह उतने भोलेभाले होंगे?
 
च.ज.-" भाभीजी, आप जल्द से जल्द किसी ज्योतिषी या डॉक्टर को कन्सल्ट कीजिए..!! आप की ग्रह दशा (घरवाली)और आपके पति की `काम`-दिशा (बहारवाली) ग़लत मार्ग पर चल पड़ी लगती है..!!"
 
भ.स." मेरे पति को फिल्म देखने का शौक नहीं है, पर हम सभी घरवालों के लिए, हर पंद्रह दिन के बाद, फिल्म के टिकट ख़रीद लाते हैं..!! मेरे `वो`कितने अच्छे हैं, नहीं?
 
च.ज." भाभीजी, पूरा घर खाली होने के पश्चात, घर में किसी और फिल्म की शूटिंग तो नहीं होती हैं ना? आपने कभी जांच पड़ताल की है क्या?"
 
भ.स." मेरे पति को चौबीसों घंटे सिरदर्द की शिकायत रहती है..!! कई डॉक्टर्स से जांच करवाई, सभी ने कहा कुछ नहीं है..!! फिर सिर दर्द क्यों?"
 
च.ज." भाभीजी, आपको तो खुश होना चाहिए..!! उनके सिर में कुछ नहीं है, इसीलिए तो उन्होंने, आप से विवाह किया है? पते की बात, है या नहीं?
 
भ.स." अगर नवविवाहित दो जोड़े (कपल) कहीं पर मिल जाए तो, चारों नर-नारी का, परस्पर व्यवहार कैसा होना चाहिए?
 
च.ज." अब क्या जवाब दें? दोनों  नारी एक दूसरे के ज़ेवर और ड्रेस देखा करेंगी और दोनों नर एक दूसरे की पत्नी को..!!"
 
=============
 
" ENJOY, NO COMMENTS ."

मार्कण्ड दवे । दिनांकः-१६-०४-२०११.

भीख माँगते शर्म नहीं आती ?

लोकल ट्रेन से उतरते ही
हमने सिगरेट जलाने के लिए
एक साहब से माचिस माँगी,
तभी किसी भिखारी ने
हमारी तरफ हाथ बढ़ाया,

हमने कहा-

"भीख माँगते शर्म नहीं आती?"

ओके, वो बोला-
"माचिस माँगते आपको आयी थी क्‍या?"

बाबूजी! माँगना देश का करेक्‍टर है,

जो जितनी सफ़ाई से माँगे
उतना ही बड़ा एक्‍टर है,
ये भिखारियों का देश है
लीजिए! भिखारियों की लिस्‍ट पेश है,

धंधा माँगने वाला भिखारी
चंदा माँगने वाला
दाद माँगने वाला
औलाद माँगने वाला
दहेज माँगने वाला
नोट माँगने वाला
और तो और
वोट माँगने वाला

हमने काम माँगा

तो लोग कहते हैं चोर है,
भीख माँगी तो कहते हैं,
कामचोर है,

उनमें कुछ नहीं कहते,
जो एक वोट के लिए ,
दर-दर नाक रगड़ते हैं,

घिस जाने पर रबर की खरीद लाते हैं,

और उपदेशों की पोथियाँ खोलकर,
महंत बन जाते हैं।
लोग तो एक बिल्‍ले से परेशान हैं,
यहाँ सैकड़ों बिल्‍ले

खरगोश की खाल में देश के हर कोने में विराजमान हैं।


हम भिखारी ही सही ,
मगर राजनीति समझते हैं ,
रही अख़बार पढ़ने की बात
तो अच्‍छे-अच्‍छे लोग ,
माँग कर पढ़ते हैं,

समाचार तो समाचार ,

लोग बाग पड़ोसी से ,
अचार तक माँग लाते हैं,
रहा विचार!

तो वह बेचारा ,

महँगाई के मरघट में,
मुद्दे की तरह दफ़न हो गया है।

समाजवाद का झंडा ,
हमारे लिए कफ़न हो गया है,
कूड़ा खा रहे हैं और बदबू पी रहे हैं ,
उनका फोटो खींचकर

फिल्‍म वाले लाखों कमाते हैं

झोपड़ी की बात करते हैं
मगर जुहू में बँगला बनवाते हैं।

हमने कहा "फिल्‍म वालों से

तुम्‍हारा क्‍या झगड़ा है ?"
वो बोला-
"आपके सामने भिखारी नहीं
भूतपूर्व प्रोड्यूसर खड़ा है
बाप का बीस लाख फूँक कर
हाथ में कटोरा पकड़ा!"

हमने पाँच रुपए उसके

हाथ में रखते हुए कहा-
"हम भी फिल्‍मों में ट्राई कर रहे हैं !"

वह बोला, "आपकी रक्षा करें दुर्गा माई

आपके लिए दुआ करूँगा
लग गई तो ठीक
वरना आपके पाँच में अपने पाँच मिला कर
दस आपके हाथ पर धर दूँगा !"

यह कविता कविता कोष से साभार ली गयी है और प्रसिद्द हास्य कवी श्री शैल चतुर्वेदी जी की है

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

बिना विचारे जो करे, सो पाछे पछताए !

सेठ घनश्याम दास कपड़े का बहुत बड़ा व्यापारी था। उसने ढेरों दौलत जमा कर रखी थी। उसका व्यापार आस-पास के देशों में भी फैल चुका था। वह कभी-कभी उन देशों की यात्रा भी किया करता था। जब उसका बेटा जवान हो गया तो वह अपने पिता के व्यापार में हाथ बंटाने लगा।

एक बार घनश्याम दास ने अपने बेटे रामदास से कहा—‘‘हमारे पास दूर देश से बहुत बड़ा आर्डर आया है, तुम्हें सामान लेकर वहां जाना होगा।’’ रामदास ने अब तक किसी देश की यात्रा नहीं की थी। वह यह जानकर बहुत खुश हुआ कि उसके अब्बा उसे दूर देश भेज रहे हैं। उसने तुरंत वहां जाने की तैयारी शुरू कर दी।

अगले दिन रामदास सामान लेकर यात्रा के लिए रवाना हो गया। वह होटल में सामान रखकर वहां के बाजार में घूमने निकला। रास्ते में उसने एक निराला फल बिकते देखा। उसने इतना बड़ा फल आज तक नहीं देखा था। वह फल के पास गया और फल को हाथ में उठाकर देखा तो हैरान रह गया कि ऊपर से कांटों वाला यह फल बहुत ही भारी था। रामदास ने पूछा—‘‘भाई, इसे क्या कहते हैं ?’ फल वाला हंसते हुए बोला-‘‘साहब, इसे कटहल कहते हैं।’’

रामदास ने कटहल को सूंघकर देखा तो उसे कटहल की खुशबू अच्छी लगी। वह सोचने लगा कि यदि इस कटहल की खुशबू इतनी अच्छी है तो स्वाद कितना अच्छा होगा ? परंतु मन ही मन रामदास यह सोच रहा था कि इतना बड़ा फल बहुत महंगा होगा। उसने फल वाले से पूछा—‘‘भाई, कटहल कितने का है ?’’ फल वाले ने उत्तर दिया—‘‘दस आने का।’’

रामदास को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। उसे लगा कि शायद उसने गलत सुना है या फल वाले का ध्यान कहीं और है, इस कारण उसने गलती से कटहल का दाम कम बता दिया है। उसने तुरंत जेब से पैसे निकाले और कटहल खरीद लिया। कटहल खरीद कर वह सीधे होटल पहुंचा। छुरी निकाल कर कटहल काट लिया और उसे खाने लगा। उसे कटहल का स्वाद बहुत अच्छा लग रहा था, इस कारण आधे से अधिक कटहल उसने खा लिया।

खाने के पश्चात वह नल पर हाथ धोने गया, परंतु उसके हाथ व मुंह बुरी तरह से चिपक रहे थे, इस कारण साफ नहीं हो सके। हाथ धोने की कोशिश में वे और भी ज्यादा चिपक गए। उसने हाथों को बार-बार साबुन से रगड़ा परंतु वे साफ नहीं हो रहे थे। उसने देखा कि कटहल का रस कपड़ों पर लग गया है। उसने कपड़ों को नैपकिन से साफ करने की कोशिश की, परंतु नैपकिन कपड़ो से चिपक गया।

वह अकेला था इस कारण समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे। वैसे भी रामदास अपने घर से पहली बार अकेला निकला था। इस कारण थोड़ा घबरा रहा था। उसने सोचा कि होटल के मालिक या किसी नौकर से पूँछ लूं कि इसे कैसे साफ किया जाए। रामदास कमरे से बाहर निकल कर ज्यों ही किसी के सामने पड़ा वह व्यक्ति रामदास को देखकर हंसने लगा। रामदास की हिम्मत ही नहीं हुई कि वह किसी से कुछ पूछे।

वह चुपचाप होटल के बाहर निकल गया। बाहर तेज हवा चल रही थी। सड़क के पत्ते उड़-उड़ कर रामदास के कपड़ों पर चिपकने लगे। उसकी मूछों के बाल भी चिपक कर अजीब से लग रहे थे। हवा के साथ धूल-मिट्टी, कागज, पंख आदि उसके कपड़ों व हाथों में चिपकते जा रहे थे। वह जिधर से निकलता, उधर से लोग उसे देखकर हंसने लगते। उसका चेहरा भी धूल से चिपकने से गंदा लगने लगा था।

कुछ लोग उसे पागल समझकर उसके पीछे चलने लगे। रामदास समझ में नहीं आया कि वह क्या करे। वह चुपचाप दुकान में घुस गया और एक कोने में छिपने का प्रयास करने लगा। संयोग से वह दुकान एक सर्राफ की थी। वहां ग्रहकों को दिखाए गए आभूषण एक मेज पर रखे थे। रामदास उस मेज से टकरा गया और कुछ आभूषण उसके कपड़ों से जा चिपके। ज्योंहि रामदास छिपने का प्रयास करने लगा दुकान के मालिकी निगाह उस पर गई।

उसने चोर-चोर’ कह-कहकर शोर मचा दिया। दुकान के नौकरों ने रामदास को पकड़ लिया। भीड़ इकट्ठी हो गई।
पुलिस को खबर दी गई। रामदास ने लाख समझाया कि उसने चोरी नहीं की है परंतु उसके कपड़ों पर चिपके आभूषणों के कारण किसी को विश्वास न हुआ। उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया। पुलिस ने रामदास से चोरी का कारण जानना चाहा तो उसने सविस्तार से कटहल खाने की पूरी बात उन्हें बता दी।

थानेदार हंसता हुआ बोला—‘‘अरे मियां, जब खाना नहीं आता था तो कटहल खाया क्यों ? अच्छा, यह बताओ कि तुम किस व्यापारी के यहां आए थे।’’ रामदास को उस व्यापारी के यहां ले जाया गया। परंतु उस व्यापारी ने रामदास के हुलिए के कारण उसे पहचानने से इन्कार कर दिया। तब रामदास ने अपना व अपने पिता का पूरा नाम बताया, साथ ही अपने साथ लाए सामान की पूरी जानकारी दी। इस पर व्यापारी ने उसे पहचानते हुए कहा—‘‘थानेदार जी, यह अपना ही बच्चा है। इसे छोड़ दीजिए। यह हालात के कारण मुसीबत में फंस गया है।’’

अब रामदास बोला—‘‘पहले मुझे इस मुसीबत से छुटकारा दिलाइए।’’ व्यापारी ने रामदास को बदलने के लिए कपड़े दिए। उसका चेहरा व हाथ-पैर साफ करवाए, फिर उसकी अच्छी खातिरदारी की और कहा—

‘‘बेटा याद रख, किसी भी नई चीज को आजमाने से पहले उसकी जानकारी अवश्य ले लेनी चाहिए।’’

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

हम 15 अंश से उत्तर की तरफ मुड नही सकते कयोंकि ....



निचे दिया हुआ 1995 में अमेरीकन समुद्री जहाज पर तैनात अधिकारी और कॅनेडीयन अधिकारी

के बीच देर रात हुवा संवाद है --

कॅनेडीयन अधिकारी (लाऊडस्पिकर पर ) - दुर्घटना से बचनेके लिए कृपया अपना जहाज

15 अंश दक्षिण की तरफ मोड़िये

अमेरीकन अधिकारी (लाऊडस्पिकर पर) - दुर्घटना से बचनेके लिए आप ही कृपया अपना

जहाज 15 अंश उत्तर की तरफ मोड़िये

कॅनेडीयन अधिकारी (लाऊडस्पिकर पर ) - नही यह मुमकिन नही, दुर्घटना से बचनेके लिए

आपको ही अपना जहाज 15 अंश दक्षिण की तरफ मोडना पडेगा।

अमेरीकन अधिकारी (लाऊडस्पिकर पर) - मै अमेरीकन नेवी जहाज का कप्तान बोल रहा हूं।

मै फिर से बोल रहा हूं की तुम्हारा जहाज 15 अंश उत्तर की तरफ मोडो।

कॅनेडीयन अधिकारी (लाऊडस्पिकर पर ) - नही, मै फिर से बोल रहा हूं की आप आपका जहाज

15 अंश दक्षिण की तरफ मोड़िये।

अमेरीकन अधिकारी (लाऊडस्पिकर पर) - यह अमेरिकन प्लेन कॅरीयर यूएस लिंकन जहाज है,

अमेरीकन नेवी में यह दुनिया में दुसरा सबसे बडा जहाज है. और हमारे पास तीन बडे बडे

विनाशकारी रॉकेट्स, पांच बारुद से भरे हूए प्लेन्स और उसके अतिरिक्त बहुत सारे हथियार है।

और इस जहाज का मै कॅप्टन हूं। मै तुम्हे ऑर्डर और चेतावनी देता हूं की आप अपना जहाज

तुरंत 15 अंश उत्तरकी तरफ मोड़ो अन्यथा हम अपना जहाज बचाने के लिए कडी से कडी

कार्यवाही करेंगे।

कॅनेडीयन अधिकारी (लाऊडस्पिकर पर ) - हम 15 अंश से उत्तर की तरफ मुड नही सकते

क्योंकी यह एक लाईट हाउस है

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

चालीसवाँ राष्ट्रीय भ्रष्टाचार महोत्सव

पिछले दिनों
चालीसवाँ राष्ट्रीय भ्रष्टाचार महोत्सव मनाया गया।
सभी सरकारी संस्थानों को बुलाया गया।
भेजी गई सभी को निमंत्रण-पत्रावली
साथ मे प्रतियोगिता की नियमावली।
लिखा था-
प्रिय भ्रष्टोदय,
आप तो जानते हैं
भ्रष्टाचार हमारे देश की
पावन-पवित्र सांस्कृतिक विरासत है
हमारी जीवन-पद्धति है
हमारी मजबूरी है, हमारी आदत है।
आप अपने विभागीय भ्रष्टाचार का
सर्वोत्कृष्ट नमूना दिखाइए
और उपाधियाँ तथा पदक-पुरस्कार पाइए।
व्यक्तिगत उपाधियाँ हैं-
भ्रष्टशिरोमणि, भ्रष्टविभूषण
भ्रष्टभूषण और भ्रष्टरत्न
और यदि सफल हुए आपके विभागीय प्रयत्न
तो कोई भी पदक, जैसे-
स्वर्ण गिद्ध, रजत बगुला
या कांस्य कउआ दिया जाएगा।
सांत्वना पुरस्कार में
प्रमाण-पत्र और
भ्रष्टाचार प्रतीक पेय ह्वस्की का
एक-एक पउवा दिया जाएगा।
प्रविष्टियाँ भरिए
और न्यूनतम योग्यताएँ पूरी करते हों तो
प्रदर्शन अथवा प्रतियोगिता खंड में स्थान चुनिए।
कुछ तुले, कुछ अनतुले भ्रष्टाचारी
कुछ कुख्यात निलंबित अधिकारी
जूरी के सदस्य बनाए गए,
मोटी रकम देकर बुलाए गए।
मुर्ग तंदूरी, शराब अंगूरी
और विलास की सारी चीज़ें जरूरी
जुटाई गईं
और निर्णायक मंडल
यानी कि जूरी को दिलाई गईं।
एक हाथ से मुर्गे की टाँग चबाते हुए
और दूसरे से चाबी का छल्ला घुमाते हुए
जूरी का एक सदस्य बोला-
‘मिस्टर भोला !
यू नो
हम ऐसे करेंगे या वैसे करेंगे
बट बाइ द वे
भ्रष्टाचार नापने का पैमाना क्या है
हम फ़ैसला कैसे करेंगे ?

मिस्टर भोला ने सिर हिलाया
और हाथों को घूरते हुए फरमाया-
‘चाबी के छल्ले को टेंट में रखिए
और मुर्गे की टाँग को प्लेट में रखिए
फिर सुनिए मिस्टर मुरारका
भ्रष्टाचार होता है चार प्रकार का।
पहला-नज़राना !
यानी नज़र करना, लुभाना
यह काम होने से पहले दिया जाने वाला ऑफर है
और पूरी तरह से
देनेवाले की श्रद्धा और इच्छा पर निर्भर है।
दूसरा-शुकराना!
इसके बारे में क्या बताना !
यह काम होने के बाद बतौर शुक्रिया दिया जाता है
लेने वाले को
आकस्मिक प्राप्ति के कारण बड़ा मजा आता है।
तीसरा-हकराना, यानी हक जताना
-हक बनता है जनाब
बँधा-बँधाया हिसाब
आपसी सैटिलमेंट
कहीं दस परसेंट, कहीं पंद्रह परसेंट
कहीं बीस परसेंट ! पेमेंट से पहले पेमेंट।
चौथा जबराना।
यानी जबर्दस्ती पाना
यह देनेवाले की नहीं
लेनेवाले की
इच्छा, क्षमता और शक्ति पर डिपेंड करता है
मना करने वाला मरता है।
इसमें लेनेवाले के पास पूरा अधिकार है
दुत्कार है, फुंकार है, फटकार है।
दूसरी ओर न चीत्कार, न हाहाकार
केवल मौन स्वीकार होता है
देने वाला अकेले में रोता है।
तो यही भ्रष्टाचार का सर्वोत्कृष्ट प्रकार है
जो भ्रष्टाचारी इसे न कर पाए उसे धिक्कार है।
नजराना का एक पाइंट
शुकराना के दो, हकराना के तीन
और जबराना के चार
हम भ्रष्टाचार को अंक देंगे इस प्रकार।’

रात्रि का समय
जब बारह पर आ गई सुई
तो प्रतियोगिता शुरू हुई।
सर्वप्रथम जंगल विभाग आया
जंगल अधिकारी ने बताया-

‘इस प्रतियोगिता के
सारे फर्नीचर के लिए
चार हजार चार सौ बीस पेड़ कटवाए जा चुके हैं
और एक-एक डबल बैड, एक-एक सोफा-सैट
जूरी के हर सदस्य के घर, पहले ही भिजवाए जा चुके हैं
हमारी ओर से भ्रष्टाचार का यही नमूना है,
आप सुबह जब जंगल जाएँगे
तो स्वयं देखेंगे
जंगल का एक हिस्सा अब बिलकुल सूना है।’

अगला प्रतियोगी पी.डब्लू.डी. का
उसने बताया अपना तरीका-

‘हम लैंड-फिलिंग या अर्थ-फिलिंग करते हैं।
यानी ज़मीन के निचले हिस्सों को
ऊँचा करने के लिए मिट्टी भरते हैं।
हर बरसात में मिट्टी बह जाती है,
और समस्या वहीं-की-वहीं रह जाती है।
जिस टीले से हम मिट्टी लाते हैं
या कागजों पर लाया जाना दिखाते हैं
यदि सचमुच हमने उतनी मिट्टी को डलवाया होता
तो आपने उस टीले की जगह पृथ्वी में
अमरीका तक का आरपार गड्ढा पाया होता।
लेकिन टीला ज्यों-का-त्यों खड़ा है।
उतना ही ऊँचा, उतना ही बड़ा है
मिट्टी डली भी और नहीं भी
ऐसा नमूना नहीं देखा होगा कहीं भी।’

क्यू तोड़कर अचानक
अंदर घुस आए एक अध्यापक-

‘हुजूर
मुझे आने नहीं दे रहे थे
शिक्षा का भ्रष्टाचार बताने नहीं दे रहे थे
प्रभो !’

एक जूरी मेंबर बोला-‘चुप रहो

चार ट्यूशन क्या कर लिए
कि भ्रष्टाचारी समझने लगे
प्रतियोगिता में शरीक होने का दम भरने लगे !
तुम क्वालिफाई ही नहीं करते
बाहर जाओ-
नेक्स्ट, अगले को बुलाओ।’

अब आया पुलिस का एक दरोगा बोला-

‘हम न हों तो भ्रष्टाचार कहाँ होगा ?
जिसे चाहें पकड़ लेते हैं, जिसे चाहें रगड़ देते हैं
हथकड़ी नहीं डलवानी दो हज़ार ला,
जूते भी नहीं खाने दो हज़ार ला,
पकड़वाने के पैसे, छुड़वाने के पैसे
ऐसे भी पैसे, वैसे भी पैसे
बिना पैसे हम हिलें कैसे ?
जमानत, तफ़्तीश, इनवेस्टीगेशन
इनक्वायरी, तलाशी या ऐसी सिचुएशन
अपनी तो चाँदी है,
क्योंकि स्थितियाँ बाँदी हैं
डंके का ज़ोर हैं
हम अपराध मिटाते नहीं हैं
अपराधों की फ़सल की देखभाल करते हैं
वर्दी और डंडे से कमाल करते हैं।’

फिर आए क्रमश:
एक्साइज वाले, इनकम टैक्स वाले,
स्लमवाले, कस्टमवाले,
डी.डी.ए.वाले
टी.ए.डी.ए.वाले
रेलवाले, खेलवाले
हैल्थवाले, वैल्थवाले,
रक्षावाले, शिक्षावाले,
कृषिवाले, खाद्यवाले,
ट्रांसपोर्टवाले, एअरपोर्टवाले
सभी ने बताए अपने-अपने घोटाले।

प्रतियोगिता पूरी हुई
तो जूरी के एक सदस्य ने कहा-

‘देखो भाई,
स्वर्ण गिद्ध तो पुलिस विभाग को जा रहा है
रजत बगुले के लिए
पी.डब्लू.डी
डी.डी.ए.के बराबर आ रहा है
और ऐसा लगता है हमको
काँस्य कउआ मिलेगा एक्साइज या कस्टम को।’

निर्णय-प्रक्रिया चल ही रही थी कि
अचानक मेज फोड़कर
धुएँ के बादल अपने चारों ओर छोड़कर
श्वेत धवल खादी में लक-दक
टोपीधारी गरिमा-महिमा उत्पादक
एक विराट व्यक्तित्व प्रकट हुआ
चारों ओर रोशनी और धुआँ।
जैसे गीता में श्रीकृष्ण ने
अपना विराट स्वरूप दिखाया
और महत्त्व बताया था
कुछ-कुछ वैसा ही था नज़ारा

विराट नेताजी ने मेघ-मंद्र स्वर में उचारा-

‘मेरे हज़ारों मुँह, हजारों हाथ हैं
हज़ारों पेट हैं, हज़ारों ही लात हैं।
नैनं छिंदति पुलिसा-वुलिसा
नैनं दहति संसदा !
नाना विधानि रुपाणि
नाना हथकंडानि च।
ये सब भ्रष्टाचारी मेरे ही स्वरूप हैं
मैं एक हूँ, लेकिन करोड़ों रूप हैं।
अहमपि नजरानम् अहमपि शुकरानम्
अहमपि हकरानम् च जबरानम् सर्वमन्यते।
भ्रष्टाचारी मजिस्ट्रेट
रिश्वतख़ोर थानेदार
इंजीनियर, ओवरसियर
रिश्तेदार-नातेदार
मुझसे ही पैदा हुए, मुझमें ही समाएँगे
पुरस्कार ये सारे मेरे हैं, मेरे ही पास आएँगे।’
यह कविता प्रसिद्ध हास्य कवि श्री अशोक चक्रधर जी की है और कविता कोश से साभार ली गयी है