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मंगलवार, 28 जून 2011

श्रेष्ट वही जो आप अंदर से है .....


एक महान तपस्वी एक दिन गंगा में नहाने के लिए गए। स्नान करके वह सूर्य की पूजा करने लगे। तभी उन्होंने देखा कि एक बाज ने झपट्टा मारा और एक चुहिया को पंजे में जकड़ लिया। तपस्वी को चुहिया पर दया गई। उन्होंने बाज को पत्थर मारकर चुहिया को छुड़ा लिया।

चुहिया तपस्वी के चरणों में दुबककर बैठ गई। तपस्वी ने सोचा कि चुहिया को लेकर कहां घूमता फिरुंगा! इसको कन्या बनाकर साथ लेकर चलता हूं। तपस्वी ने अपने तप के प्रभाव से चुहिया को कन्या का रूप दे दिया। वह उसे साथ लेकर अपने आश्रम पर गए।

तपस्वी की पत्नी ने पूछा-‘उसे कहां से ले आए?’तपस्वी ने पूरी बात बता दी। दोनों पुत्री की तरह कन्या का पालन-पोषण करने लगे। कुछ दिनों बाद कन्या युवती हो गई। पति-पत्नी को उसके विवाह की चिंता सताने लगी। तपस्वी ने पत्नी से कहा-‘मैं इस कन्या का विवाह भगवान सूर्य से करना चाहता हूं।पत्नी बोली-‘यह तो बहुत अच्छा विचार है। इसका विवाह सूर्य से कर दीजिए।

तपस्वी ने सूर्य भगवान का आह्वान किया। भगवान सूर्य उपस्थित हो गए। तपस्वी ने अपनी पुत्री से कहा- ‘यह सारे संसार को प्रकाशित करने वाले भगवान सूर्य हैं। क्या तुम इनसे विवाह करोगी?’ लड़की ने कहा-‘उनका स्वभाव तो बहुत गरम है। जो इनसे उत्तम हो, उसे बुलाइए।लड़की की बात सुनकर सूर्य ने सुझाव दिया-‘मुझसे श्रेष्ठ तो बादल है। वह तो मुझे भी ढक लेता है।

तपस्वी ने मंत्र द्वारा बादल को बुलाया और अपनी पुत्री से पूछा-‘क्या तुम्हें बादल पसंद है?’लड़की ने कहा-‘यह तो काले रंग का है। कोई इससे भी उत्तम वर हो तो बताइए।तब तपस्वी ने बादल से ही पूछा-‘तुमसे जो उत्तम हो, उसका नाम बताओ।बादल ने बताया-‘मुझसे उत्तम वायु देवता हैं। वह तो मुझे भी उड़ा ले जाते हैं।तपस्वी ने वायु देवता का आह्वान किया। वायु को देखकर लड़की ने कहा-‘वायु है तो शक्तिशाली, पर चंचल बहुत है। यदि कोई इससे अच्छा हो तो उसे बुलाइए।

तपस्वी ने वायु से पूछा-‘बताओ, तुमसे अच्छा कौन है?’ वायु ने कहा-‘मुझसे श्रेष्ठ तो पर्वत ही होता है। वह मेरी गति को भी रोक देता है।तपस्वी ने पर्वत को बुलाया। पर्वत के आने पर लड़की ने कहा-‘पर्वत तो बहुत कठोर है। किसी दूसरे वर की खोज कीजिए।

तपस्वी ने पर्वत से पूछा-‘पर्वतराज, तुम अपने से श्रेष्ठ किसी मानते हो?’ पर्वत ने कहा-‘चूहे मुझसे भी श्रेष्ट होते हैं। वे मेरे शरीर में भी छेद कर देते हैं।तपस्वी ने चूहों के राजा को बुलाया और पुत्री से प्रश्न किया-‘क्या तुम इसे पसंद करती हो?’

लड़की चूहे को देखकर बड़ी प्रसन्न हुई और उससे विवाह करने को तैयार हो गई। वह बोली-‘पिताजी, आप मुझे फिर से चुहिया बना दीजिए। मैं इनसे विवाह करके आनंदपूर्वक रह सकूंगी।तपस्वी ने उसे फिर से चुहिया बना दिया।

16 टिप्पणियाँ:

तपस्वी ने उसे फिर से चुहिया बना दिया।

वाह..वाह..वाह..श्रीनिरंजन मिश्रसाहबजी (अनाम)

आपकी रचना यहां भ्रमण पर है आप भी घूमते हुए आइये स्‍वागत है
http://tetalaa.blogspot.com/

श्रेष्‍ठ वही जो आप अन्‍दर से हैं। बहुत‍ अच्‍छी सीख।

बहुत अच्छी तअरह से आपने अपनी कहानी के शीर्षक की व्याख्या की है और बिकुल सही कहा है "श्रेष्ट वही जो आप अंदर से हैं"बहुत खूब ...

बहुत बढ़िया शिक्षा देती कहानी ....

आपकी इस मंच पर पहली रचना के लिए बधाई आपको

स्वागत है आपका और आशा है इसी तरह की रचनाये आगे भी पढ़वाते रहेंगे

बात भले या बुरे की नहीं, आपको श्रेष्‍़ठ वही लगता है जो आपके अन्‍दर अचेतन में गहरे तक बैठा है। यह व्‍यंग्‍य कम, हि‍तोपदेश कहानी ज्‍यादा है। खैर आपने सुनाई, बधाई।

maaf kariyega ! chhote munh badi baat !
lekin kya aapko nahi lagta ye "HASYA VYANGYA MANCH"
bal kahaniya nahi :|

@Manish Kr. Khedawat जी,

आपकी बातों से पूर्णतया सहमत

@ निरंजन मिश्र (अनाम) जी,

ये आपकी पहली रचना है, अच्छी है पर इसमे हास्य नहीं है, इस मंच का नाम ही हास्य व्यंग मंच है, तो रचनाये भी इसी के अनुरूप होनी चाहिए

बढ़िया कहानी , बढ़िया शिक्षा

कहानी तो अच्छी है पर इस मंच के लायक शायद नहीं है , ये बल कहानी हो सकती है पर हास्य या व्यंग्य नहीं

जैसा की आप सही की टिप्पणियॉ को पढ़कर लगा , कुछ अच्छा कुछ बुरा पर

ये इस मंच पर मेरी पहली पोस्ट है अतः आगे से इस बात का ध्यान रखा जाएगा

परंतु एक सवाल दिमाग मे उठ रहा है , यदि इस ब्लॉग पर कहानी नहीं लिखी जा सकती तो ऊपर मेनू बार मे कथा-कहानी नाम का तेग क्यो दिया गया है

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