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हास्य जीवन का अनमोल तोहफा    ====> हास्य जीवन का प्रभात है, शीतकाल की मधुर धूप है तो ग्रीष्म की तपती दुपहरी में सघन छाया। इससे आप तो आनंद पाते ही हैं दूसरों को भी आनंदित करते हैं।

हँसे और बीमारी दूर भगाये====>आज के इस तनावपूर्ण वातावरण में व्यक्ति अपनी मुस्कुराहट को भूलता जा रहा है और उच्च रक्तचाप, शुगर, माइग्रेन, हिस्टीरिया, पागलपन, डिप्रेशन आदि बहुत सी बीमारियों को निमंत्रण दे रहा है।

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बुधवार, 20 जुलाई 2011

श्री मोबाईल नारायण व्रत कथा ।

श्री मोबाईल नारायण व्रत कथा ।


(courtesy-Google images)


॥ श्री नारद उवाच ॥

" मर्त्यलोके जनाः सर्वे नाना क्लेश समन्विताः ।
  नाना योनि समुत्पन्नाः पच्यन्ते पाप कर्मभिः॥११॥"

" हे प्रभो, मनुष्य लोक में सभी मानव विविध योनि में उत्पन्न हो कर, नाना प्रकार के दुखों से लिप्त हो कर, अपने पाप कर्मों से पीड़ित है । उनके यह दुःख कौन से नाना उपाय द्वारा शांत हो सकते हैं? मुझे कृपया बताएं, मैं वह सब श्रवण करना चाहता हूँ । "

॥ श्री भगवान उवाच ॥

" साधु पृष्टं त्वया वत्स लोकानुग्रहकांक्षाया ।
संत्कृत्वा मुच्यते मोहात तच्छृणुष्व वदामि ते ॥१३॥"

" हे वत्स, मनुष्य के हित की इच्छा से आपने मुझे सही बात जानना चाही है; जिसको करने से मनुष्य मोहमाया से मुक्त होता है,बह मैं आप को बताता हूँ सुनें ।"

(प्रथमोध्याय -श्रीसत्यनाराणय व्रत कथा)

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हे प्रिय वत्स, (दोस्त)

आज के घोर कलयुग में, संसार के सारे दुखों से मुक्ति दिलानेवाली, श्री मोबाईल नारायण व्रत कथा ही है । यह कथा को विधि पूर्वक करने से मनुष्य तत्काल  पृथ्वी लोक पर सर्वे सुख भोग कर, तमाम दुःख से आजीवन मोक्ष प्राप्त करता है । आज मैं भी, आपको यह व्रत कथा सुनाता हूँ वह आप सर्वे इसे  ध्यान से श्रवण करें ।

श्री मोबाईल नारायण प्रित कथा;अध्याय-प्रथम ।

आज होली-धूलेटी के इस पावन महा पर्व के दिन, संसार का कोई भी मानव पूर्ण श्रद्धा एवं प्रितीभाव मन में धारण कर, भगवान श्री मोबाईल नारायण की (खरीददारी) पूजा कर सकता है । कलयुग में, इस मनुष्य लोक में, अनेक दुखों से मुक्ति पाने के लिए, यह सबसे सरल और श्रेष्ठ उपाय है ।

ईतिश्री सेटेलाईट पुराने रेवा खंडे श्री मोबाईल नारायण कथायां प्रथमोડध्यायः संपूर्ण ।

बोले, श्री मोबाईल नारायण भगवान की....ई..ई..जय..अ.अ,,!!

( सभी भक्त गण अपने-अपने लोटे (पात्र) के उपर अपना चम्मच टकराएं, अगर पास लोटा या चम्मच न हो तो, अपने मोबाईल में कोई `शीला की जवानी` का रिंग टोन बजाएं ।

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श्री मोबाईल नारायण प्रित कथा अध्याय-द्वितीय ।

निर्धन प्रेमोच्छुक कॉलेजियन प्रेमी और एक मासूम, सुंदर  कन्या को प्राप्त हुए पून्य फल की कथा ।

॥ लेखक उवाच ॥

हे वत्स, संसार में, जिसने श्री मोबाईल नारायण  का व्रत सब से पहले किया था वह कथा मैं आपको सुना रहा हूँ ।

भारत की पून्य भूमि पर एक निर्धन कोलेजियन प्रेमी युवक, धरती पर  एक मासूम कन्या के विरह में सुधबुध खो कर, भ्रमित हो कर, इधर-उधर की ख़ाक छान रहा था । उसे इस तरह अत्यंत दुःखी  पाकर, भगवान श्री कामदेवजी ने अत्यंत प्यारभरे स्वर में, उस प्रेमी से प्रश्न किया," हे प्रेमीओं की जाति में श्रेष्ठ । आप अत्यंत दुःखी क्यों है? यह मैं जानना चाहता हूँ इसलिए मुझे विस्तार से बताइए ।"

॥ प्रेमी उवाच ॥

" हे श्री कामदेव प्रभु, मेरे साथ कॉलेज में पढ़ती हुई एक मासूम सुंदर कन्या के विरह से पीड़ित ऐसा में एक प्रेमी हूँ । अगर आप मेरा यह दुःख दूर करने योग्य कोई सरल उपाय जानते हैं तो कृपा करके मुझे बताएँ।

प्रेमी युवक की आर्द्रतापूर्ण वाणी से द्रवित होकर, श्री कामदेव जी ने अपने चिर परिचित मंद-मंद मुस्कान बिखेरते  हुए  अंदाज़ में, यह प्रेमी को भगवान श्री मोबाईल नारायण नामक देव की मूर्ति को अपने हाथों से अर्पण किया । यह नवयुवक को भगवान श्री कामदेवजी ने बताया की, अभी-अभी थोडी देर पहले ही, वही मासूम सुंदर कन्या को भी, भगवान श्री मोबाईल नारायण की ऐसी ही एक प्रतिकृति उन्होंने अर्पण की है । इतना कहकर भगवान श्री कामदेव जीने उस मासूम सुंदर कन्या के श्री मोबाईल नारायण से संपर्क करने के सारे विधि-विधान से, विरही प्रेमी को अवगत कराया और अनंत-असीम प्रेम का अहसास कराने विरही प्रेमी के शरीर में प्रवेश कर, अंतर्ध्यान हो गये ।

" श्री कामदेव भगवान ने, भगवान श्री मोबाईल नारायण का जो व्रत करने के लिए, मुझे विधि समझाया है, वह मैं  श्रद्धा पूर्वक ज़रूर करुंगा ।" यह सोचते हुए, विरही कॉलेजियन प्रेमी को सारी रात नींद भी  न  आ पाई ।

दूसरे दिन, प्रातःकाल में, जाग कर नवयुवक ने," आज मैं श्री मोबाईल नारायण का व्रत ज़रूर रखूंगा ।" मन में ऐसा संकल्प धर कर भगवान श्री कामदेवजी का सच्चे हृदय से स्मरण करके, विधि विधान अनुसार अपने श्री मोबाईल नारायण से, वह मासूम सुंदर कॉलेज कन्या के श्री मोबाईल नारायण से संपर्क किया ।

भगवान श्रीकामदेवजी के दर्शाए विधि विधान को सफलतापूर्वक ढंग से करने के कारण, व्रत के विधि अनुसार, व्रत पूर्णता के बाद, दो घंटे पश्चात, कॉलेज के पास की एक महंगी रेस्त्रां में दोनों प्रेमी पंखी  आमने सामने, व्रत कथा का `महा-प्रसाद` ग्रहण करने  हेतु, मॅक्सिकन-थाई फूड का ऑर्डर देकर साथ-साथ बैठे हुए थे ।

( " बोले, श्री मो..बा..ई..!!," अरे भाई साहब, ठहरिए, ज़रा ठहरिए.....अभी देर है ।  ज्यादा जोश  दिखाएँगे तो श्री मोबाईल नारायण रूठ जायेंगे ..!!)

श्री मोबाईल नारायण की इस पवित्र व्रत कथा अनुसार, वह निर्धन (कड़का-लुख्खा ) प्रेमी के पास, अपने से भी ज्यादा महँगा और स्टाईलिश श्री मोबाईल नारायण को देखकर, उस मासूम सुंदर कॉलेज कन्या ने, विरह में तड़पते हुए उस सच्चे प्रेमी युवक को, हर रोज़ के तिरस्कार भाव से विपरित, बहुत ज्यादा प्रेम-भाव व्यक्त किया ।  कालक्रम के बदलते ही, वह प्रेमी नवयुवक ने विरह के दुःख से मुक्त हो कर अपने मनवांच्छित प्यार को पा लिया  ।

भगवान श्री कामदेव जी द्वारा बताए गए यह व्रत को  इस के पश्चात उन दोनों प्रेमीओं ने, प्रति माह श्री मोबाईल नारायण की नई प्रतिकृति खरीद कर, श्री मोबाईल नारायण का व्रत विधि पूर्वक बार-बार, प्रति माह कर के, वह मासूम कन्या और नवयुवक ने, प्रति मास अलग-अलग नया प्रेमी और प्रेमिका को पा कर अंत में इन्होंने संसार के सर्वे सुख को(?) ( ग़लत मत सोचें..!!) प्राप्त किया ।

भगवान श्री मोबाईल नारायण के इस पावन व्रत को, प्रति मास विधि पूर्वक करने फलस्वरूप, अपने निर्धन मित्र को अचानक नयी बार-बार नवीन प्रेमिका और नये प्रेमी के साथ कॉलेज में प्रसन्न होते देखकर, समग्र (HE-SHE) मित्र गणने भी यह पावन व्रत करने का मन में निर्धार किया और सभी यह पृथ्वी लोक में नाना प्रकार के प्रेम नामक मनवांच्छित सुख के अधिकारी बने ।

ईतिश्री सेटेलाईटपुराणे रेवाखंडे श्रीमोबाईलपारायण कथायां द्वितियोध्यायः संपूर्ण।

(ए..भाईसाहब..!! ए..सुनिए..ना; अब आप ज़ोर से बोल सकते हैं..!!)

बोले, श्री मोबाईल नारायण भगवान की....ई..ई..जय..अ.अ,,!!

( सभी भक्त गण अपने-अपने लोटे (पात्र) के उपर अपना चम्मच टकराएं, अगर पास लोटा या चम्मच न हो तो, अपने मोबाईल में कोई `मुन्नी बदनाम हुई` का रिंग टोन बजाएं ।)

 हे परम सुखी प्रेमी जन, यह पावन कथा में किए गये वर्णन  अनुसार, प्रति मास, पुराने श्री मोबाईल नारायण की, मोह माया से मुक्त होने हेतु, कथा पूर्ण होने के पश्चात व्रत कथा का महा-प्रसाद ग्रहण करना अति आवश्यक  है । ऐसा न करने से, भगवान श्री मोबाईल नारायण दुःखी होकर रूठ जाते हैं तथा बार-बार नेटवर्क की समस्या खड़ी करने लगते हैं ।

आज की इस पावन कथा में, उन सभी मासूम सुंदर कन्याओं के, पहलवान, कुस्तीबाज, पिता-मामा-चाचा- भाई यहाँ अभी-अभी उपस्थित हुए हैं । यह कथा समापन का महा-प्रसाद (ही..ही..ही..!!) वितरण विधि उन्हीं के कर कमल से संपन्न होना है, कृपया आप कहीं मत जाईएगा, कुछ समजे..ए..ए..ए.ए..!!

मासूम सुंदर कन्याओं के, पहलवान, कुस्तीबाज, पिता-मामा-चाचा- भाई के करकमलों से प्राप्त महा-प्रसाद आपको ज्यादा गर्म लगता हो तो, ग़म गलत करने के लिए, सॉरी मुँह की जलन-गर्मी गलत करने के लिए, रास्ते में कहीं अपना बाईक खड़ा रखकर, आप फटाफट ठंडाई या भांग पी सकते हैं ।

बोले, श्री मोबाईल नारायण भगवान की....ई..ई..जय..अ.अ,,!!

( सभी भक्त गण अपने-अपने लोटे (पात्र) के उपर अपना चम्मच टकराएं, अगर पास लोटा या चम्मच न हो तो, अपने मोबाईल में कोई `हूड दबंग-दबंग-हुड-हुड-हूड, दबंग-दबंग-दबंग` का रिंग टोन बजाएं ।

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प्यारे युवा प्रेमी दोस्तों, वैसे तो, यह व्रत कथा, सब को अपनी-अपनी क्षमता अनुसार, महा प्रसाद प्राप्ति के बाद पूर्ण होनी है । सिर्फ भगवान श्री कामदेवजी की `आरती` करना ही बाकी है, सभी भक्त अपने-अपने जूते-बूट-चप्पल, दोनों हाथों में ग्रहण करें और रोनी सी  सूरत बना कर, ऊँचे सुर में, ज़ोर से  चिल्लाती हुई आवाज़ में, `जय  कामदेव-जय कामदेव`` आरती में कृपया हमें साथ दें ।

श्री मोबाईल नारायण व्रत कथा आरती..!!

" समरुं रिलायंस, टाटा, प्रेमे  डो..को..मा (२)

  मनवांच्छित,वर देते,सब को मोबाईल देवा.

जय..कामदेव..!!

१. सुंदर-स्लीम स्वरूप, मन मोहक देवा..(२)

 सत्य-असत्य कथनसे, होती तम सेवा.

जय..कामदेव..!!

२. उल्का मुख गीरता, प्रेमी जन देवा (२)

नित नये कर सोहे, भजते हैं काम देवा.

जय..कामदेव..!!

(अस्तु, अस्तु, अस्तु, भगवान श्री मोबाईल नारायण की स्तुतिमें श्रीकामदेवजी की ये आरती के आगे के बाकी सारे अंतरे आप विद्वान पाठक मित्र खुद ही लिख लेना । मेरा कंठ-आकंठ दर्द से भर जाने की वजह से, क्षमा करना,  अब आगे मैं  गा नही पाउंगा ।)

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MARKAND DAVE PRESENTS,

"SHRI KRISHNA SHARANAM MAMH PART- 1 TO 9"





मार्कण्ड दवे । दिनांक; २० -२ -२०११.

मंगलवार, 28 जून 2011

श्रेष्ट वही जो आप अंदर से है .....


एक महान तपस्वी एक दिन गंगा में नहाने के लिए गए। स्नान करके वह सूर्य की पूजा करने लगे। तभी उन्होंने देखा कि एक बाज ने झपट्टा मारा और एक चुहिया को पंजे में जकड़ लिया। तपस्वी को चुहिया पर दया गई। उन्होंने बाज को पत्थर मारकर चुहिया को छुड़ा लिया।

चुहिया तपस्वी के चरणों में दुबककर बैठ गई। तपस्वी ने सोचा कि चुहिया को लेकर कहां घूमता फिरुंगा! इसको कन्या बनाकर साथ लेकर चलता हूं। तपस्वी ने अपने तप के प्रभाव से चुहिया को कन्या का रूप दे दिया। वह उसे साथ लेकर अपने आश्रम पर गए।

तपस्वी की पत्नी ने पूछा-‘उसे कहां से ले आए?’तपस्वी ने पूरी बात बता दी। दोनों पुत्री की तरह कन्या का पालन-पोषण करने लगे। कुछ दिनों बाद कन्या युवती हो गई। पति-पत्नी को उसके विवाह की चिंता सताने लगी। तपस्वी ने पत्नी से कहा-‘मैं इस कन्या का विवाह भगवान सूर्य से करना चाहता हूं।पत्नी बोली-‘यह तो बहुत अच्छा विचार है। इसका विवाह सूर्य से कर दीजिए।

तपस्वी ने सूर्य भगवान का आह्वान किया। भगवान सूर्य उपस्थित हो गए। तपस्वी ने अपनी पुत्री से कहा- ‘यह सारे संसार को प्रकाशित करने वाले भगवान सूर्य हैं। क्या तुम इनसे विवाह करोगी?’ लड़की ने कहा-‘उनका स्वभाव तो बहुत गरम है। जो इनसे उत्तम हो, उसे बुलाइए।लड़की की बात सुनकर सूर्य ने सुझाव दिया-‘मुझसे श्रेष्ठ तो बादल है। वह तो मुझे भी ढक लेता है।

तपस्वी ने मंत्र द्वारा बादल को बुलाया और अपनी पुत्री से पूछा-‘क्या तुम्हें बादल पसंद है?’लड़की ने कहा-‘यह तो काले रंग का है। कोई इससे भी उत्तम वर हो तो बताइए।तब तपस्वी ने बादल से ही पूछा-‘तुमसे जो उत्तम हो, उसका नाम बताओ।बादल ने बताया-‘मुझसे उत्तम वायु देवता हैं। वह तो मुझे भी उड़ा ले जाते हैं।तपस्वी ने वायु देवता का आह्वान किया। वायु को देखकर लड़की ने कहा-‘वायु है तो शक्तिशाली, पर चंचल बहुत है। यदि कोई इससे अच्छा हो तो उसे बुलाइए।

तपस्वी ने वायु से पूछा-‘बताओ, तुमसे अच्छा कौन है?’ वायु ने कहा-‘मुझसे श्रेष्ठ तो पर्वत ही होता है। वह मेरी गति को भी रोक देता है।तपस्वी ने पर्वत को बुलाया। पर्वत के आने पर लड़की ने कहा-‘पर्वत तो बहुत कठोर है। किसी दूसरे वर की खोज कीजिए।

तपस्वी ने पर्वत से पूछा-‘पर्वतराज, तुम अपने से श्रेष्ठ किसी मानते हो?’ पर्वत ने कहा-‘चूहे मुझसे भी श्रेष्ट होते हैं। वे मेरे शरीर में भी छेद कर देते हैं।तपस्वी ने चूहों के राजा को बुलाया और पुत्री से प्रश्न किया-‘क्या तुम इसे पसंद करती हो?’

लड़की चूहे को देखकर बड़ी प्रसन्न हुई और उससे विवाह करने को तैयार हो गई। वह बोली-‘पिताजी, आप मुझे फिर से चुहिया बना दीजिए। मैं इनसे विवाह करके आनंदपूर्वक रह सकूंगी।तपस्वी ने उसे फिर से चुहिया बना दिया।

शनिवार, 25 जून 2011

साडे पंजाब दीयां केडियां रीसां


एक था मिलखासिंह। वह पंजाब का रहने वाला था। उसका एक मित्र कश्मीर की वादी में रहता था। मित्र का नाम था आफताब। एक बार मिलखासिंह को आफताब के यहां जाने का मौका मिला। दोनों मित्र लपककर एक-दूसरे के गले से लग गए। आफताब ने रसोईघर में जाकर स्वादिष्ट पकवान तैयार करने को कहा और मिलखासिंह के पास बैठ गया।

कुछ ही देर में खाने की बुलाहट हुई। मिलखासिंह ने भरपेट भोजन किया। आफताब ने पूछा, ‘यार, खाना कैसा लगा?’ मिलखा बोला, ‘खाना तो अच्छा था पर ‘साडे पंजाब दीयां केडियां रीसां (हमारे पंजाब का मुकाबला नहीं कर सकता)। आफताब को बात लग गई। रात के भोजन की तैयारी जोर-शोर से की जानी लगी। घर में खुशबू की लपटें उठ रही थीं। रात को खाने की मेज पर गुच्छी की सब्जी से लेकर मांस की कई किस्में भी परोसी गईं।

मिलखासिंह ने खा-पीकर डकार ली तो आफताब ने बेसब्री से पूछा-‘खाना कैसा लगा, दोस्त?’‘साडे पंजाब दीयां केडियां रीसां।’ मिलखासिंह ने फिर वही जवाब दिया। आफताब के लिए तो बहुत परेशानी हो गई। वह अपने मित्र के मुंह से कहलवाना चाहता था कि कश्मीरी खाना बहुत लज्जतदार होता है।

वादी के होशियार रसोइए बुलवाए गए। घर में ऐसा हंगामा मच गया मानो किसी बड़ी दावत की तैयारी हो। अगले दिन दोपहर के भोजन में एक-से-एक महंगे और स्वादिष्ट व्यंजन परोसे गए। रोगनजोड़ा, कबाब, करम का साग, केसरिया चावल, खीर आदि पकवानों में से खुशबू की लपटें उठ रही थीं।

कांच के सुंदर प्यालों में कई किस्म के फल रखे गए थे। मिलखासिंह ने भोजन किया और आफताब के पूछने से पहले ही बोला, ‘अरे, ऐसा लगता है, किसी धन्नासेठ की दावत है।’ आफताब के मन को फिर भी तसल्ली न हुई। मिलखासिंह जी पंजाब लौट गए।

कुछ समय बाद आफताब को पंजाब लाने का अवसर मिला। उसने सोचा-‘मिलखासिंह के घर जरूर जाऊंगा। देखूं तो सही, वह क्या खाते हैं?’

मिलखासिंह ने कश्मीरी मित्र का स्वागत किया। थोड़ी ही देर में भोजन का समय हो गया। दोनों मित्र खाना खाने बैठे। मिलखा की पत्नी दो प्लेटों में सरसों का साग और मक्के की रोटी ले आई। दो गिलासों में मलाईदार लस्सी भी थी।

आफताब अन्य व्यंजनों की प्रतीक्षा करने लगा। मिलखासिंह बोला, ‘खाओ भई, खाना ठंडा हो रहा है।’

आफताब ने सोचा कि शायद अगले दिन पंजाब के कुछ खास व्यंजन परोसे जाएंगे। अगले दिन भी वही रोटी और साग परोसे गए। आफताब ने हैरानी से पूछा, ‘मिलखासिंह, तुम तो कहते थे कि ‘पंजाब दीयां केडियां रीसां’। यह तो बिलकुल साधारण भोजन है।’

मिलखासिंह ने हंसकर उत्तर दिया, ‘आफताब भाई, तुम्हारे भोजन के स्वाद में कोई कमी न थी, किंतु वह इतना महंगा था कि आम आदमी की पहुंच से बाहर था।

हम गांववाले सादा भोजन करते हैं, जो कि पौष्टिक भी है और सस्ता भी। यही हमारी सेहत का राज है।’

आफताब जान गया कि मिलखासिंह सही कह रहा था। सादा भोजन ही अच्छे स्वास्थ्य का राज है

शनिवार, 30 अप्रैल 2011

आधुनिक बोधकथाएँ -४. सुंदर गायिका ।

अकबर-बिरबल ।

 (सौजन्य-गुगल)
सुंदर गायिका ।


अकबर - "बिरबल,तानसेनजी एक माह की पी.एल. (छुट्टी) पर जानेवाले हैं । यार, उनकी जगह मन बहलाने लिए, इस बार अगर सुंदर गायिका का प्रबंध हो जाए, तो मझा आ जाए..!!"

बिरबल -" बादशाह सलामत, एक काम करते हैं । सारे राज्य में ढिंढोरा पिटवा के, सुंदर गायिका का इंटरव्यू करते हैं ना, ठीक है?"

अकबर -" वैरी गुड आइडिया, बिरबल ऐसा ही करते हैं । तानसेनजी एक हफ़्ते के बाद, छुट्टी पर जानेवाले है,उससे पहले गायिका का एपॉइन्टमेन्ट हो जाना चाहिए,क्या?"


बिरबल - " डॉन्ट वरी, जहाँपनाह, मैं हूँ ना..!!  ऐसा ही होगा, आप निश्चिंत रहें ।"


तुरंत, सारे राज्य में ढिंढोरा पिटवाया गया । कई रूपमती,नाज़ुक,सुंदर गायिका इंटरव्यू के लिए उपस्थित हो गई । इनमें से कुछ स्वरूपवान गायिका,  सेमी फ़ाइनल राउंड के लिए सिलेक्ट भी हुई ।

इसी दौरान, एक दिन बादशाह अकबर, बड़े गभराये से, बौखलाये से ,बिरबल के पास पहुँचे..!!

चेहरे पर आतंक के भाव के साथ,बादशाह ने बिरबल से कहा," यार, बिरबल, महल में, मेरी बेग़म को पता चल गया है कि, हम तानसेन की एवज़ में सुंदर गायिका ढूंढ रहे हैं । पता नहीं कहाँ से, उसकी कोई सहेली आ धमकी है? अब बेग़म ने पूरा महल सर पे उठा लिया है कि अगर गायिका सिलेक्ट करना है तो, उसे ही एपॉइन्ट करना पड़ेगा..!! बिरबल,यु...नॉ..तु तो समझता है ना, हम सुंदर गायिका क्यों ढूंढ रहे हैं? जल्दी कुछ कर यार,कुछ कर...!!"

बिरबल- "जहाँपनाह, आप बेग़म से इतना डरते क्यों हैं..!! अगर ऐसी बात है तो, आप सबकुछ मुझ पर छोड़ दीजिए, मैं कुछ करता हूँ ।"

तुरंत,सिर पर पैर लिए, बिरबल, महल की ओर भागे..!! बेग़म साहिबा को,पता नहीं बिरबल ने क्या समझाया कि, शाम होते होते ही, बेग़म ने ज़िद त्याग कर, अपनी सहेली को उसके गाँव परत भेज दिया..!!

बादशाह को जब, ये बात  ज्ञात हुई कि, बेग़म की सहेली वापस गाँव चली गई है तब,उन्होंने बिरबल को, ढेर सारे इनाम से नवाज़ा और पूछा,

"यार..तुमने ऐसा क्या किया कि, बेग़म ने अपनी ज़िद त्याग कर, अपनी सहेली को,गाँव  भगा दिया?

बिरबल ने गंभीर होकर,बादशाह सलामत से कहा-" कुछ खास नहीं,जहाँपनाह..!! मैंने तो बेग़म साहिबा को सिर्फ इतना ही कहा कि, बादशाह सलामत, भरे दरबार में बूढ़े तानसेन के आलाप सुन सुन कर बोर हो गए हैं..!!  इसलिए अब एक माह के लिए, जहाँपनाह को, भरे दरबार की जगह, हमामख़ाने में, अपने मनोरंजन के लिए, अत्यंत सुंदर, रूपमती, बाथरूम सिंगर को एपॉइन्ट करना है..!!"

बादशाह, " यु आर वैरी स्मार्ट,बिरबल..,फिर क्या हुआ?"

बिरबल," फिर क्या? बेग़म साहिबा को मैंने समझाया, आपकी सहेली बहुत खूबसूरत है, अगर बादशाह ने, उसे हमेशा रख लिया तब तो पक्का, आपका स्थान ख़तरे में है..!!"

बादशाह-"शाबाश, बिरबल, ये ले, उपहार में, ये नौलखा हार भी रख और बता, बाद में क्या हुआ?"

बिरबल -" बाद में? बाद में, बेग़म साहिबा ने, तानसेनजी को तलब करके उनकी पी.एल (छुट्टियाँ) रद्द कर दी..!!"

बादशाह-" अ...रे, या..आ..आ..र..!! ये क्या हो गया?"

आधुनिक बोध- नारी को समझाने के लिए, नारीमें छुपे जन्मजात इर्ष्याभाव को जाग्रत करके उसका कुशलता से सदुपयोग करने में कोई बुराई नहीं है..!!


मार्कण्ड दवे ।दिनांक-३०-०४-२०११.
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प्यारे दोस्तों,
अगर आप मूल रचनाकार हैं,तो आपके सृजनकी रक्षा के लिए, निम्न आलेख, मेरे ब्लॉग पर, आकर ज़रूर पढें ।

कॉपीराइट एक्ट | HELPFUL HAND BOOK

http://mktvfilms.blogspot.com/2011/04/helpful-hand-book.html

(प्रतिलिपि अधिकार अधिनियम)

 (HELPFUL HAND BOOK)


भड़कीला सवाल- " डॉमेस्टिक वायॉलन्स एक्ट २००५ भी, एक तरह से कॉपी राइट भंग का कानून है क्या?"


चटकीला जवाब-"शायद, मगर अच्छा है कि,किसी के सास-ससुर, अपने मौलिक सृजन,(बेटी) का विवाह करने के पश्चात उसे, अपनी कॉपी राइट प्रोटेक्टेड मिल्कियत मान कर, बेटी में देखे गए, शारीरिक,मानसिक,आर्थिक और सामाजिक स्तर के बदलाव का हिसाब माँगकर, कॉपी राइट एक्ट उल्लंघन का नोटिस नहीं भेजते हैं वर्ना, कोई भी दामाद का बच्चा, सास-ससुर के इस अनमोल मौलिक सृजन को, शादी के दिन जैसा, तरोताज़ा कहाँ रख पाता है?"

मार्कण्ड दवे । दिनांक- २७ नवम्बर २०१०.

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

लालच का अंत ?

       किसी गांव में एक समय चार मित्र बेहतर भविष्य की तलाश में भोजन-पानी की आवश्यक तैयारी के साथ शहर की ओर निकले । रास्ते में विश्राम के समय एक सन्यासी से मुलाकात के बाद उन्होंने अपना मकसद उन सन्यासी को बताया, तब सन्यासी ने उन्हें चार बत्तीयां देते हुए कहा कि सामने दिख रही पहाडी पर तुम जाओ । जहाँ भी कोई बत्ती गिरे वहीं थोडी खुदाई करने पर तुम्हें तुम्हारे उद्देश्य की पूर्ति जितना धन प्राप्त हो जावेगा । सभी ने आपस में विचार-विमर्श कर सन्यासीजी को धन्यवाद दिया और पहाडी की ओर चढना प्रारम्भ किया ।
 
          कुछ दूर चढने पर एक बत्ती गिर गई । सबने वहाँ खुदाई की तो अन्दर लोहा ही लोहा दिखने लगा । एक मित्र ने कहा कि अपना मकसद इस लोहे को बेचकर पूरा हो सकता है । किन्तु बाकि तीनों मित्रों को उसकी बात समझ में नहीं आई । तब वह मित्र वहीं रुककर अपने लिये उस लोहे के भण्डार को ले जाने की व्यवस्था में लग गया और शेष तीनों मित्र आगे निकल गये ।
 
           और थोडी चढाई चढने पर फिर एक बत्ती गिरी । वहाँ तीनों ने खुदाई की तो भरपूर तांबा वहाँ मौजूद पाया । उनमें से फिर एक मित्र बोला ये उस लोहे की तुलना में कहीं अधिक बेहतर विकल्प है और इसमें हम तीनों का भविष्य बन सकता है । तब बाकि दो मित्रों को उसकी बात सही नहीं लगी और वह मित्र तांबे के द्वारा अपना भविष्य संवारने वहीं रुक गया व शेष दोनों मित्र फिर आगे चढने लगे । 
 
            कुछ और उपर चढने पर एक बत्ती फिर गिरी । दोनों मित्रों ने वहाँ खुदाई करके देखा तो वहाँ चांदी की ढेरों सिल्लीयां निकली ।
तब दोनों में से एक मित्र की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा । उसने दूसरे से कहा- वे दोनों तो लोहे और तांबे में ही रह गये यहाँ तो इतनी चांदी मौजूद है कि हमें अब जीवन में कोई कमी ही नहीं रहेगी । किन्तु दूसरे मित्र ने कहा कि ये चांदी तुम ले जाओ मैं अभी और आगे जाऊंगा । तब संतुष्ट मित्र चांदी ले जाने की व्यवस्था में लग गया और दूसरा फिर उपर की ओर निकल गया ।

           वह थोडा ही और उपर पहुंचा कि चौथी बत्ती भी गिरी । उसने वहाँ खुदाई की तो उसकी उम्मीद के मुताबिक वहाँ सोने का खजाना दिखने लगा । अब तो उसकी प्रसन्नता की सीमा न रही । उसने उपर की ओर देखा तो पहाडी की चोटी थोडी ही दूरी पर दिख रही थी । तब उसने सोचा कि ये पहाड तो बहुमूल्य संपदाओं से भरा पडा है और ये बत्तियां तो उन स्वामीजी ने प्रतीक रुप में ही दी हैं । इस सोने पर तो मेरे अलावा अब और किसी का कोई हिस्सा भी नहीं बचा है किन्तु जिस तरह इस पहाड पर लोहा, तांबा, चांदी व सोना मिला है ऐसे ही इस पहाडी की चोटी पर हीरे-जवाहरात भी अवश्य ही मौजूद होंगे । लगे हाथों मैं उस चोटी पर भी देख लूं ।
 
           यह सोचकर वह व्यक्ति उस पहाडी की चोटी पर पहुंचा, लेकिन आश्चर्यजनक तरीके से उसे वहाँ एक ऐसा आदमी दिखा जो हिल-डुल भी नहीं पा रहा था और उसके सिर पर एक बडा सा चक्र धंसा हुआ था जो निरन्तर घूम रहा था । बडे आश्चर्य़ के साथ उसने उस चक्र वाले व्यक्ति से पूछा- आप कौन हैं और आपके सिर में ये चक्र कैसे फंसा घूम रहा है ? उसके इतना पूछते ही चमत्कारिक तरीके से वह चक्र पहले से मौजूद व्यक्ति के सिर से उतरकर पहाड चढने वाले उस अन्तिम चौथे मित्र की सिर में धंस गया । मुक्त होने वाला व्यक्ति उससे बोला- धन्यवाद तुम्हारा जो अपने लालच के कारण तुम उपर तक आगए । अब न तुम्हें कभी भूख-प्यास लगेगी और न ही ये चक्र तुम्हारे सिर से हटेगा । हाँ यदि कोई तुमसे बडा लालची तुम्हारी किस्मत से यहाँ तक आ जावेगा तभी तुम अपनी मुक्ति का कामना कर सकते हो । मैं तो अब इस बोझ से मुक्त होकर जा रहा हूँ ।
 
            पुरातन काल की ये कथा कितनी सत्य या असत्य है ये तो शायद कोई भी नहीं जानता किन्तु लालच का भूत तो ऐसा ही है जिसकी गिरफ्त में देश-दुनिया की नामी-गिरामी शख्सियतें भी सर पर ये चक्र धंसवाए भोजन-पानी कि चिन्ता से कहीं अधिक और बडे भण्डार की तलाश में घूम रही हैं, और भ्रष्टाचार  व विध्वंस के नये-नये तरीके इजाद भी करवा रही हैं ।  आपका
क्या ख्याल है ?


      

लोभ का परिणाम

एक लोभी सेठ था एक दिन उसने सोचा की किसी ब्रामण को भोजन कराकर क्यों न पुन्य कमा लिया जाए . इसके लिए उसने एक दुबले पतले ब्रामण की तलाश करना शुरू कर दिया . वह सेठ एक दुबले पतले ब्रामण के पास पहुंचा और उसे भोजन कराने की इच्छा प्रकट की और उससे पूछा - महाराज आप कितना भोजन लेते हैं .

वह ब्रामण उस सेठ को अच्छी तरह से जानता था उसने सेठ से कहा - मैं तो मात्र सौ ग्राम भोजन करता हूँ . सेठ उसकी बात सुनकर बड़ा प्रसन्न हो गया और ब्रामण से बोला - ठीक है महाराज आप भोजन करने घर पर आ जाना और उस समय मैं घर पर नहीं रहूँगा .

सेठ ने घर पहुंचकर अपनी पत्नी को कहा - मुझे जरुरी काम है मैं कल घर पर नहीं रहूँगा ..एक ब्रामण देवता आएंगे तुम उसे भोजन करा देना . दूसरे दिन ब्रामण भोजन करने सेठ के घर पहुंचा . सेठानी ने बड़ी आवभगत की और आदर के साथ पंडित जी से बोली - महाराज आप क्या लेंगें . मौका ताड़ कर ब्रामण ने कहा - बस जादा नहीं दस मन आटा, चार मन चावल और दस सेर घी, एक मन शक्कर मेरे घर पर भिजवा दो और फिर उस ब्रामण ने सेठजी के यहाँ डट कर भोजन किया और वहां से बिदा ली .

घर आकर वह ब्रामण ओढ़ तानकर सो गया और सोते सोते अपनी पत्नी से बोला - सेठजी जब घर आयें तो तुम उन्हें देखते ही रोने लगना और उनसे कहना की जबसे आपके घर से आयें हैं तो तबसे एकदम से सख्त बीमार पड़ गए हैं और उनके बचने की कोई उम्मीद नहीं है . उधर सेठ अपने घर पहुंचा और सारा वृतांत अपनी पत्नी से सुना तो उसके होश उड़ गए और वह बेहोश हो गया .

होश आने पर वह ब्रामण के घर पहुंचा तो तो उसने ब्रामण को बिस्तर पर पड़े देखा और ब्रामण की पत्नी ने रो रोकर आसमान सर पर उठा लिया और सेठ के सामने छाती ठौंककर चीख पुकार करना शुरू कर दिया तो सेठजी की हालत पतली हो गई .
सेठजी ने धीरे से ब्रामण की पत्नी के हाथों में बीस हजार रुपये पकड़ा दिये और बोले ब्रामण जी का अच्छे से उपचार कराओ पर हाँ यह बात ध्यान में रखना और किसी से न कहना की ब्रामण महोदय ने मेरे यहाँ भोजन किये थे . इस तरह लोभी सेठ लुट पिट कर अपने घर की और रवाना हो गया .

"सच है की अति लोभ का परिणाम अच्छा नहीं होता है ."

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

बिना विचारे जो करे, सो पाछे पछताए !

सेठ घनश्याम दास कपड़े का बहुत बड़ा व्यापारी था। उसने ढेरों दौलत जमा कर रखी थी। उसका व्यापार आस-पास के देशों में भी फैल चुका था। वह कभी-कभी उन देशों की यात्रा भी किया करता था। जब उसका बेटा जवान हो गया तो वह अपने पिता के व्यापार में हाथ बंटाने लगा।

एक बार घनश्याम दास ने अपने बेटे रामदास से कहा—‘‘हमारे पास दूर देश से बहुत बड़ा आर्डर आया है, तुम्हें सामान लेकर वहां जाना होगा।’’ रामदास ने अब तक किसी देश की यात्रा नहीं की थी। वह यह जानकर बहुत खुश हुआ कि उसके अब्बा उसे दूर देश भेज रहे हैं। उसने तुरंत वहां जाने की तैयारी शुरू कर दी।

अगले दिन रामदास सामान लेकर यात्रा के लिए रवाना हो गया। वह होटल में सामान रखकर वहां के बाजार में घूमने निकला। रास्ते में उसने एक निराला फल बिकते देखा। उसने इतना बड़ा फल आज तक नहीं देखा था। वह फल के पास गया और फल को हाथ में उठाकर देखा तो हैरान रह गया कि ऊपर से कांटों वाला यह फल बहुत ही भारी था। रामदास ने पूछा—‘‘भाई, इसे क्या कहते हैं ?’ फल वाला हंसते हुए बोला-‘‘साहब, इसे कटहल कहते हैं।’’

रामदास ने कटहल को सूंघकर देखा तो उसे कटहल की खुशबू अच्छी लगी। वह सोचने लगा कि यदि इस कटहल की खुशबू इतनी अच्छी है तो स्वाद कितना अच्छा होगा ? परंतु मन ही मन रामदास यह सोच रहा था कि इतना बड़ा फल बहुत महंगा होगा। उसने फल वाले से पूछा—‘‘भाई, कटहल कितने का है ?’’ फल वाले ने उत्तर दिया—‘‘दस आने का।’’

रामदास को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। उसे लगा कि शायद उसने गलत सुना है या फल वाले का ध्यान कहीं और है, इस कारण उसने गलती से कटहल का दाम कम बता दिया है। उसने तुरंत जेब से पैसे निकाले और कटहल खरीद लिया। कटहल खरीद कर वह सीधे होटल पहुंचा। छुरी निकाल कर कटहल काट लिया और उसे खाने लगा। उसे कटहल का स्वाद बहुत अच्छा लग रहा था, इस कारण आधे से अधिक कटहल उसने खा लिया।

खाने के पश्चात वह नल पर हाथ धोने गया, परंतु उसके हाथ व मुंह बुरी तरह से चिपक रहे थे, इस कारण साफ नहीं हो सके। हाथ धोने की कोशिश में वे और भी ज्यादा चिपक गए। उसने हाथों को बार-बार साबुन से रगड़ा परंतु वे साफ नहीं हो रहे थे। उसने देखा कि कटहल का रस कपड़ों पर लग गया है। उसने कपड़ों को नैपकिन से साफ करने की कोशिश की, परंतु नैपकिन कपड़ो से चिपक गया।

वह अकेला था इस कारण समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे। वैसे भी रामदास अपने घर से पहली बार अकेला निकला था। इस कारण थोड़ा घबरा रहा था। उसने सोचा कि होटल के मालिक या किसी नौकर से पूँछ लूं कि इसे कैसे साफ किया जाए। रामदास कमरे से बाहर निकल कर ज्यों ही किसी के सामने पड़ा वह व्यक्ति रामदास को देखकर हंसने लगा। रामदास की हिम्मत ही नहीं हुई कि वह किसी से कुछ पूछे।

वह चुपचाप होटल के बाहर निकल गया। बाहर तेज हवा चल रही थी। सड़क के पत्ते उड़-उड़ कर रामदास के कपड़ों पर चिपकने लगे। उसकी मूछों के बाल भी चिपक कर अजीब से लग रहे थे। हवा के साथ धूल-मिट्टी, कागज, पंख आदि उसके कपड़ों व हाथों में चिपकते जा रहे थे। वह जिधर से निकलता, उधर से लोग उसे देखकर हंसने लगते। उसका चेहरा भी धूल से चिपकने से गंदा लगने लगा था।

कुछ लोग उसे पागल समझकर उसके पीछे चलने लगे। रामदास समझ में नहीं आया कि वह क्या करे। वह चुपचाप दुकान में घुस गया और एक कोने में छिपने का प्रयास करने लगा। संयोग से वह दुकान एक सर्राफ की थी। वहां ग्रहकों को दिखाए गए आभूषण एक मेज पर रखे थे। रामदास उस मेज से टकरा गया और कुछ आभूषण उसके कपड़ों से जा चिपके। ज्योंहि रामदास छिपने का प्रयास करने लगा दुकान के मालिकी निगाह उस पर गई।

उसने चोर-चोर’ कह-कहकर शोर मचा दिया। दुकान के नौकरों ने रामदास को पकड़ लिया। भीड़ इकट्ठी हो गई।
पुलिस को खबर दी गई। रामदास ने लाख समझाया कि उसने चोरी नहीं की है परंतु उसके कपड़ों पर चिपके आभूषणों के कारण किसी को विश्वास न हुआ। उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया। पुलिस ने रामदास से चोरी का कारण जानना चाहा तो उसने सविस्तार से कटहल खाने की पूरी बात उन्हें बता दी।

थानेदार हंसता हुआ बोला—‘‘अरे मियां, जब खाना नहीं आता था तो कटहल खाया क्यों ? अच्छा, यह बताओ कि तुम किस व्यापारी के यहां आए थे।’’ रामदास को उस व्यापारी के यहां ले जाया गया। परंतु उस व्यापारी ने रामदास के हुलिए के कारण उसे पहचानने से इन्कार कर दिया। तब रामदास ने अपना व अपने पिता का पूरा नाम बताया, साथ ही अपने साथ लाए सामान की पूरी जानकारी दी। इस पर व्यापारी ने उसे पहचानते हुए कहा—‘‘थानेदार जी, यह अपना ही बच्चा है। इसे छोड़ दीजिए। यह हालात के कारण मुसीबत में फंस गया है।’’

अब रामदास बोला—‘‘पहले मुझे इस मुसीबत से छुटकारा दिलाइए।’’ व्यापारी ने रामदास को बदलने के लिए कपड़े दिए। उसका चेहरा व हाथ-पैर साफ करवाए, फिर उसकी अच्छी खातिरदारी की और कहा—

‘‘बेटा याद रख, किसी भी नई चीज को आजमाने से पहले उसकी जानकारी अवश्य ले लेनी चाहिए।’’