मंच पर सक्रिय योगदान न करने वाले सदस्यो की सदस्यता समाप्त कर दी गयी है, यदि कोई मंच पर सदस्यता के लिए दोबारा आवेदन करता है तो उनकी सदस्यता पर तभी विचार किया जाएगा जब वे मंच पर सक्रियता बनाए रखेंगे ...... धन्यवाद   -  रामलाल ब्लॉग व्यस्थापक

हास्य जीवन का अनमोल तोहफा    ====> हास्य जीवन का प्रभात है, शीतकाल की मधुर धूप है तो ग्रीष्म की तपती दुपहरी में सघन छाया। इससे आप तो आनंद पाते ही हैं दूसरों को भी आनंदित करते हैं।

हँसे और बीमारी दूर भगाये====>आज के इस तनावपूर्ण वातावरण में व्यक्ति अपनी मुस्कुराहट को भूलता जा रहा है और उच्च रक्तचाप, शुगर, माइग्रेन, हिस्टीरिया, पागलपन, डिप्रेशन आदि बहुत सी बीमारियों को निमंत्रण दे रहा है।

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शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

गधे पर शेर...


मेरे पिछले पोस्ट में मजबूरी वश मुझे प्राप्त सवाल का जवाब ही पोस्ट कर सका क्योंकि सवाल मेल से मिट गया था.
अब वही सवाल मेरे पास फिर आ गया है, इसलिए सवाल और जवाब दोनों पोस्ट कर रहा हूँ.

सवाल था गधे पर फोटो देख कर शेयर लिखिए.
और प्रेषक का शेर भी साथ था --
देखिए फोटो, पढ़िए शेर और फिर मेरा जवाब... शायद अब तालमेल भाए..



प्रेषक का शेर...

हर समंदर में साहिल नहीं होता,

हर जहाज पे मिसाइल नहीं होता,
अगर धीरुभाई अम्बानी नहीं होता,
तो - हर गधे के पास मोबाईल नहीं होता |


मेरा जवाब ....


Sahi hai bhai,
सही बात है भाई !!!!!
Aaj har gadhe ke paas mobile hota hai,
आज हर गधे के पास मोबाईल होता है,
par kya har mobile wala gadha hota hai?
पर क्या मोबाईल वाला गधा होता है?
Agar haan to sochye !!!!!!*
अगर हाँ तो सोचिए,
waqt padne par gadhe ko bhi baap banana padta hai,
वक्त पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है,
kya waqt aane par "baap ko bhi ........................"?
क्या वक्त आने पर बाप को भी "........................................."?

…………………………………

शनिवार, 24 सितंबर 2011

पत्नी..!!




(Courtesy Google images)

पत्नी..!!


प्रिय मित्र,

एक बार, एक पति देव से किसी ने सवाल किया,"पति-पत्नी के बीच विवाह - विच्छेद होने की प्रमुख वजह क्या है?"

विवाहित जीवन से त्रस्त पति ने कहा,"शादी..!!"

हमें तो इनका जवाब शत-प्रतिशत सही लगता है.!!

पति आजीवन ऐसी गलतफ़हमी में जीता है कि, मेरी पत्नी, मेरे उन ख्याल के अनुरूप, बानी-व्यवहार अपना कर,सहजीवनका सच्चा धर्म निभा रही है..!!

पर, सत्य हकीक़त यही होती है कि, विवाह के पश्चात, पति देव के ख्यालात आहिस्ता-आहिस्ता कब बदल कर पत्नी के रंग में रंग जाते हैं,पता ही नहीं चलता..!!

 हालाँकि, पति देव के मुकाबले, जगत की सभी पत्नीओं की, छठी इंद्रिय (sixth sense) बचपन से ही, जाग्रत होने की वजह से, वह ये बात अच्छी तरह जानती हैं कि, विवाहित जीवन सुखद बनाने के लिए, पति को समझने में ज्यादा समय व्यतित करना चाहिए और  उसे प्यार करने में कम से कम..!!

इसी तरह, पति देव भी, अपने नर-प्राणी होने की गुरूताग्रंथी से ग्रसित होकर, शादी के बाद थोड़े ही दिनों में समझ जाता है कि, विवाहित जीवन सुखद बिताने के लिए, पत्नी को प्रेम करने का दिखावा करने में ज्यादा समय देना चाहिए और उसे समझने के लिए कम से कम..!! (जिसे बनाने के बाद, खुद ईश्वर आजतक समझ न पाया हो, उसे कोई पति क्या ख़ाक समझ पाएगा?)

इसीलिए,ऐसा कहा जाता है कि, जीवन में दो बार आदमी, औरत को समझ नहीं पता,(१) शादी से पहले (२)शादी के बाद..!!

पत्नी को समझने में अपना दिमाग ज्यादा खर्च न करने के कारण ही, विवाहित पुरूष,किसी कुँवारे मर्द के मुकाबले ज्यादा लंबी आयु बिताते है, ये बात और है कि, विवाह करने के बाद, ज्यादातर पति देव (मर्द) लंबी आयु भुगतने के लिए राज़ी नहीं होते..!! 

 सन-१९६०-७० के दशक तक तो, भारत के कई प्रांत में,घर के मुखिया की पसंद के आगे, नतमस्तक होकर, हाँ-ना कुछ कहे बिना ही विवाह करने का रिवाज़ अमल में था । हालाँकि, ऐसे रिवाज़ के चलते कई पति-पत्नी आज भी मन ही मन अपना जीवन, किसी बेढंगी बैलगाडी की रफ़्तार से, मजबूर होकर, बेमन से संबंध निभा रहे होंगे..!!

मुझे सन-१९५८ का एक,ऐसा ही किस्सा याद आ रहा है, हमारे गुजरात के एक गाँव में, किसी कन्या को देखने के लिए गए हुए,एक युवक और उसके माता पिता को, भोजन का समय होते ही, कन्या के माता-पिता ने, मेहमानों को भोजन ग्रहण करने के लिए प्रेमपूर्वक आग्रह किया, जिसे मेहमान ठुकरा न सके । उधर  कन्या के परिवार को लगा कि, विवाह के लिए सब राज़ी है,तभी तो हमारे घर का भोजन मेहमानोंने ग्रहण किया है..!! अतः विवाह वांच्छूक युवक की झूठी थाली में, उस कन्या को उसकी माता ने भोजन परोसा । मारे शर्म के कन्या ने, अपने होनेवाले पति का झूठा  भोजन ग्रहण किया..!! हिंदु शास्त्र की मान्यता के अनुसार, जो कन्या ऐसे समय किसी युवक का झूठा खा लेती हैं तो, वह दोनों विवाह के लिए राज़ी है ऐसा माना जाता है । 

हालाँकि,बाद में पता चला कि, कन्या का वर्ण  श्याम होने के कारण, युवक इस कन्या से विवाह करने को राज़ी न था, पर परिवार के मुखिया के दबाव में आकर, उस युवक को अंत में, उसी कन्या से शादी करनी पड़ी..!!

आज भी ऐसी मान्यता है कि,"शादी-ब्याह, ईश्वर के यहाँ, पहले से तय हो जाते हैं । हम तो सिर्फ निमित्तमात्र है ।"

हमारे देश में मनोरंजन के नाम पर, प्रसारित हो रही करीब-करीब सारी सिरियल्स में, परिवार की किसी एक बहु को `वॅम्प-अनिष्ट`के रूप में पेश करके, कथा को रोचक बनाने के मसाले कूटे जाते हैं, यह देखकर मैं सोचता हूँ, ये सारे चेनल्सवाले,किसी भी नारी को इतना ख़राब क्यों दर्शाते हैं? हालाँकि,कर्कशा पत्नीओं की कलयुगी कहानी कोई नयी बात नहीं है, राम राज्य में भी कैकेयी-मंथरा की जुगलबंदीने, राजा दशरथ को सचमुच खटीया (मृत्युशैया) पकड़ने पर मजबूर करके, राजा  की खटीया खड़ी कर दी थी । इसी प्रकार महाभारत का भीषण युद्ध भी इर्षालु कर्कशा पत्नीओं के कारण ही हुआ था..!!

महान आयरिश नाट्य कार, जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ( George Bernard Shaw 26 July 1856 – 2 November 1950) कहते हैं कि," जिसकी पत्नी कर्कशा-झगड़ालू होती है, उसका पति बहुत अच्छा कवि-चिंतक-विवेचक-नाट्य कार बन सकता है..!! (इस श्रेणी में, मुझे मत गिनना, मैं अपवाद हूँ..!!)

एकबार, एक कंपनी की ऑफ़िस में, काम से सिलसिले से मैं गया । वहाँ दोपहर की चाय-पानी का विराम काल था और कंपनी  के आला अधिकारी के साथ पूरा स्टाफ मौजूद था, ऐसे में किसी बात पर स्टाफ के एक मेम्बर ने कबूल कर लिया कि, घर में उसकी पत्नी का राज है और वह अपनी पत्नी का चरण दास है..!! फिर तो क्या था..!! जैसे अपने मन में भरे पड़े, दबाव से सब लोग छुटकारा चाहते हो, धीरे-धीरे सब स्टाफ मेम्बर्स ने कबूल किया कि, वे सब पत्नी के चरण दास है और पत्नी के आगे उनकी एक नहीं चलती..!! बाद में, सारे स्टाफ मेम्बर्स चेहरे पर मैंने,`शेठ ब्रधर्स का हाजसोल चूरन` लेने के बाद हल्के होने के भाव को उभरते देखा..!! 

कर्कशा पत्नी को सुधारने का सही उपाय शायद यही है कि, आप पूर्ण निष्ठा भाव से, उनके चरण दास बन जाइए, बाकी सबकुछ अपने आप ठीक हो जाएगा? अगर कुछ  ठीक नहीं भी हो पाया तो, कम से कम, घर का माहौल ज्यादा बिगाड़ने से तो बच ही जाएगा..!! वर्ना..किसी रोज़ घरेलू हिंसा के, तरकटी मुक़द्दमों में फँस कर, पुलिसस्टेशन - कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने शुरू हो सकते हैं?

एक आखिरी नसिहत,आदरणीय श्री संजीव कुमार, विद्यासिन्हा की फिल्म,"पति-पत्नी और वोह" वाली `वोह` के चक्कर में कभी मत पड़ना, वर्ना आप को भी, रात-दिन ठंडे-ठंडे पानी से नहाने के दिन गुज़ारने का समय आ सकता है..!!

वैसे, आज आप भी, अपने सिर पर हाथ रखकर, कसम दोहरायें कि,

"मैं जो कहूँगा सच कहूँगा और सच के अलावा कुछ न कहूँगा..!!"

" क्या आप भी चरण दास हैं?"

"अरे..!! हँसना मना है, भाई..!!"


मार्कण्ड दवे । दिनांक- २०-०४-२०११.

शनिवार, 10 सितंबर 2011

सैंडल को सैंडल ही रहने दो दीवानो ...

सैंडलों की उड़ान का हवाई किस्‍सा भरपूर उमड़ रहा है।
विरोधियों के तो पेट में घुमड़ रहा है।
यह वही घुमड़ है, जिससे मरोड़ उठते हैं।
जिसके सैंडल है, उनके सामने करोड़ झुकते हैं।
वे और ये क्‍या खा-सोचकर मुकाबला करेंगे।
सैंडल इतने भी डल नहीं हैं। डल कहोगे तो काश्‍मीर की झील हो जायेंगे,
भूल गए क्‍या वहां की तस्‍वीर भी। सैंडल कभी चर्चा में नहीं रही हैं।
जूते पहले सुर्खियों में आए, फिर यदा-कदा चप्‍पलें भी आ पहुंची और अब एकदा सैंडलें पधारी हैं।

वे भी लाने को तैयार हो गए, जहाज भेज तो हम लाते हैं और आते हुए मुंबई से सैंडलें खरीद लाते हैं। उन्‍हें जरूर अहसास, यह खास हो गया होगा कि अगले बरस वे ही होंगे, कौन का यह अहसास, प्रत्‍येक कोण से लुभा रहा है। पर जिसने बन जाना है पीएम, वो क्‍यों मंगवाए सैंडल जितनी चीज महीन।

लीक्‍स का विकी अब लीक से हट रहा है। वैसे अपनी बात पर डट रहा है लेकिन जो डाट रहा है उसे, वो आंक रहा है तुझे। वो पाक नहीं है, न था, न रहेगा। पाक को तो वो कर रहा है खाक। सैंडलों को फिर भी रहा है ताक। सोच रहा होगा कि इसका ही बिजनेस कर लूंगा। जो डूब रही है अर्थव्‍यवस्‍था हमारी, उसको सुधारने की समझ लूंगा तैयारी।

जो लूट रहा है, वो दिखलाने के लिए लुट सकता है, लुटने में भी उसकी एक चाल है, जिसे नहीं समझ पा रही पीएम बनने की चाहत रखने वाली बाला है। उसे बाला कहो या कहो बाल, वो तो बिना बात ही कर देती है खड़े बवाल। उससे किसकी हिम्‍मत है करे सवाल, जो करे सवाल, वही सारे उत्‍तर निकालेगा, गाकर या कहकर। निकालनी हो बाल में से खाल, पर वे निकालती रही हैं सदा खाल में से बाल।

वही तड़पाते हैं, जब निकल-निकल कर आते हैं। वे मंगवाती हैं सैंडल, जिन्‍हें आसान होता है करना हैंडल। जूती वो पहनती नहीं हैं, अगर पहनेंगी तो समझेंगी कैसे? जूती समझना जरूरी है और पहनना बिल्‍कुल गैर-जरूरी। बिल्‍कुल उसी तरह जैसे मंगवाना जरूरी है, किसकी मजबूरी है, कितनी दूरी है, मायने नहीं रखती। सैंडल पहनाना जी हुजूरी है, इससे कैसे रख सकते, पहनाने वाले दूरी हैं। वे कभी नहीं कहती हैं मेरी सैंडल, वे कहती हैं मेरी जूती करेगी यह काम।

मेरी जूती देगी जवाब। मेरी जूती ही करेगी लाजवाब। सैंडल तो पैरों की धरोहर हैं, जेवर हैं, आभूषण हैं। सैंडल का किस्‍सा, सैंडल का है, जूती का नहीं है।

सैंडल को सैंडल ही रहने दो, इसे भ्रष्‍टाचार का नाम न दो। हवाई जहाज की उड़ान तो दो, पर विकिलीक्‍स का पैगाम मत दो। मत कहो इसे बुराई, यह तो है दुहाई। इसके लाने में ही कितनों की बची है नौकरी, कितनों ने है पदोन्‍नति पाई।

आप इतना आसान सा फलसफा भी क्‍यों नहीं समझ पाते हैं भाई, लेकिन अपनी बहनों के, सबकी बहनजी के नहीं। तिल सी बात को तिल ही रहने दो, इसे ताड़ मत बनाओ, यह तो है राई, जिसे बतलाना चाह रहे हो तुम खाई, कैसी विलक्षण बुद्धि है पाई ?

मंगलवार, 6 सितंबर 2011

एकदम अद्भुत कला है मास्‍टरी

शिक्षक दिवस पर विशेष



मास्‍टरी कला का गला कंप्‍यूटर दबा रहा है।मास्‍टरी को कला ही माना जाना चाहिए। किसी को पढ़ाना इतना आसान नहीं है, जितना समझ लिया जाता है। आजकल पढ़ाने वाले को, पढ़ने वाले पढ़ाने के लिए तैयार मिलते हैं। जरूरी नहीं है कि जो पढ़ाया जाना है, वो आपने पढ़ा ही हो। आपने नहीं पढ़ा होगा तो आपके लिए उसे पढ़ाना बहुत ही सरल होगा। आप निर्भय होकर कुछ भी कह सकते हैं। जब आपको उस बारे में कुछ मालूम ही नहीं है तो आप गलत पढ़ा रहे हैं, यह भी तो आपको नहीं मालूम हुआ।

अब यह जिम्‍मेदारी तो आपको चयन करने वाले की बनती है कि उसने आपको पढ़ाने के लिए चुना ही क्‍यों, अगर चुन लिया है, फिर तो दोष उसी का है। इससे होने वाले बुरे परिणाम भुगतने के लिए भी उसे ही तैयार रहना चाहिए। अच्‍छे परिणाम या पारिश्रमिक पर तो पढ़ाने वाले का हक बनता है, इससे कोई इंकार कैसे कर सकता है।

आपको मालूम ही है कि मास्‍टरी के बेंत यानी डंडे पर भी कानूनन रोक लग ही गई है। वैसे भी आप पढ़ाने जाते हैं, कोई लट्ठ चलाने तो जाते नहीं हैं या किसी बाबा के अनशन कार्यक्रम में सोते हुए लोगों को जगाने की जिम्‍मेदारी भी आपको नहीं सौंपी गई है। जब ऐसा है तो आपने सिर्फ पढ़ाना ही है और पढ़ाने के निशान, कोई लाठी के निशानों की तरह एकदम तरोताजा नजर भी नहीं आते हैं कि जिसको पढ़ाया है, तुरंत उसके दिमाग में झांककर देख लिया कि उसको समझ आया, नहीं आया – एकदम से इसको मापने का कोई मीटर भी अभी तक बना नहीं है, न हाल फिलहाल बनने की संभावना ही है।

परीक्षा भी आप 50 से 100 बच्‍चों की एकदम ले नहीं सकते हैं, क्‍योंकि आज न तो पढ़ने वालों और न पढ़ाने वालों के पास ही फालतू समय है जो पढ़ाने के बाद परीक्षा लेने और देने के लिए फिजूलखर्च करें। आप तो महीने के अंत में एकदम करारे-करारे लाल, नीले नोट गिनने के लिए तैयार रहा कीजिए। उसमें आपकी लापरवाही बर्दाश्‍त नहीं की जाएगी। आप पढ़ाने से छुट्टी ले सकते हैं अथवा बंक मार सकते हैं परंतु पगार वाले दिन तो आपको पगार पाने के लिए पसीना बहाना ही होगा। इससे ही मास्‍टर की मजबूती का मालूम चलता है।

मजबूती के लिए अब डंडे के प्रयोग की जरूरत, अब मास्‍टरी में नहीं रही है। पुलिस में है और खूब है तथा आजकल इस कला का प्रदर्शन चैनलों पर हर दूसरे दिन देखने को भी मिल रहा है। इससे लाठी विधा की लोकप्रियता के बारे में भी मालूम रहता है। रोज ही एकदम नए तरह के एकदम यूनीक नजारे नजर आते हैं। टीवी चैनलों के आने से आम जनता के लिए इस तरह के अजब गजब तरीकों की जानकारी पाना आसान हो गया है।

जो जानकारी पहले मिलती रही है, वो न तो विश्‍वस्‍त होती थी और उसके अफवाह होने या बाद में अफवाह साबित करने की पूरी संभावनाएं रहती थीं और इसे प्रयोग करने वालों को लोकप्रियता मिलने के रास्‍ते में यह एक ऐसी बाधा थी, जिससे पार पाना कभी आसान नहीं रहा है।
पहले बचपन में कक्षाओं में पढ़ने जाने का मतलब डंडे या बेंत से रूबरू होना भी रहा है, इसी वजह से कितने ही होनहार देश और परिवार का नाम रोशन करने से घर और समाज के अंधेरे में गुम होकर रह गए हैं, परंतु अब ऐसा नहीं है। इस तरह के अवसर मास्‍टरों के लिए अब दुर्लभ हो गए हैं। मास्‍टर बनने के बाद डंडे या बेंत चलाने का जोखिम आजकल कोई नहीं लेता है।

एक आध चपत लगाना भी बहुत दूर की बात है, अगर जोर से बच्‍चे पर चिल्‍ला भी दिए तो शाम तक खबर आ जाती है कि मास्‍टर के खिलाफ एफ आई आर दर्ज हो गई है क्‍योंकि बच्‍चे बर्दाश्‍त नहीं करते हैं और घर जाकर सीधे खुदकुशी कर लेते हैं। मास्‍टर को धमकाते भी नहीं हैं कि उन्‍हें अपनी गलती पर माफी मांगने या उसे सुधारने का अवसर मिल सके। इसमें तो सीधा जांच और जांच से पहले, सस्‍पेंड फिर गिरफ्तारी, इससे बचने के लिए थाने में दारोगा की सेवा और बाद में भी बचना मुश्किल और जेल के पीछे पहुंचना।

नौकरी भी गई और बदनामी भी मिली। अब आगे मास्‍टरी भी नहीं कर पायेंगे, ऐसा मुंह काला होता है कि कालापन चेहरे पर नहीं, पुलिस से सत्‍यापन कराते समय सबको नजर आता है।
बहरहाल,‍ जितना जोखिम पढ़ाने में नहीं है, उससे अधिक रिस्‍क तो साफ सुथरे कैरियर के साथ, बिना दागदार हुए मास्‍टरी का कार्यकाल पूरा करने में है। आप मास्‍टर भी बने रहें और मलाई भी चाटते रहें। इसके लिए आपको स्‍कूल में पढ़ाना तो नहीं ही है, साथ ही बच्‍चों से पंगा भी नहीं लेना है। अगर बच्‍चों की जेब में मोबाइल फोन हैं तो आपको ऐसे दिखाना है कि जैसे आपको इस बारे में मालूम ही नहीं है।

आप तो बिल्‍कुल मिट्टी के माधो हैं लेकिन दूसरी तरफ, बच्‍चों को साफ कह देना है कि अगर वे उत्‍तीर्ण होना चाहते हैं तो उनसे कोचिंग लेना अनिवार्य है और आपसे कोचिंग लेने पर उनके मेरिट में आने की पूरी गारंटी है। फिर आपके पास पैसा भी खूब आएगा और कोई स्‍टूडेंट आपको कभी नहीं धमकाएगा। आपके चारों ओर जी हजूरी करता नजर आएगा। इसलिए ही मास्‍टरी को आजकल कला की संज्ञा दी गई है। क्‍या आपको इसमें कुछ गफलत नजर आ रही है ?

बुधवार, 24 अगस्त 2011

पीएम जादूगर हैं या मदारी : फिर जादू की छड़ी ?

बिल्‍कुल नहीं डरा हूं मैं। अगर पीएम पूरे 40 मिनिट मेरे बारे में ही बोलते रहते, मैं तो तब भी रंच मात्र भयभीत नहीं होता। जिस पीएम से उनके संगी-साथी और देशवासी ही नहीं डरते हैं, उनसे भला मैं क्‍यों डरूंगा, जबकि सारा विश्‍व जानता है कि वे किससे डरते हैं, इसका खुलासा भी मैं नहीं करूंगा।

पीएम चाहे तो सब कुछ कर सकते हैं, पर वे चाह ही नहीं सकते, और जब उनके मन में चाह ही नहीं है तो उनके आगे कोई और राह खुल ही नहीं सकती है। जीवन में यह सच जान लेना चाहिए कि जी तो सिर्फ विचारों का वन है, वही ऐवन है जिसमें उपजता विचारों का स्‍पंदन है परंतु वन-उपवन से जिंदगी नहीं महका करती।

जिसे बतला रहे हैं जादू की छड़ी, उनके क्‍या किसी के पास भी नहीं होती है कभी। जादू की छड़ी तो कहीं पाई भी नहीं जाती, यह तो बहानागिरी है। जज्‍बा होता है कुछ कर गुजर जाने का और वो पीएम में तो है ही नहीं। मुझे जो जड़ से मिटाना चाहते हैं,

वे मिटाने की कोशिशें करते-करते एक दिन खुद ही मिट जाते हैं। जो मुझे मिटाना चाहते हैं एक बार वे खुद तो मिटने के लिए तैयार हों, वे तो जादू की छड़ी, सिर्फ इन तीन शब्‍दों को जादू की तरह इस्‍तेमाल कर रहे हैं और हर मौके पर फेल हो रहे हैं। वे पीएम हैं, मदारी नहीं है, यह तो उन्‍हें समझना चाहिए। जब मदारी नहीं हैं और न जादूगर ही हैं तो फिर क्‍यों बार बार जादू की छड़ी, जो होती ही नहीं है, उसी के इर्द-गिर्द अपने शब्‍दों के जाल-जंजाल बुनते रहते हैं।

अगर वे मदारी या जादूगर होते तो कहते कि मैं पीएम नहीं हूं और मेरे पास कुर्सी नहीं है। पर मैंने आजतक किसी मदारी या जादूगर को ऐसा कहते नहीं सुना है। आपने सुना है क्‍या ?

मजमा वही सफल होता है जिसे मदारी खुद जमाता है और उसी से भरपूर कमाता है। वही मदारी बंदर-बंदरी को मन के माफिक नचाता है, वही जहरीले सांपों को काबू में रखकर खेल दिखाता है, वही जंगली भालू को काबू करके नाच नचवाता है, वही मदारी अपने बच्‍चों को ऐसा होशियार बनाता है, उनको कलाकारी सिखाता है, उन्‍हीं से जोकर का काम लेता है, वे ही बच्‍चे हवा में रस्‍सी पर बेसहारे चलकर करतब दिखलाते हैं –

अब ऐसा तो नहीं करता है मदारी कि सारे काम खुद ही संपन्‍न करता है या करेगा तो सफल हो जाएगा। तो समझ लीजिए कि सफल प्रबंधन का जो गुर सड़कछाप मदारी जानता है, उससे हमारे पीएम क्‍यों अनभिज्ञ हैं ?

मदारी तमाशा दिखानेवाला है, वो खुद कभी तमाशा नहीं बनता। वो खुद तो सलाम भी नहीं ठोकता, वो कटोरा लेकर सबसे इनाम भी नहीं मांगता। बस सबको ड्यूटी बांट देता है, फिर खुद भाषण ही देता है, डुगडुगी की ताल पर सबको नचाता है और अपना पूरा धंधा खूब शान से चलाता है और हमारे पीएम .........

और डर ... डर मैं नहीं रहा हूं, डर गए हैं पीएम। अन्‍ना हमारे हैं जिनसे डर गए सारे हैं।

शनिवार, 20 अगस्त 2011

'अन्‍ना हमारे 'को भ्रष्‍टाचार ने पत्र लिखा

सुन अन्‍ना सुन, भ्रष्‍टाचार की मीठी धुन
फिल्‍मी गीतों में बार बार कहा गया कि आपस में प्रेम करो देशवासियों। पर देशवासी आपस में प्रेम नहीं कर पाए। उन्‍हें सदा पैसे से प्रेम रहा। कोई उन्‍हें मिला ही नहीं, जो आपस में प्रेम करना सिखलाता। सिखलाने वाला चाहता तो था कि वे आपस में प्रेम करना सीखें। पर वे धन से प्रेम करना सीख रहे थे। आपस की तो छोडि़ए, उन्‍हें तो अपने अच्‍छे और बुरे का भेद ही नहीं रहा। वे जो कार्य करते थे, वे सीधे-सीधे उन्‍हें खुद को नुकसान पहुंचाते रहे। पर वे यह समझते रहे कि फायदा हो रहा है। ऐसी स्थिति में क्‍या किया जा सकता था, इस स्थिति का लाभ उठाया उन्‍होंने, जो सत्‍ता के लालची थे या सत्‍ता में विराजमान थे। वे फायदा उठाते रहे, झोलियां न अपनी, न हमारी – दूर वालों की भरती रहे।
इन्‍हें कहा गया कि आपस में लड़ना मत। पर वे इन्‍हें लड़ाने में कामयाब होते रहे और ये लड़ते-भिड़ते रहे। फायदा लड़ाने-भिड़ाने वालों का ही होता रहा। मुझसे दो-दो हाथ करने या  लड़ने की, मुकाबला करने की बात आती तो सभी अपने को कमजोर समझते। इनकी समझ ऐसी विकसित कर दी गई थी कि इन्‍हें मुझसे से सभी कमजोर दिखलाई देते। कमजोरों को देख देखकर ये भी कमजोर होते गए। इनके कमजोर होने से देश भी कमजोर होने लगा। कितनी ही तरह की विटामिनों की ईजाद की गई परंतु सब नाकारा रहा। संसद में सब उपर से दुखी होते ही दिखते रहे। वास्‍तव में दुखी जनता होती रही। मैं फलता-फूलता रहा। तभी कॉमनवेल्‍थ खेल आयोजित हुए। मैं उसमें भी खूब जी भर कर, सिर डुबो-डुबोकर नहाया।  डुबकी मैं लगा रहा था और कॉमनमैन की वेल्‍थ डूब रही थी। जानकारी तो सभी को थी पर पर सब खुद ड्रम भरने के चक्‍कर में नजरें बचाते रहे। निगाहें भी इधर ही थीं, निशाना भी मैं था, फिर भी मुझे तनिक भी नुकसान नहीं होने पाया।
तभी अन्‍ना आए। आना कहना, हल्‍का है। अवतरित हुए बतलाना, बहुत सही है और इसी बोझ के तले दबकर मैं चीख-चिल्‍ला रहा हूं। पर मेरी चिल्‍लाहट जनता को सुनाई नहीं दे रही है। वैसे भी यह सच्‍चाई है कि अन्‍ना को देखकर मेरे सरपरस्‍तों के हाथ-पांव फूल गए हैं और उनके गलों की गलियों से आवाज ही नहीं निकल रही है, सुनाई तो तब देगी। सरकार के नुमाइंदे भीतर से बुरी तरह भन्‍ना रहे हैं और यह भनक उनके फेस पर बिल्‍कुल साफ दिखलाई दे रही है। अन्‍ना के हाथ में मुझसे मुकाबले के लिए जो गन्‍ना है, वो सरकार के नुमाइंदों के लिए तो लाठी रूप में है। जबकि जनता रूपी भगवान के लिए उसके भीतर बसी मिठास है, उसी मीठी मिठास की सबको आस है। आप चाहे उस मिठास भरे गन्‍ने से मारो किसी को अथवा घुमा दो संसद पर, सबकी खटिया खड़ी कर दो, जिससे खटिया पर सभी सवार खदबदा जाएं, गिर जाएं, औंधे मुंह लुढ़क-पुढ़क जाएं, पर यहां पर यह सब होता देखने की मजबूरी में ही मजबूती है।
चाहते तो सब हैं कि आपकी तरह बनें, मुझसे से लड़ें, कुरीतियों से भिड़ें पर जहां पर किसी को फायदा हो रहा हो, वहां से वे आंखें नहीं मूंद सकते हैं। आता हुआ भला किसे बुरा लगता है। जहां पर आ रहा हो वहां पर तो हम तन और मन से आपके साथ हैं पर जहां पर जाता दिखलाई दे रहा हो, वहां से आप हमें नदारद ही पायेंगे अन्‍ना हमारे। आप नाराज मत होना।
जहां अंधेरे में दूध डालना है तो सब पानी ही डालेंगे, इसीलिए उजाले की महिमा बखानी गई है। आप हैरान मत होना अन्‍ना हमारे। अंधेरे में ऐसा ही होता है। सुबह प्‍योर पानी भरा मिलेगा, जबकि उसमें ऐसे भी होंगे जिनके यहां पानी नहीं आ रहा होगा, पानी की किल्‍लत होगी, वे अपने अपने लोटों से हवा भी उंडेल गए होंगे क्‍योंकि फिंगर डिटेक्‍टर तो गेट पर लगा होगा, उसने तो दर्ज कर लिया होगा कि लोटे के साथ कौन कौन आया था, अब किसने पानी और किसने हवा बहाई-उड़ाई थी, इसकी जानकारी तो फिंगर डिटेक्‍टर को भी नहीं रही होगी। इन सार्वजनिक उपक्रमों में प्‍योर पानी ही एकत्र हो जाए, वो क्‍या कम है, दूध की छोड़ो, वैसे भी रोजाना ही महंगा हो रहा है। पानी की कीमतों पर ही सही, महंगाई रुकी तो हुई है। अब किसी ने भैंस थोड़े ही बांध रखी है। हम तो पब्लिक में से हैं, रात के अंधेरे में हवा-पानी ही डालेंगे। इतना क्‍या कम है कि लोटा भर के वापिस तो नहीं ला रहे हैं, नहीं तो हमें रात में ही मालूम चल जाता कि उसमें सब पानी ही उलीच गए हैं लोटे भर भर के।
अगर दूध का रंग दिखलाई दे, तो सफेद चेहरों के भ्रम में मत आना, दूध की जांच अवश्‍य करवाना, उसमें सिंथेटिक दूध भी हो सकता है। जो दिखने और नाम और स्‍वाद में दूध ही होगा, चैनल चाहे कितनी ही सनसनी फैला रहे हों, वे भी जानबूझकर की गई इस गफलत के झांसे में जरूर उलझ जायेंगे। जबकि उसमें बीमारी का घर ही होगा, सफेद रंग में भी बीमारी रह सकती है। इसे आप श्‍वेत खादी वस्‍त्रधारक नेताओं की मिसाल से अच्‍छे से समझ सकते हैं। यह धन थोड़े ही है कि काला है या सफेद, लाभकारी ही होगा।
अन्‍ना हमारे, यह देश देर से आने और जल्‍दी जाने वालों का है, पर यह उसूल सियासत में नहीं चलता है। आपने इन्‍हें चंद दिनों में ही मां की मम्‍मी की याद करा दी है। फिर भी मुझे विश्‍वास है कि आप कामचोरी और इससे उपजी हरामखोरी में तो मुझे नहीं ढूंढ रहे होंगे और न ढूंढेंगे ही। वो तो वैसे भी अब अधिकार बन चुका है। फिर भी एक बात तो बतलाओ अन्‍ना हमारे, आसमान में कितने हैं तारे, क्‍या आप गिन सकते हैं ?

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

दिमाग की आग में जलकर सब राख

खेलों में भारत रत्न पाने के असली दावेदार सुरेश कलमाड़ी हैं। किसी खेल विशेष में न सही, परंतु कॉमनवेल्थ गेम्स आयोजित करवाने में जितनी भ्रष्टता उन्होंने बरती है, उसे एक विश्व कीर्तिमान स्वीकारा गया है। निःसंदेह बिना दावा सबमिट किए असली भारतीय खेल रतन के दावेदार वे ही बनते हैं। अगर यह रत्न अगले पांच वर्षों तक लगातार उन्हें ही दिया जाता रहे, तो भी कम ही है। खेल में खेलकर तो कोई भी रत्न हथिया सकता है, लेकिन बिना खेले सिर्फ आयोजन से जुड़कर रत्न हथियाना, कोई गिल्ली डंडा खेलना नहीं है। खेलों की व्यवस्था के आयोजनपूर्व व्यवस्थाओं में ही खूब सारे घपले- घोटालों का जो कीर्तिमान भोलू कलमाड़ी ने बनाया है, उसका दूर दूर तक कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं दिखलाई देता है। सब इन्हीं का ही बूता है कि घपले भी छोटे छोटे नहीं, विशालकाय और मोटे मोटे। कई हजार और उसमें जुड़े हैं करोड़ भी। इन्हें भोलू क्यों कहा गया है, इस बारे में आपको आगे खुद ही मालूम चल जाएगा।
कलमाड़ी स्मृतिदोष की चपेट में आ गए हैं, इसका यह मतलब मत लगाएं कि उन्हें किसी ने चपेट मारी होगा जिससे वे सब भूल गए होंगे। असल में उनके दिमाग में आग लग गई है और दिमाग की आग को बुझाने के लिए अभी तक फायर ब्रिगेड रूपी किसी यंत्र की खोज नहीं हो पाई है। नारको टेस्ट तो एकमात्र छलावा है। जिस प्रकार महत्वपूर्ण दस्तावेज कार्यालयों की आग की भेंट चढ़ा दिए जाते हैं। इन्होंने अपने दिमाग की याददाश्त को आग की भेंट चढ़ा दिया है और इसी वजह से उनका भूलना उन्हें भोलू कहकर पुकारे जाने के लिए पर्याप्त है। कलमाड़ी की याददाश्त वापिस लाने के लिए जरूरत है डॉक्टरों, ओझाओं, तांत्रिकों, झोलाछाप डॉक्टरी ठगों और मुन्नाभाई स्टाइल के चिकित्सकों की क्योंकि एक ठग ही दूसरे ठग की यादों को सुरक्षित तौर पर लौटा कर वापिस ला सकता है। मुझे तो यह महसूस हो रहा है कि कलमाड़ी ने खुद ही छिपा दी होगी अपनी याददाश्त और शोर मचा दिया कि गुम हो गई है। अब उन्होंने घोषित कर दिया है कि उनके दिल में कुछ-कुछ हो रहा है। दरअसल उनका दिल भी उन्हीं की भाषा बोल रहा है। जहां फायदा मिल रहा है, वहां पर तो उनकी यादें ताजा हैं। घाटे का सौदा महसूस होने पर भूलने का अहसास कुलांचे भरने लगता है। मानो, उसमें झांसी की रानी के चेतक की आत्मा समाई हुई हो। नहीं तो वो भला इतने भोले थोड़े ही है, वे दिमाग के तेज काले घोड़े हैं, उन्होंने इसी कालेपन के पीछे सब कुछ छिपा रखा है। उनकी शिवशक्ति इसी भाले और भोलेपन के कारण बरकरार है।
वैसे भी अपनी याददाश्त को भोलू ने छुट्टा तो छोड़ा नहीं होगा जो वो रास्ता भूल भटक गई। उसके साथ जरूर किसी को भेजा जाना चाहिए था, तिहाड़ में वैसे भी बहुत सारी चीजें होती तो हैं, पर वे नजर नहीं आती हैं। इनमें मोबाइल फोन, सिम कार्ड, चाकू, ब्लेड इत्यादि जब-तब साधारण कैदियों के पास मिल जाते है, तब इनकी बुद्धि (याद) का गुम होना, हैरत में डालता है। जब कलमाड़ी को जेल में बंद किया गया था, तब उसकी याददाश्त को भी तो जेल में बंद किया गया होगा, फिर कहां पर लापरवाही हुई कि जो जरूरी चीज थी, वही गुम हो गई। कलमाड़ी खो गया होता तो इतना हल्ला नहीं मचता। सब ढूंढ तलाश कर चुप हो जाते। भारतीय जेलों में तो अक्सर कैदी बहुत आसानी से खो जाते हैं।
अब यह देखना चाहिए कि जिसकी लापरवाही है, उस पर जुर्माना लगाया जाना चाहिए, उसे बर्खास्त कर देना चाहिए, जेल में डाल देना चाहिए या उसे कह देना चाहिए कि कलमाड़ी जी की याददाश्त को तिहाड़ में से तलाशना, अब तुम्हारी जिम्मेदारी है। चाहे कंप्यूटर में फाइंड लिखकर उसे तकनीक के सहारे तलाशो, पर उसकी यादों को ढूंढकर ले आओ। तुम्हें एक्स्ट्रा इंक्रीमेंट भी देंगे और ईनाम से भी नवाजेंगे। और इससे भी हल न निकले तो एक जांच आयोग का गठन भी किया जा सकता है। भोलू को कैद करने से पहले एक बड़ा सा महाभारत स्टाइल का याददाश्त का प्रदर्शन रिकार्ड करवा लेना चाहिए था और वो इस वक्त और जरूरत के मौसम में बहुत मुफीद रहता। अब सोचना यह है कि इस गाड़ी में कौन सा गियर डाला जाए, जिससे भोलू कलमाड़ी की याददाश्त रिवर्स आए ?

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

शीला के शब्‍दों की जवानी

दिल्ली की सीएम को टारगेट करके दिल्ली के लोकायुक् ने आरोपों की बौछार कर दी है लेकिन उन्होंने बुरा मानते हुए जो सहज बयानी की है वो कितनी सरल है कि उन पर आरोप लगाए जा रहे हैं और वे हंसी-खुशी बिना बुरा माने जवाब दे रही हैं।

आप भी इसका भरपूर जायजा लीजिए। उनकी सोच है कि अगर आरोप लगाने वाले का कर्म आरोप लगाना है तो उनका धर्म लगाए गए आरोपों का उचित जवाब देना है। सकारात्मक सोच की धनी सीएम पर लगाए गए आरोप तो आप अब तक अखबारों में पढ़ ही चुके हैं, उसी संदर्भ में उनकी प्रतिक्रिया पेश है। उनका कहना है कि राजीव रत् योजना के मकान तैयार हैं, फिर मकान खुद तो चलकर रहने वाले गरीब लोगों तक जाने से रहे।

उसमें रहने वालों को खुद चलकर, अपना सामान ढोकर वहां रहने के लिए आना होगा। वैसे हमने गरीबों को अगर मकान बनाकर नहीं दिए तो उन्हें फुटपाथ पर सोने से भी तो मना नहीं किया है, जहां पर उन्हें सोने दिया जा रहा है, उसकी कीमत अगर सोने से भी मापी जाए तो कई किलो में बनेगी, गरीबों की तो भली चलाई, यह सुविधा भिखारियों को भी उपलब् है, इस अधिकार पर दिल्ली की पुलिस भी अमूमन उन्हें तंग नहीं करती है।

जहां तक सपने दिखाने की बात है, वे पूछती है कि गरीबों को सस्ते घर के रस्ते का सपना दिखाना कब से अपराध की श्रेणी में गया है। अब क्या सपने देखने-दिखाने पर भी फांसी दी जाएगी और इसे भी लोकायुक् के अधिकारों के दायरे में लाया जाएगा।

वे आगे बतला रही हैं कि जहां तक विभिन् सभाओं और मीडिया के जरिए सब्जबाग दिखलाने का मामला है, तो यह बिल्कुल झूठ है। पब्लिक ने जरूर सब्जीमंडी में या सब्जी बेचने वालों के पास सब्जियां देख ली होंगी। यह भी हो सकता है कि टीवी पर देख ली हों और वे उन्हें देखकर बाग बाग हो रहे होंगे। इसलिए इन्हें सब्जबाग समझ रहे हैं।

मैंने बाग दिखलाए हैं और सब्जियां, इसलिए यह आरोप तो तथ् से कम से कम 50 किलोमीटर तो दूर ही है। अगर आपको यह पास लग रहा है तो इसमें टीवी का ही दोष है। इसमें मैं दोषी कैसे हुई जबकि दिल्ली सरकार का कोई चैनल ही नहीं है।

लोगों को गुमराह करने की बात पर उनका कहना है कि भला कोई किसी सड़क या रास्ते को गुम कर सकता है। राहों को उठाकर कहीं और छिपा दिया जाए या उन्हें अंगूठी पहनाकर फिल् वाली मिस्टर इंडिया बना दिया जाए। यह जरूर हो सकता है कि जब खूब बरसात हो रही हो तो सड़कें पानी में नहा रही होंगी और लोग सोच रहे होंगे कि सड़कें गुम हो गई हैं या बारिश से बचने के लिए कहीं छिप गई हैं, जबकि वे डूब डूब कर स्नान कर रही होती हैं।

क्या टब स्नान का मजा सिर्फ इंसान को ही लेने का हक है, सड़कें पानी में गोते मार मार कर नहाने का आनंद क्यों नहीं ले सकतीं। वैसे इस मामले में राजनीति हावी है। जिसके चलते कभी भ्रष्टाचार, कभी खेलों में भ्रष्टाचार, कभी काले धन का भ्रष्टाचार, कभी बम फोड़ने में भ्रष्टाचार और अब तो हद हो गई कि मैंने चुनावों में जो वायदे किए उनको भी भ्रष्टाचार बतलाया जा रहा है।

आजकल आम का मौसम है। कच्चा आम बहुतायत में बाजार में मिल रहा है। इस समय यह तो कर नहीं रहे कि दस-पचास किलो कच्चा आम खरीद कर उसका अचार बना लें। सिर्फ भ्रष्टाचार का ही शोर मचा रहे हैं। इस तरह के शोर से पेट नहीं भरा करते। आम का अचार, आम पब्लिक अगर बना ले तो महंगी सब्जियां खरीदने से राहत मिलेगी। अब इसमें कोई यह सोचे कि मेरे आम के बाग हैं, इसलिए मैं आम का अचार बनाने के लिए कह रही हूं तो सोचते रहें, अचार नहीं बनायेंगे तो फिर मौका नहीं मिलेगा और पछतायेंगे। फिर अचार महंगा खरीद कर खाएंगे और मुझे ही दोषी ठहरायेंगे।

देश मुंबई बम कांड के दोषियों की तलाश में लगा है, और ये मेरी कथनी में नुक् निकालने में बिजी हो रहे हैं। इन्हें अब याद आई है। याद आई और एक दम से हमला बोल दिया है। पहले क्या ये होमवर्क कर रहे थे। अगर ये समय से आपत्ति करते तो मैं भी समय से बतला ही देती। जैसे अब बतला रही हूं तो दोष तो इनका ही हुआ श्रीमन्।

लोकायुक् को अन्ना और रामदेव ने थोड़ी सी अहमियत क्या दे दी, वो तो खुद को खुदा समझने लग गए हैं। हर कोई मुंह उठाए वहीं पहुंच रहा है, जबकि आज के माहौल में खुदा भी खुद को खुदा समझने-मानने से परहेज करता है क्योंकि खुदाई का शब् ध्यान में आते ही सड़कों की खुदाई याद आने लगती है। इसे लोगों को याद करानाउनके पीले जख्मों को हरा करना और टाइट जख्मों को पिलपिला करना है, जिससे उसमें मवाद का अहसास होता रहे और जहां मवाद होगा, वहां दर्द तो होगा ही पर यह दर्द कड़वा तीखा नहीं, मीठा मीठा ही है, शहद नहीं तो क्या हुआ, नमकीन भी तो नहीं है।

फिर क्यों लोकायुक् चिंतित हो रहे हैं ?

सोमवार, 1 अगस्त 2011

आधुनिक बोधकथाएं - ६. प्रिय कविता ।



सौजन्य-गूगल।

एक बड़े ही स्मार्ट और हेन्डसम युवा कवि के साक्षात्कार का, एक  कार्यक्रम , टी.वी. पर, भरी दोपहर में, प्रसारित हो रहा था । 

इस कार्यक्रम को, एक  हॉटेल  में  किटी  पार्टी  मना  रही, कुछ  आधुनिक-मुक्त विचारोंवाली महिलाएं, बड़े चाव से  निहार रही थीं । 

टी.वी. एन्कर-"सर, आप कविता कब से लिख रहे हैं?"

युवा कवि-" जब मैं, कॉलेज में अभ्यास करता था तब से..!!"

टी.वी. एन्कर-" सर, आपको कौन सी कविता सब से अधिक प्रिय है?"

युवा कवि-" देखिए, वैसे तो मुझे मेरी सारी कविता प्रिय है,पर मेरी `चाहत` नाम की, एक कविता मुझे आज भी सब से अधिक प्रिय है ।"

टी.वी. एन्कर-"सर, आपकी कोई ताज़ा कविता का नाम आप दर्शको को बताएंगे?"

अब, टी.वी. एन्कर के इस सवाल, जवाब वह युवा कवि देता,इस से पहले ही, किटी पार्टी में जमा हुई, कुछ महिलाओं में से एक ने कहा," यह युवा कवि, कॉलेज के आख़री साल मेरे साथ ही पढ़ता था और उसकी यही प्रिय कविता, मेरे यहाँ छप कर,आज चार साल की हो गई है, हमारी उस बच्ची का नाम भी `चाहत` है..!!"


यह सुनकर दुसरी महिला बोली," यह कवि, ढाई साल से  मेरे साथ नौकरी कर रहा है और उसकी `चाहत` नाम की, ऐसी ही एक और प्रिय  कविता मेरे यहाँ छप कर, अभी  दो  साल की हो गई है..!!"

बस, इतना सुनने भर की देरी थी और तीसरी एक महिला गुस्सा हो कर बोली," क्या बात करती हैं आप दोनों? ये  सा...ला..कवि..!! इतना बदमाश है? चार माह के पश्चात  उसकी एक और कविता मैं  भी प्रकाशित करनेवाली हूँ, जिसका नाम भी उसने अभी से `चाहत` रखा है..!!"

यह  सुनकर  वे  दोनों  महिलाएं  चीख  उठी,"क्या कह रही हो तुम?"

आख़री महिला ने बड़े मायूस स्वर में कहा," इस ठग के साथ,पिछले साल ही, मेरी शादी हुई है..अब मेरा क्या होगा..!!"

उन दो महिलाओं ने,उदास महिला को, ढाढ़स बंधाते हुए कहा," अब कविराज, तुम्हारे यहाँ पूरा कविता संग्रह प्रकाशित करेंगे..और क्या..!!"  


आधुनिक बोध- किसी भी कवि राज से, विवाह रचाने के पूर्व, उन्होंने अपनी प्रिय कविताओं को, कई जगहों पर छापा तो नहीं है ना? ये बात अवश्य चेक कर लेना चाहिए..!!
मार्कंड दवे । दिनांक-०१-०८-२०११.

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

सावन के हिंडोले में बयानबम

कांग्रेस महासचिव के बयानों को सुनकर कांग्रेस के दिग्‍गज हैरान-परेशान नहीं हैं बल्कि वे सोच रहे हैं कि इसका कैसे पार्टी के हित में बेहतर इस्‍तेमाल किया जा सकता है। इस बारे में फैसला करने के लिए गुप्‍त बैठकें, सुप्‍त समय में की जा रही हैं। इन महाशय की ख्‍याति आजकल बयानबम के तौर पर हो गई है। बम जो दूसरों के फोड़ने पर फटता है, खुद से तो खुद का फोड़ा नहीं फोड़ा जाता है, उसके लिए भी डॉक्‍टर की बाट जोहते हैं। दर्द जानबूझकर कोई नहीं सींचता है, क्‍योंकि इससे दर्द की आहों में भी दर्द की अभिव्‍यक्ति होने लगती है। दर्द तब तक ही अच्‍छा लगता है जब तक दूसरे के हो रहा हो। बम भी तब तक ही भाता है, जब तक फूटता नहीं है या फूटता भी है तो उससे नुकसान सामने वाले को होता है। पर वो सामने वाला ही होना चाहिए, सामने वाली नहीं। सामने वाली के प्रति तो सबके मन में विनम्र भाव ही रहता है। विनम्र भाव तो पड़ोस वाली के साथ भी पूरा रहता है।
बयानबम की खासियत है कि धमाका भी हो जाता है, सुर्खियां भी मिल जाती हैं, फोटू भी छप जाती है, निंदा भी होती है, इस निंदा से बहुतेरों की तो निद्रा खुल जाती है। कई बार निद्रा आती ही नहीं है। बयान को बम बनाने वालों और निद्रा का तो सदा से बैर रहा है। निद्रा आ गई तो बयान का बम नहीं बनेगा या बनेगा भी देर से बनेगा। यहां पर देर आयद दुरुस्‍त आयद का सिद्धांत लाभकारी नहीं होता है। यहां पर तो समय से पहले या बिल्‍कुल समय पर ब्‍यान का फटना जरूरी है। उसके लिए बम बनने के उपयुक्‍त पात्र की तलाश करनी होती है। कौन बयान का बकरा बनेगा, जो शहीद होने को तैयार हो। यहां पर तो अनेक तैयार हो जाते हैं।
बयानबम जारी करने से पहले थोड़ी सी सुरक्षा ही तो कड़ी करनी होती है, या खुद ही हाथापाई के लिए तैयार रहो।  वो खर्च सरकार का और चर्चा का लाभ पार्टी को। बाबा भी बयानबम बनने से बच नहीं पाए हैं। इसका लाभ बाबा को मिलता है या बाबा के प्रशंसकों को, इस बारे में अभी नतीजे सामने नहीं आए हैं। बयानबम से खुद की तो फजीहत होती ही है। ब्‍यान क्‍योंकि बम है, उस बम को उगलना पड़ता है। दिमाग का इसमें इस्‍तेमाल वर्जित बतलाया गया है। वैसे इस पर बददिमाग या बेदिमाग वालों का कब्‍जा रहता है। इसका फायदा उठाने के लिए बेसिर, पैर की कल्‍पनाएं करनी होती हैं, अपनी बुद्धि को इस मुगालते में रखना पड़ता है कि मान लो आज होली है और भी अधिक लाभ लेने के लिए आज मूर्ख दिवस है और मुझे मूर्ख दिवस पर सर्वाधिक मूर्खता प्रदर्शित करनी है।
पहले बयानबम के बहुत फायदे हुआ करते थे, बम फोड़ा और मुकर गए। परंतु आजकल सीसीटीवी, कैमरे, लाइव प्रसारण के कारण कहे से मुकरना पॉसीबल नहीं होता है। पहले ऐसे जोखिम नहीं थे, तब कह दिया जाता था कि मैंने तो ऐसा नहीं कहा था। अब कहते हैं कि मेरा ऐसा करने का आशय वो नहीं है, जो आप समझ रहे हैं। मतलब आप नासमझ हैं, लेकिन यह तो बिना कहे ही समझ में आ जाता है।
नेता थोड़ा और बेशर्म हो जाए तो कुछ भी सफाई देने की जरूरत नहीं है। पार्टी खुद ही भुगतती रहेगी। करे कोई और भरे कोई और उसमें डूबकर मरे कोई तीसरा।  मतलब कत्‍ल करे राम लाल, फांसी पाए श्‍याम लाल और दौड़ लगाए लोकपाल।  आजकल फांसी का तो मौसम ही नहीं है। कसाब का किस्‍सा सब जानते हैं। सभी इलीजिबिलिटी के होते हुए भी उसे फांसी नहीं, जो जिसको मिलना चाहिए, वो उसको नहीं देंगे। उसके बदले उसे घनघोर सुरक्षा और प्रदान कर देंगे। इसे ही गंदी राजनीति या राजनीति को खेल बनाना कहा गया है। यह कानूनों का मजाक बनाना भी है।
सावन आया है और दिग्‍गी झूल रहे हैं अपने बयानों के झूले में। अब झूले बयान ही हैं। बयान दे दिया है, सावन है झूलते रहिए। जीभ का रंग काला है, इसका विवेचन करते रहिए, इसलिए तो ब्‍लैक झंडे, संडे को दिखलाए गए, सियासत की रोटियां खूब सेकी जा रही हैं जिससे वे भी जलकर काली हो जाएं।

सोमवार, 4 जुलाई 2011

आधुनिक बोधकथाएँ-६. दिलचस्प साक्षात्कार ।


आधुनिक बोधकथाएँ-६.  
दिलचस्प साक्षात्कार ।
सौजन्य-गूगल।


(म्यूज़िक- ढें..टें..ने..ण..!!)

आर.जे.(रॅडियो जॉकी।),"  प्यारे दोस्तों, आज हमारे बीच उपस्थित है, `पुरुष-प्रधान विवाह-विचारधारा` के कट्टर विरोधी, आजीवन कुँवारी, अखिल भारतीय विवाह विरोधी संगठन की एकमात्र ऍक्टिविस्ट बहन सुश्री......!!...........,बहन जी, हमारे, `४२० F.M. रेडियो स्टेशन` पर आपका दिल से स्वागत है ।"

बहन, " धन्यवाद ।"

R.J.-" अच्छा आप पहले ये बताइए कि,आप के `विवाह विरोधी संगठन` में, आज की डेट में, कितने सदस्य है?"

बहन,(ऊँगलियां गिनते हुए..!!),"ट्रेड सिक्रेट, नो कमेन्ट्स..!!"

R.J.-" दूसरा सवाल, आपकी  पति-विरोधी नज़र से, किसी विवाहित नारी के जीवन में,अपने पति की क्या क़ीमत होनी चाहिए?"

बहन," ZERO-शून्य-कुछ भी नहीं..!! सारे पति देव उल्लु जैसे ही बुद्धिहीन होते हैं, इसीलिए तो मैं, हरेक नारी को शादी करने से पहले सौ बार सोचने की सलाह देती हूँ । नारी मुक्ति ज़ि..दा..बा..द..!!"

R.J. (चिढ़ते हुए )-" क्यों..!! आप किस आधार पर,  `उल्लु` का उप-नाम देकर, सारे पुरूष पर  इतना बड़ा इल्ज़ाम लगा रही है?"

बहन," सीधी सी बात है..!! पूरा दिन पत्नी की दुनियाभर की बुराईयाँ करने वाले पति देव को, रात ढलते ही, घने अंधेरे में भी, अपनी पत्नी में,`उल्लु की भाँति`, दुनियाभर के सद्गुण, नज़र आने लगते हैं?"

R.J.-" पर बहन जी, पत्नी पर भी, ऐसे आरोप लगते ही हैं कि,पति बेचारा पूरा दिन मेहनत करके रुपया कमाता है और पत्नी, शॉपिंग के बहाने, शॉपिंग-मोल में जाकर, उसे  फ़िजूल-खर्च कर देती है?"

बहन," फ़िजूल चीज़ो का शॉपिंग करना, सभी पत्नीओं का जन्मसिद्ध अधिकार है, उस पर कोई पाबंदी नहीं लगा सकता..!!"

R.J.-"ठीक है, अगला प्रश्न । विवाह-विरोधी संगठन गठित करने की प्रेरणा,आप को  कहाँ से मिली?"

बहन," मेरे घर में, मेरी माता जी से..!!"

R.J.-" आप की माता जी, शादीशुदा थीं?

बहन,(गुस्सा होकर)" कौन से शास्त्र में लिखा है, एक स्त्री ग़लती करें तो, दूसरी स्त्री को भी, उस ग़लती को दोहराना चाहिए?" 

R.J.-" समझ गया..!! अच्छा बहन, आप के किसी प्रशंसक पुरूष का कॉल है, क्या आप उनके प्रश्न का जवाब देना चाहेंगी? महाशय, ज़रा आपका नाम और प्रश्न बतायेंगे?"

कॉलर पुरूष," मेरा नाम.....है । मैं आपका एक्स प्रेमी हूँ और आज भी आपसे बहुत प्रेम करता हूँ, मुझे पहचाना? मैं,....करोड़पति श्री....., का इकलौता बेटा? आपके साथ कॉलेज में? बहुत साल पहले ? मैंने आपको, एक प्रेम पत्र भेजा था..!! मैंने अभी तक शादी नहीं की..!! क्या  आप मुझ से लीव-इन-रिलेशनशिप बनाएगी?"

बहन," अ...बे, सा..आ..ल्ले..!! इतने साल,  मुझे छोड़ कर, कहाँ ग़ायब हो गया था?  मैं तुमसे, अभी और इसी वक़्त मिलना चाहती हूँ..!! इस वक़्त तुम कहाँ हो?"

कॉलर," डार्लिंग,मैं इस वक़्त, तेरा रेडियो प्रोग्राम ख़त्म होने की प्रतीक्षा में, रेडियो स्टेशन के बाहर ही खड़ा  हूँ..!!"

बहन," य..स, य..स, स्टे धेर, आय एम जस्ट कमिंग..!! मैं तुम से अभी, इसी वक़्त, शादी करना चाहती हूँ..!!"

R.J.-(हैरानगी जताते हुए)" पर, बहन जी, अपने आज के इस रोचक साक्षात्कार का क्या होगा? और फिर आप के विवाह विरोधी आंदोलन का क्या होगा? आप के उकसाने पर, आप के संगठन से जुड़ी हुई, बाकी महिला सदस्यों का भविष्य क्या होगा?"

बहन," नॉ कमेन्ट्स..!! ये ले तेरा माइक..!! मैं तो चली, मेरे डार्लिंग के पास..!! बा..य,बा..य?"

आधुनिक बोध-   अपने किसी निर्णय पर, बहने, सदा अटल रहती है, ऐसा मानने की भूल, किसी पुरूष को हरगिज़ नहीं करनी चाहिए..!!



मार्कण्ड दवे । दिनांक-०४-०७-२०११.

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

पावली की पदोन्नति । Part- 2.


पावली की पदोन्नति । 
Part- 2.
सौजन्य-गूगल ।

प्यारे दोस्तों, पार्ट-१ में आपने पढ़ा था..!!

" अ..हा..हा..हा..!! सन-१९६० में, एक दिन रास्ते पर किसी की खोई हुए, एक चवन्नी मुझे अनायास मिल गई और सभी घरवालों से छिपा कर, उस चवन्नी से, मैंने चार दिन तक, जो जल्से किए थे..!! अ..हा..हा..हा..!! आज भी उसे, याद कर के मेरा दिल गदगद हो उठता है..!!"

अब आगे पार्ट-२..!!

सन-१९६० की साल में, हमारे गाँव में, हमारी जाति के व्यापारी के अलावा, किसी दूसरे की दुकान से तैयार खाद्य सामग्री मँगवाना, हमारे परिवार में वर्ज्य था । इसे आप उस ज़माने की रूढिचूस्तता भी मान सकते हैं । 

ऐसे में , चार दिनों तक रास्ते से, मुफ़्त में मिली हुई, चवन्नी का छूटा करा कर चार दिन तक, एक-एक, दो-दो  पैसा खर्च करके, उस ज़माने के,`जंगली-हूण-अनार्य` लोगों की ख़ूराक माने गये खाद्य पदार्थ, जैसे कि, पाँव भाजी वाले  मीठे पाँव-बिस्किट-नानखटाई-चॉकलेट-जिनतान कंपनी की छोटी-छोटी मीठी  गोली  इत्यादि, ज़िंदगी में पहली बार चूपके से, बड़े ही चाव से चखे थे । 

मैं अगर सच कहूँ तो, उन चीज़ों का स्वाद, मेरे  दिल में कुछ इस हद तक,  घर कर गया है कि, स्वाद आज भी  वैसा  का  वैसा ही है..!! ठीक है, अपने खुद की मेहनत के कमाये रूपये से, ये सभी चीज़ें आज कल खा-पी रहे हैं, पर वह फूकट की चवन्नी जैसा स्वाद अब उनमें  कहाँ..!!

मेरा एक दोस्त, स्वर्ण कार का लड़का भी था । उसके पिता को मैं अक्सर पागल मानता था क्योंकि, इतनी मूल्यवान चवन्नीयों को, किसी धातु की पट्टी पर टांका लगाकर, लड़कियों के  सिर के बाल बाँधने के लिए वह बक्कल बनाते थे..!! 

शायद उनको पता न था कि, इतनी चवन्नीयों में, कितने सारे मीठे पाँव-बिस्किट-नानखटाई-चॉकलेट-जिनतान कंपनी की छोटी-छोटी मीठी  गोली  इत्यादि, खरीदे जा सकते थे?

हमें पाठशाला में, प्रारंभिक कक्षा की किताबों में पढ़ाया गया है कि, " किसान जगत का तात कहलाता है ।" पर, इस निकम्मी सरकार ने, सभी के परम पूज्य पिता  श्री किसान जी को पूछे बिना ही, चवन्नी रद्द कर दी? अब किसान उनके खेत में, `चार आना या सोलह आना`, कितने आना फ़सल पैदा हुई, ये कैसे बता पायेंगे?

चवन्नी रद्द होने से,एक और कठिनाई पैदा हुई है?समाज में जिन लोगों का, शारीरिक हिलना-डुलना शंकास्पद है, (गॅ टाइप?) उनके कई  उप-नामों  में  से,  एक  लोकप्रिय उप-नाम `चवन्नी छाप`को, उनकी सहमति लिए बिना, सूची से कम  कर देना, शर्मा जी के मत अनुसार ठीक बात नहीं है? 

हालाँकि, उस  वक़्त उम्र में, मैं  बिलकुल छोटा होने के कारण,` पावली छाप` उप-नाम का भावार्थ मेरी समझ से परे था..!! पर, एक दिन ऐसा वाक़या हुआ कि, मेरी समझ में कुछ-कुछ भावार्थ, अपने आप आ गया । 

हुआ यूँ  कि, हमारी गली में, खाते-पीते घर का, पहलवान टाइप का, करीब पंद्रह साल का, एक  लड़का, उसके  कुछ दोस्तों के साथ, गली  में  क्रिकेट खेल रहा था । उसने  हमें  डरा  कर, वहाँ से  भगाने  के  लिए, हमारी नन्ही वानर सेना में से, एक बच्चे को, धक्का दे कर ज़मीन पर गिरा दिया । 

पता नहीं, हमारी वानर सेना में, कैसे और कहाँ से, एकाएक  इतनी  ताक़त आ गई कि, सभी बच्चों ने मिलकर, उस पहलवान लड़के की टाँग खींच कर, उसे भी ज़मीन पर गिरा दिया और सब ने मिल कर उसे थोड़ा पिटा भी..!!

वैसे, उस लड़के की, ये पिटाई कांड के बाद, सभी बच्चों को डर लगा, अब ज़मीन से उठ कर, कहीं ये पहलवान, हम सब बच्चों की धुलाई शुरू न कर दें..!! 

पर हमारे आश्चर्य के बीच, हम से कई गुना बलवान, वो पहलवान ज़मीन पर लेटे-लेटे, रोते-रोते, उसकी मम्मी को, ज़ोर से आवाज़ दे कर सहायता के लिए बुलाने लगा..!! 

उस दिन से इस पहलवान को पछाड़ने का, गौरव महसूस करते हुए, सारे बच्चे, उस पहलवान को, `पावली-पावली` कहकर बुलाने लगे और मेरी समझ में कुछ-कुछ आ गया कि,जो बिना वजह किसी से भीड़ जाते हैं और फिर किसी के धक्का देने पर, ज़मीन पर गिर कर, रोते-बिलखते,सहायता के लिए अपनी मम्मी को बुलाते हैं, वे सब `पावली छाप` कहलाते होंगे?

मेरी समझ में यह भी आ गया कि, अपने दुश्मन को निर्बल समझ कर, अपनी क्षमता पर अति आत्मविश्वास जता कर जो लोग, बिना सोचे-समझे, किसी से भीड़ जाते हैं, वे सारे ज़मीन पर औंधे मुँह गिरते हैं और उन्हें अपनी, मम्मी-पापा-नानी याद आ जाते हैं..!! 

उस दिन के बाद, मैं तो कभी, किसी से आजतक भीड़ा नहीं  हूँ..!! 

पर हाँ, बिना सोचे-समझे, बाबा रामदेवजी सरकार से भीड़ गये? 

हाँ, भीड़ गये..!! 

बाबा जी के समर्थकों को आधी रात में खदेड़ने के कारण, सरकार  जनता से भीड़ गई?

 हाँ, बूरी तरह भीड़ गई..!!

अब, सोलह अगस्त से, जंतर-मंतर पर,आमरण अनशन पर  बैठ कर श्रीअण्णा हज़ारे जी, सरकार से भीड़ने वाले हैं? 

शायद..हाँ..,अब आगे-आगे देखिए होता है क्या? 

वैसे, हमारे शर्मा जी आज आध्यात्मिक प्रति भाव देने के मूड में है और मुझे अभी-अभी समझा रहे हैं कि," इन सारी बातों पर, आप क्यों व्यर्थ में, अपना खून जला रहे हैं, जो भीड़ता है, उन्हें भीड़ने दो ना? 

ये सब पहले से तय होता है । हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियाँ है, जिनकी डोर उपर वाले के हाथ में हैं..!! 

और रही चवन्नी रद्द होने का मातम मनाने की? 

तो ये समझो कि, जिस प्रकार, हम अलग-अलग शरीर रूप धारण करते हैं मगर, सभी प्राणी में आत्मा एक ही है, उसी प्रकार, सिक्के का नाम, चवन्नी हो, अठन्नी हो या रुपया हो, क्या फर्क पड़ता है..!! उन सभी सिक्कों में  धातु  तो  एक जैसी  ही  है  ना? और फिर कोई इस दुनिया से चला जाता है, पर वह, अपने अच्छे-बूरे कर्मों से, हमेशा सब के दिल में बसा रहता है कि नहीं..!!

सच तो ये है कि,पावली कभी मरती नही, पावली मर सकती ही नहीं, बहुत जल्द ही, दूसरा रूप धारण करके, पावली हमारे दिल में...सॉरी जेब में, एक ना एक दिन जरूर वापस आएगी..उसके जाने का मातम मनाना, अच्छी बात नहीं है..!!"

वाह, शर्मा जी,वा..ह..!! 

या...र...!! शर्मा जी की बात तो पते की है..!! है कि नहीं? आपको क्या लगता है? 

ताज़ा नोट- अभी-अभी मुझे पता चला है कि, इतना फ़ालतू आलेख लिखते-लिखते, मेरे दिमाग से मेरी, एक चवन्नी कहीं खो गई है, आप उसे ढूंढने में सहायता करेंगे, प्ली..ज़..!! धन्यवाद ।

 इति श्री भरत खंडे, पावली पुराण,अंतिम अध्याय संपूर्णम् ॥ 

सब मिल, बोलो जय श्री,`जय-जय पावली परमात्मन्..!! जय-जय हिन्दुस्तान..!! मेरा भारत महान?`


मार्क्ण्ड दवे । दिनांक-०१-०७-२०११.