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हास्य जीवन का अनमोल तोहफा    ====> हास्य जीवन का प्रभात है, शीतकाल की मधुर धूप है तो ग्रीष्म की तपती दुपहरी में सघन छाया। इससे आप तो आनंद पाते ही हैं दूसरों को भी आनंदित करते हैं।

हँसे और बीमारी दूर भगाये====>आज के इस तनावपूर्ण वातावरण में व्यक्ति अपनी मुस्कुराहट को भूलता जा रहा है और उच्च रक्तचाप, शुगर, माइग्रेन, हिस्टीरिया, पागलपन, डिप्रेशन आदि बहुत सी बीमारियों को निमंत्रण दे रहा है।

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शनिवार, 25 जून 2011

साडे पंजाब दीयां केडियां रीसां


एक था मिलखासिंह। वह पंजाब का रहने वाला था। उसका एक मित्र कश्मीर की वादी में रहता था। मित्र का नाम था आफताब। एक बार मिलखासिंह को आफताब के यहां जाने का मौका मिला। दोनों मित्र लपककर एक-दूसरे के गले से लग गए। आफताब ने रसोईघर में जाकर स्वादिष्ट पकवान तैयार करने को कहा और मिलखासिंह के पास बैठ गया।

कुछ ही देर में खाने की बुलाहट हुई। मिलखासिंह ने भरपेट भोजन किया। आफताब ने पूछा, ‘यार, खाना कैसा लगा?’ मिलखा बोला, ‘खाना तो अच्छा था पर ‘साडे पंजाब दीयां केडियां रीसां (हमारे पंजाब का मुकाबला नहीं कर सकता)। आफताब को बात लग गई। रात के भोजन की तैयारी जोर-शोर से की जानी लगी। घर में खुशबू की लपटें उठ रही थीं। रात को खाने की मेज पर गुच्छी की सब्जी से लेकर मांस की कई किस्में भी परोसी गईं।

मिलखासिंह ने खा-पीकर डकार ली तो आफताब ने बेसब्री से पूछा-‘खाना कैसा लगा, दोस्त?’‘साडे पंजाब दीयां केडियां रीसां।’ मिलखासिंह ने फिर वही जवाब दिया। आफताब के लिए तो बहुत परेशानी हो गई। वह अपने मित्र के मुंह से कहलवाना चाहता था कि कश्मीरी खाना बहुत लज्जतदार होता है।

वादी के होशियार रसोइए बुलवाए गए। घर में ऐसा हंगामा मच गया मानो किसी बड़ी दावत की तैयारी हो। अगले दिन दोपहर के भोजन में एक-से-एक महंगे और स्वादिष्ट व्यंजन परोसे गए। रोगनजोड़ा, कबाब, करम का साग, केसरिया चावल, खीर आदि पकवानों में से खुशबू की लपटें उठ रही थीं।

कांच के सुंदर प्यालों में कई किस्म के फल रखे गए थे। मिलखासिंह ने भोजन किया और आफताब के पूछने से पहले ही बोला, ‘अरे, ऐसा लगता है, किसी धन्नासेठ की दावत है।’ आफताब के मन को फिर भी तसल्ली न हुई। मिलखासिंह जी पंजाब लौट गए।

कुछ समय बाद आफताब को पंजाब लाने का अवसर मिला। उसने सोचा-‘मिलखासिंह के घर जरूर जाऊंगा। देखूं तो सही, वह क्या खाते हैं?’

मिलखासिंह ने कश्मीरी मित्र का स्वागत किया। थोड़ी ही देर में भोजन का समय हो गया। दोनों मित्र खाना खाने बैठे। मिलखा की पत्नी दो प्लेटों में सरसों का साग और मक्के की रोटी ले आई। दो गिलासों में मलाईदार लस्सी भी थी।

आफताब अन्य व्यंजनों की प्रतीक्षा करने लगा। मिलखासिंह बोला, ‘खाओ भई, खाना ठंडा हो रहा है।’

आफताब ने सोचा कि शायद अगले दिन पंजाब के कुछ खास व्यंजन परोसे जाएंगे। अगले दिन भी वही रोटी और साग परोसे गए। आफताब ने हैरानी से पूछा, ‘मिलखासिंह, तुम तो कहते थे कि ‘पंजाब दीयां केडियां रीसां’। यह तो बिलकुल साधारण भोजन है।’

मिलखासिंह ने हंसकर उत्तर दिया, ‘आफताब भाई, तुम्हारे भोजन के स्वाद में कोई कमी न थी, किंतु वह इतना महंगा था कि आम आदमी की पहुंच से बाहर था।

हम गांववाले सादा भोजन करते हैं, जो कि पौष्टिक भी है और सस्ता भी। यही हमारी सेहत का राज है।’

आफताब जान गया कि मिलखासिंह सही कह रहा था। सादा भोजन ही अच्छे स्वास्थ्य का राज है

मंगलवार, 14 जून 2011

बेटा ! या बाप


डेडी: बेटा, आजकल में देख रहा हूँ कि जब भी में तुम्हारी पिटाई लगाता हूँ तो

तुम कोई प्रतिक्रिया ही नहीं करते, कैसे अपना गुस्सा कंट्रोल करते हो तुम?

बेटा: में तुरंत जाकर टॉयलेट साफ करने लगता हूँ।

डेडी: इससे गुस्सा शांत करने में कैसे मदत मिलती हैं।

बेटा: वो ऐसे कि में, टॉयलेट की सफ़ाई के लिए आपका

टूथ ब्रश इस्तेमाल करता हूँ।

गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

किसकी प्रॉबलम ज्यादा बड़ी है !!

दो व्यक्ति एक बार में बैठे थे .....

एक ने कहा ...." यार.... बहुत फेमिली प्रॉब्लम है

"दूसरा व्यक्ति : तु पहले मेरी सुन.......
मैंने एक विधवा महिला से शादी की
जिसके एक लड़की थी ...
कुछ दिनों बाद पता चला कि

मेरे पिताजी को उस विधवा महिला कि पुत्री से प्यार है ..
और उन्होने इस तरह मेरी ही लड़की से शादी कर ली ..

अब मेरे पिताजी मेरे दामाद बन गए और मेरी बेटी मेरी माँ बन गयी..
और मेरी ही पत्नी मेरी नानी हो गयी !!

ज्यादा प्रॉब्लम तब हुई जब जब मेरे लड़का हुआ
अब मेरा लड़का मेरी माँ का भाई हो गया तो

इस तरह मेरा मामा हो गया . परिस्थिति तो तब ख़राब हुई
जब मेरे पिताजी को लड़का हुआ

मेरे पिताजी का लड़का यानी मेरा भाई मेरा ही नवासा हो गया
और इस तरह मैं स्वयं का ही दादा हो गया
और स्वयं का ही पोता बन गया

और तू कहता है कि तुझे फेमिली प्रॉब्लम है !!

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

लोभ का परिणाम

एक लोभी सेठ था एक दिन उसने सोचा की किसी ब्रामण को भोजन कराकर क्यों न पुन्य कमा लिया जाए . इसके लिए उसने एक दुबले पतले ब्रामण की तलाश करना शुरू कर दिया . वह सेठ एक दुबले पतले ब्रामण के पास पहुंचा और उसे भोजन कराने की इच्छा प्रकट की और उससे पूछा - महाराज आप कितना भोजन लेते हैं .

वह ब्रामण उस सेठ को अच्छी तरह से जानता था उसने सेठ से कहा - मैं तो मात्र सौ ग्राम भोजन करता हूँ . सेठ उसकी बात सुनकर बड़ा प्रसन्न हो गया और ब्रामण से बोला - ठीक है महाराज आप भोजन करने घर पर आ जाना और उस समय मैं घर पर नहीं रहूँगा .

सेठ ने घर पहुंचकर अपनी पत्नी को कहा - मुझे जरुरी काम है मैं कल घर पर नहीं रहूँगा ..एक ब्रामण देवता आएंगे तुम उसे भोजन करा देना . दूसरे दिन ब्रामण भोजन करने सेठ के घर पहुंचा . सेठानी ने बड़ी आवभगत की और आदर के साथ पंडित जी से बोली - महाराज आप क्या लेंगें . मौका ताड़ कर ब्रामण ने कहा - बस जादा नहीं दस मन आटा, चार मन चावल और दस सेर घी, एक मन शक्कर मेरे घर पर भिजवा दो और फिर उस ब्रामण ने सेठजी के यहाँ डट कर भोजन किया और वहां से बिदा ली .

घर आकर वह ब्रामण ओढ़ तानकर सो गया और सोते सोते अपनी पत्नी से बोला - सेठजी जब घर आयें तो तुम उन्हें देखते ही रोने लगना और उनसे कहना की जबसे आपके घर से आयें हैं तो तबसे एकदम से सख्त बीमार पड़ गए हैं और उनके बचने की कोई उम्मीद नहीं है . उधर सेठ अपने घर पहुंचा और सारा वृतांत अपनी पत्नी से सुना तो उसके होश उड़ गए और वह बेहोश हो गया .

होश आने पर वह ब्रामण के घर पहुंचा तो तो उसने ब्रामण को बिस्तर पर पड़े देखा और ब्रामण की पत्नी ने रो रोकर आसमान सर पर उठा लिया और सेठ के सामने छाती ठौंककर चीख पुकार करना शुरू कर दिया तो सेठजी की हालत पतली हो गई .
सेठजी ने धीरे से ब्रामण की पत्नी के हाथों में बीस हजार रुपये पकड़ा दिये और बोले ब्रामण जी का अच्छे से उपचार कराओ पर हाँ यह बात ध्यान में रखना और किसी से न कहना की ब्रामण महोदय ने मेरे यहाँ भोजन किये थे . इस तरह लोभी सेठ लुट पिट कर अपने घर की और रवाना हो गया .

"सच है की अति लोभ का परिणाम अच्छा नहीं होता है ."

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

बिना विचारे जो करे, सो पाछे पछताए !

सेठ घनश्याम दास कपड़े का बहुत बड़ा व्यापारी था। उसने ढेरों दौलत जमा कर रखी थी। उसका व्यापार आस-पास के देशों में भी फैल चुका था। वह कभी-कभी उन देशों की यात्रा भी किया करता था। जब उसका बेटा जवान हो गया तो वह अपने पिता के व्यापार में हाथ बंटाने लगा।

एक बार घनश्याम दास ने अपने बेटे रामदास से कहा—‘‘हमारे पास दूर देश से बहुत बड़ा आर्डर आया है, तुम्हें सामान लेकर वहां जाना होगा।’’ रामदास ने अब तक किसी देश की यात्रा नहीं की थी। वह यह जानकर बहुत खुश हुआ कि उसके अब्बा उसे दूर देश भेज रहे हैं। उसने तुरंत वहां जाने की तैयारी शुरू कर दी।

अगले दिन रामदास सामान लेकर यात्रा के लिए रवाना हो गया। वह होटल में सामान रखकर वहां के बाजार में घूमने निकला। रास्ते में उसने एक निराला फल बिकते देखा। उसने इतना बड़ा फल आज तक नहीं देखा था। वह फल के पास गया और फल को हाथ में उठाकर देखा तो हैरान रह गया कि ऊपर से कांटों वाला यह फल बहुत ही भारी था। रामदास ने पूछा—‘‘भाई, इसे क्या कहते हैं ?’ फल वाला हंसते हुए बोला-‘‘साहब, इसे कटहल कहते हैं।’’

रामदास ने कटहल को सूंघकर देखा तो उसे कटहल की खुशबू अच्छी लगी। वह सोचने लगा कि यदि इस कटहल की खुशबू इतनी अच्छी है तो स्वाद कितना अच्छा होगा ? परंतु मन ही मन रामदास यह सोच रहा था कि इतना बड़ा फल बहुत महंगा होगा। उसने फल वाले से पूछा—‘‘भाई, कटहल कितने का है ?’’ फल वाले ने उत्तर दिया—‘‘दस आने का।’’

रामदास को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। उसे लगा कि शायद उसने गलत सुना है या फल वाले का ध्यान कहीं और है, इस कारण उसने गलती से कटहल का दाम कम बता दिया है। उसने तुरंत जेब से पैसे निकाले और कटहल खरीद लिया। कटहल खरीद कर वह सीधे होटल पहुंचा। छुरी निकाल कर कटहल काट लिया और उसे खाने लगा। उसे कटहल का स्वाद बहुत अच्छा लग रहा था, इस कारण आधे से अधिक कटहल उसने खा लिया।

खाने के पश्चात वह नल पर हाथ धोने गया, परंतु उसके हाथ व मुंह बुरी तरह से चिपक रहे थे, इस कारण साफ नहीं हो सके। हाथ धोने की कोशिश में वे और भी ज्यादा चिपक गए। उसने हाथों को बार-बार साबुन से रगड़ा परंतु वे साफ नहीं हो रहे थे। उसने देखा कि कटहल का रस कपड़ों पर लग गया है। उसने कपड़ों को नैपकिन से साफ करने की कोशिश की, परंतु नैपकिन कपड़ो से चिपक गया।

वह अकेला था इस कारण समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे। वैसे भी रामदास अपने घर से पहली बार अकेला निकला था। इस कारण थोड़ा घबरा रहा था। उसने सोचा कि होटल के मालिक या किसी नौकर से पूँछ लूं कि इसे कैसे साफ किया जाए। रामदास कमरे से बाहर निकल कर ज्यों ही किसी के सामने पड़ा वह व्यक्ति रामदास को देखकर हंसने लगा। रामदास की हिम्मत ही नहीं हुई कि वह किसी से कुछ पूछे।

वह चुपचाप होटल के बाहर निकल गया। बाहर तेज हवा चल रही थी। सड़क के पत्ते उड़-उड़ कर रामदास के कपड़ों पर चिपकने लगे। उसकी मूछों के बाल भी चिपक कर अजीब से लग रहे थे। हवा के साथ धूल-मिट्टी, कागज, पंख आदि उसके कपड़ों व हाथों में चिपकते जा रहे थे। वह जिधर से निकलता, उधर से लोग उसे देखकर हंसने लगते। उसका चेहरा भी धूल से चिपकने से गंदा लगने लगा था।

कुछ लोग उसे पागल समझकर उसके पीछे चलने लगे। रामदास समझ में नहीं आया कि वह क्या करे। वह चुपचाप दुकान में घुस गया और एक कोने में छिपने का प्रयास करने लगा। संयोग से वह दुकान एक सर्राफ की थी। वहां ग्रहकों को दिखाए गए आभूषण एक मेज पर रखे थे। रामदास उस मेज से टकरा गया और कुछ आभूषण उसके कपड़ों से जा चिपके। ज्योंहि रामदास छिपने का प्रयास करने लगा दुकान के मालिकी निगाह उस पर गई।

उसने चोर-चोर’ कह-कहकर शोर मचा दिया। दुकान के नौकरों ने रामदास को पकड़ लिया। भीड़ इकट्ठी हो गई।
पुलिस को खबर दी गई। रामदास ने लाख समझाया कि उसने चोरी नहीं की है परंतु उसके कपड़ों पर चिपके आभूषणों के कारण किसी को विश्वास न हुआ। उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया। पुलिस ने रामदास से चोरी का कारण जानना चाहा तो उसने सविस्तार से कटहल खाने की पूरी बात उन्हें बता दी।

थानेदार हंसता हुआ बोला—‘‘अरे मियां, जब खाना नहीं आता था तो कटहल खाया क्यों ? अच्छा, यह बताओ कि तुम किस व्यापारी के यहां आए थे।’’ रामदास को उस व्यापारी के यहां ले जाया गया। परंतु उस व्यापारी ने रामदास के हुलिए के कारण उसे पहचानने से इन्कार कर दिया। तब रामदास ने अपना व अपने पिता का पूरा नाम बताया, साथ ही अपने साथ लाए सामान की पूरी जानकारी दी। इस पर व्यापारी ने उसे पहचानते हुए कहा—‘‘थानेदार जी, यह अपना ही बच्चा है। इसे छोड़ दीजिए। यह हालात के कारण मुसीबत में फंस गया है।’’

अब रामदास बोला—‘‘पहले मुझे इस मुसीबत से छुटकारा दिलाइए।’’ व्यापारी ने रामदास को बदलने के लिए कपड़े दिए। उसका चेहरा व हाथ-पैर साफ करवाए, फिर उसकी अच्छी खातिरदारी की और कहा—

‘‘बेटा याद रख, किसी भी नई चीज को आजमाने से पहले उसकी जानकारी अवश्य ले लेनी चाहिए।’’