मंच पर सक्रिय योगदान न करने वाले सदस्यो की सदस्यता समाप्त कर दी गयी है, यदि कोई मंच पर सदस्यता के लिए दोबारा आवेदन करता है तो उनकी सदस्यता पर तभी विचार किया जाएगा जब वे मंच पर सक्रियता बनाए रखेंगे ...... धन्यवाद   -  रामलाल ब्लॉग व्यस्थापक

हास्य जीवन का अनमोल तोहफा    ====> हास्य जीवन का प्रभात है, शीतकाल की मधुर धूप है तो ग्रीष्म की तपती दुपहरी में सघन छाया। इससे आप तो आनंद पाते ही हैं दूसरों को भी आनंदित करते हैं।

हँसे और बीमारी दूर भगाये====>आज के इस तनावपूर्ण वातावरण में व्यक्ति अपनी मुस्कुराहट को भूलता जा रहा है और उच्च रक्तचाप, शुगर, माइग्रेन, हिस्टीरिया, पागलपन, डिप्रेशन आदि बहुत सी बीमारियों को निमंत्रण दे रहा है।

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बुधवार, 29 अगस्त 2012

वैसे तो टीटोटालर हूँ...



वैसे तो टीटोटालर हैं...

दारू शराब सब लत ही है,
करती खराब दौलत ही है,
होता है असर सेहत पर भी
पड़ती है मगर आदत फिर भी,

जब मुफ्त मिलेगी तो यारों,
क्यों हद की बात करो यारों,
जितनी आती है आने दो,
ऐसे ही रात बिताने दो.

फोकट में मिलेगी तो बोलो,
जो भी हो बोतल खोलो,
कुछ फर्क नहीं पड़ता हम-दम,
हो ठर्रा विस्की या हो रम.

काजू किशमिश तो आएँगे,
अंडे, नमकीन मँगाएँगे,
चिल्ली-चिकन भी मँगवालो,
फ्राई-पनीर भी करवालो.

जब तक जेबें हैं भारी,
कब कौन कहाँ है लाचारी, मेरी
अंटी को हाथ लगाना मत,
आंटी को कुछ बतलाना मत.

दो चार पेग जो बढ़ जाएँ,
थोड़ी मुश्किल में पड़ जाएँ,
वो बने डाक्टर बैठे हैं,
क्यों फीस ये इतने ऐँठे हैं.

ये दवा ठीक कर जाएँगे,
पैसे वापस मिल जाएँगे,
फिर हर्ज ही क्या है पीने में,
मस्ती मस्ती में जीने में.

बस एक बात का ध्यान रहे,
अपने बड़ों का मान रहे,
माँगो मत पैसे खाने के,
पीने और पिलाने के.

वैसे तो टीटोटालर है...

एम.आर.अयंगर. /  290812.

शुक्रवार, 9 मार्च 2012

मुलायम की माया !!!


MAYA AND MULAYAM


WAH KYA BAAT HAI.....

MULAYAM KI MAYA MEIN MAYA MULAYAM HO GAYI.
वाह क्या बात है !!!!!

मुलायम की माया से माया मुलायम हो गई...

Iyengar.

बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

बिछना - भबिछाना



बिछना - बिछाना

जमाना बदल रहा है.
काफी बदल गया है.
लेकिन बिछने की आदत अभी कायम है.
पहले आँखें बिछाते थे,
फिर कालीने बिछने लगीं ,
अब लोग खुद बिछ जाते हैं.

लोगों को फख्र महसूस होता है,
लोगों को हर्ष महसूस होता है,
कि अब हम न ही बिस्तर बिछाते हैं,
न ही हम कालीनें बिछाते हैं,
न ही नजरे इनायत बिछाई जाती है,
हम बिछाने में विश्वास नहीं करते ....

हम तो खुद ही बिछ जाते हैं.


एम.आर.अयंगर.
09425279174.

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

गधे पर शेर...


मेरे पिछले पोस्ट में मजबूरी वश मुझे प्राप्त सवाल का जवाब ही पोस्ट कर सका क्योंकि सवाल मेल से मिट गया था.
अब वही सवाल मेरे पास फिर आ गया है, इसलिए सवाल और जवाब दोनों पोस्ट कर रहा हूँ.

सवाल था गधे पर फोटो देख कर शेयर लिखिए.
और प्रेषक का शेर भी साथ था --
देखिए फोटो, पढ़िए शेर और फिर मेरा जवाब... शायद अब तालमेल भाए..



प्रेषक का शेर...

हर समंदर में साहिल नहीं होता,

हर जहाज पे मिसाइल नहीं होता,
अगर धीरुभाई अम्बानी नहीं होता,
तो - हर गधे के पास मोबाईल नहीं होता |


मेरा जवाब ....


Sahi hai bhai,
सही बात है भाई !!!!!
Aaj har gadhe ke paas mobile hota hai,
आज हर गधे के पास मोबाईल होता है,
par kya har mobile wala gadha hota hai?
पर क्या मोबाईल वाला गधा होता है?
Agar haan to sochye !!!!!!*
अगर हाँ तो सोचिए,
waqt padne par gadhe ko bhi baap banana padta hai,
वक्त पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है,
kya waqt aane par "baap ko bhi ........................"?
क्या वक्त आने पर बाप को भी "........................................."?

…………………………………

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

जरा सोचिए...

Sahi hai bhai,
सही बात है भाई !!!!!

Aaj har gadhe ke paas mobile hota hai,
आज हर गधे के पास मोबाईल होता है,



par kya har mobile wala gadha hota hai?
पर क्या मोबाईल वाला गधा होता है?

Agar haan to sochye !!!!!!*अगर हाँ तो सोचिए,

waqt padne par gadhe ko bhi baap banana padta hai,
वक्त पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है,



kya  waqt aane par "baap ko bhi ........................"?
क्या वक्त आने पर बाप को भी  "........................................."?


एम.आर.अयंगर.09425279174.

सोमवार, 31 अक्टूबर 2011

आज के रावण




आज के रावण

रामचंद्र जी मार चुके हैं,
त्रेतायुग में रावण को,
आज रावणी मार रही है,
कल युग में भी जन जन को.

सीताहरण पर श्रीराम ने,
रावण को मार गिराया है,
खुशियाँ मनाने हर वर्ष ,
जनता ने रावण को जलाया है.

बचपन में लगता था यह तो,
हर्षोल्लास का प्रतीक है,
अब बोध होने लगा,
यह बस केवल लीक है.

शारीरिक रावण तो मर गया,
पर मन का रावण मरा नहीं,
रावण के जलने से ये,
बन धुआँ हवा में समा गईं.

परिणाम, अनेकों रूपों मे,
रावण, फिर-फिर पनप गए,
नाम अलग हैं,
काम अलग हैं,
सबमें कुछ कुछ.
रावणी बुद्धियाँ समा गईं.

और ये सब उभरते रावण,
हर बरस इकट्ठा होते हैं,
हर बरस हर्ष मनाते हैं,

एक रावण का पुतला खाक कर,
अनेकों रावण के पैदा होने का,
मिलकर जश्न मनाते हैं.

अच्छा होता,
रावण के साथ, हर बरस,
रावणी प्रवृत्तियां भी जल कर,
खाक हो जातीं,
तो आज भारत में,
रावण की नहीं,
राम की धाक हो जाती.

जो हो रहा है,
इससे यह पैगाम उभरता है,
रावण का पुतला ही जलता है,
पर रावण कभी न मरता है.

रावण दहन सालाना होता,
नहीं रावणी मरती है,
रावण अमर, नहीं मरता है,
यही दास्तां कहती है.

अब सैकड़ों रावण मिल कर,
जलाते हैं एक रावण को,
जानते हुए भी अनजान हैं कि,
एक जल गया तो कुछ नहीं,
कई और उभरेंगे,
सोचना-समझना नहीं चाहते कि,
अपने अंदर के रावण को कब जलाएँगे,
डरते भी नहीं हैं कि,
कहीं, हम रावण तो नहीं कहलाएँगे.
..............................................
अयंगर 27.10.2011.
कोरबा.

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

स्वतंत्र


भारत गणतंत्र हमारा,
ऐसा जनतंत्र हमारा,
जनता पर तंत्र हमारा,
यह है स्वातंत्र्य हमारा.

करते हैं शांति की बातें,
वैसे हम भ्रांति फैलाते,
चादर जितना भी होवे,
पूरे हम पैर फैलाते.

करते हैं जो करना हो,
कहते हैं जो कहना हो,
कथनी करनी में अपनी,
समता हो तो बतलाएं.

भारत के भाग्य विधाता,
ऐसी है आज की गाथा,
जिसको, जो भी मिल जाता,
उसको वह खा पी जाता.

इसका कोई दंड बनाओ,
या फिर कोई फंड बनाओ,
जितना खाने मिल जाए,
मिल जुल कर बाँट के खाओ.

.......................................
एम.आर.अयंगर.

रविवार, 9 अक्टूबर 2011

ठोकर न मारें...

ठोकर न मारें

दिखाकर रोशनी, दृष्टिहीनों को,
और प्रदीप्यमान सूरज को,
रोशनी का तो अपमान मत कीजिए !!!

और न ही कीजिए अपमान,
सूरज का और दृष्टिहीनों का.

इसलिए डालिए रोशनी उनपर,
जिन्हें कुछ दृष्टिगोचर हो,
ताकि सम्मान हो रोशनी का,
और देखने वालों का आदर.

एक बुजुर्ग,
जिनकी दृष्टि खो टुकी थी,
हाथ में लालटेन लेकर,
गाँव के अभ्यस्त पथ से जा रहे थे,

एक नवागंतुक ने पूछा,
बाबा, माफ करना,
दृष्टिविहीन आपके लिए, इस
लालटेन का क्या प्रयोजन है ?

बाबा ने आवाज की तरफ,
मुंह फेरा और बोले –

बेटा तुम ठीक कहते हो.
मेरे लिए यह लालटेन अनुपयोगी है,
फिर भी यह मेरे लिए जरूरी है.

ताकि राह चलते लोग,
कम से कम इस लालटोन की,
रोशनी में देखकर,
मुझ जैसे  बुजुर्ग को—
ठोकर न मारें.

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2011

मुर्दा नाचा



कल के उस फिल्मी दौर को,

याद करने से दुख होता है कि

हम आज कहाँ हैं ?

समाज का वह दर्पण जिसे

फिल्मी साहित्य के नाम से जानते हैं,

आज बाजारु हो गई है,

जिज्ञासा को परत दर परत ,

नोंच-नोंच कर आवरण रहित कर दिया है,

अर्धनग्नता की कामुता को,

नग्नता ने अश्लील बना दिया है।

हीरो व विलेन में अन्तर उतना ही बचा है,

जितना हीरोइन व कैबरे डाँसर में रह गया है।

गानों के वे वर्णछंद राग व वे चित्रण,

अब नहीं मिलते,

जिसमें कविता का आनंद था,

साहित्य का भी मान था,

राग की सलिलता थी,

और चित्रण, भावों को

आपस में बाँधने वाला माध्यम।
 
इससे हर तरह से आनंदमय

वातावरण बन जाता था।

सभी पारिवारिक सदस्यों के साथ

फिल्म देखने का,

एक अनूठा आनंद था,


अब या तो प्रेमी प्रेमिका,

या फिर पति पत्नी ही फिल्म को ,

साथ बैठ कर देख सकते हैं,

कॉलेज से भाग कर जाने वाले

छोरे छोरियों की छोड़ो,

दलों का मजा लेने वाले,

दलदल में भी खुश रहते हैं.


और कोई पारिवारिक सदस्य गर

साथ साथ फिल्म देखें तो-

क्या होगा ..

शायद भगवान भी

जानना नहीं चाहेगा।

गीत के बोल बातूनी,

छंद-लय की कहा सुनी, सुनी

ताल, बेताल के,

और साज होगा जाज,

तारतम्यता लुप्त,

तौहीन साहित्य का,

सुप्तावस्था भी नयन फोड़,

खड़ी हो जाती है।


उन पुरीने गीतों की,

उनके लय की,

मधुरता और प्रवाह,

मानसिक शांति देती है,

और तन मन को तनाव मुक्त कर,

शवासन प्रदान करती है।


और आज ?


शायद मरघट पर,

आज के गीत बजाए जाएँ तो,

मुद भी खड़े होकर नाचने लगेंगे।
......................................

मंगलवार, 20 सितंबर 2011

मृत्युदंड !!!!!

                            मृत्युदंड 
                     

                            
                            जहाँ पूजनीय है नारी,                      
                           
                            वहीं देवता बसते हैं,                      
                            
                            किंतु राम से देव..                      
                            
                            दैव हा!!                      
                            
                            अग्नि परीक्षा लेकर भी,                      
                            
                            सीताजी को तजते हैं. 
                            

                           
                           कहाँ दोष सीता का कहिए,                      
                           
                           उसका हुआ हरण जो था?                      


                           रावण को भड़काने वाला,                      


                           भगिनी कटा कर्ण तो था. 


                     
                           यदि रावण अपने पक्ष में प्रस्तुत करता,                      
                           
                           सीताजी के अग्नि परीक्षा की रिपोर्ट,                      


                           तो क्या मृत्यु दंड दे सकता था उसे...                      


                           यह सुप्रीम कोर्ट ??? 











एम.आर.अयंगर, 09425279174