मंच पर सक्रिय योगदान न करने वाले सदस्यो की सदस्यता समाप्त कर दी गयी है, यदि कोई मंच पर सदस्यता के लिए दोबारा आवेदन करता है तो उनकी सदस्यता पर तभी विचार किया जाएगा जब वे मंच पर सक्रियता बनाए रखेंगे ...... धन्यवाद   -  रामलाल ब्लॉग व्यस्थापक

हास्य जीवन का अनमोल तोहफा    ====> हास्य जीवन का प्रभात है, शीतकाल की मधुर धूप है तो ग्रीष्म की तपती दुपहरी में सघन छाया। इससे आप तो आनंद पाते ही हैं दूसरों को भी आनंदित करते हैं।

हँसे और बीमारी दूर भगाये====>आज के इस तनावपूर्ण वातावरण में व्यक्ति अपनी मुस्कुराहट को भूलता जा रहा है और उच्च रक्तचाप, शुगर, माइग्रेन, हिस्टीरिया, पागलपन, डिप्रेशन आदि बहुत सी बीमारियों को निमंत्रण दे रहा है।

अविनाश वाचस्‍पति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अविनाश वाचस्‍पति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 10 सितंबर 2011

सैंडल को सैंडल ही रहने दो दीवानो ...

सैंडलों की उड़ान का हवाई किस्‍सा भरपूर उमड़ रहा है।
विरोधियों के तो पेट में घुमड़ रहा है।
यह वही घुमड़ है, जिससे मरोड़ उठते हैं।
जिसके सैंडल है, उनके सामने करोड़ झुकते हैं।
वे और ये क्‍या खा-सोचकर मुकाबला करेंगे।
सैंडल इतने भी डल नहीं हैं। डल कहोगे तो काश्‍मीर की झील हो जायेंगे,
भूल गए क्‍या वहां की तस्‍वीर भी। सैंडल कभी चर्चा में नहीं रही हैं।
जूते पहले सुर्खियों में आए, फिर यदा-कदा चप्‍पलें भी आ पहुंची और अब एकदा सैंडलें पधारी हैं।

वे भी लाने को तैयार हो गए, जहाज भेज तो हम लाते हैं और आते हुए मुंबई से सैंडलें खरीद लाते हैं। उन्‍हें जरूर अहसास, यह खास हो गया होगा कि अगले बरस वे ही होंगे, कौन का यह अहसास, प्रत्‍येक कोण से लुभा रहा है। पर जिसने बन जाना है पीएम, वो क्‍यों मंगवाए सैंडल जितनी चीज महीन।

लीक्‍स का विकी अब लीक से हट रहा है। वैसे अपनी बात पर डट रहा है लेकिन जो डाट रहा है उसे, वो आंक रहा है तुझे। वो पाक नहीं है, न था, न रहेगा। पाक को तो वो कर रहा है खाक। सैंडलों को फिर भी रहा है ताक। सोच रहा होगा कि इसका ही बिजनेस कर लूंगा। जो डूब रही है अर्थव्‍यवस्‍था हमारी, उसको सुधारने की समझ लूंगा तैयारी।

जो लूट रहा है, वो दिखलाने के लिए लुट सकता है, लुटने में भी उसकी एक चाल है, जिसे नहीं समझ पा रही पीएम बनने की चाहत रखने वाली बाला है। उसे बाला कहो या कहो बाल, वो तो बिना बात ही कर देती है खड़े बवाल। उससे किसकी हिम्‍मत है करे सवाल, जो करे सवाल, वही सारे उत्‍तर निकालेगा, गाकर या कहकर। निकालनी हो बाल में से खाल, पर वे निकालती रही हैं सदा खाल में से बाल।

वही तड़पाते हैं, जब निकल-निकल कर आते हैं। वे मंगवाती हैं सैंडल, जिन्‍हें आसान होता है करना हैंडल। जूती वो पहनती नहीं हैं, अगर पहनेंगी तो समझेंगी कैसे? जूती समझना जरूरी है और पहनना बिल्‍कुल गैर-जरूरी। बिल्‍कुल उसी तरह जैसे मंगवाना जरूरी है, किसकी मजबूरी है, कितनी दूरी है, मायने नहीं रखती। सैंडल पहनाना जी हुजूरी है, इससे कैसे रख सकते, पहनाने वाले दूरी हैं। वे कभी नहीं कहती हैं मेरी सैंडल, वे कहती हैं मेरी जूती करेगी यह काम।

मेरी जूती देगी जवाब। मेरी जूती ही करेगी लाजवाब। सैंडल तो पैरों की धरोहर हैं, जेवर हैं, आभूषण हैं। सैंडल का किस्‍सा, सैंडल का है, जूती का नहीं है।

सैंडल को सैंडल ही रहने दो, इसे भ्रष्‍टाचार का नाम न दो। हवाई जहाज की उड़ान तो दो, पर विकिलीक्‍स का पैगाम मत दो। मत कहो इसे बुराई, यह तो है दुहाई। इसके लाने में ही कितनों की बची है नौकरी, कितनों ने है पदोन्‍नति पाई।

आप इतना आसान सा फलसफा भी क्‍यों नहीं समझ पाते हैं भाई, लेकिन अपनी बहनों के, सबकी बहनजी के नहीं। तिल सी बात को तिल ही रहने दो, इसे ताड़ मत बनाओ, यह तो है राई, जिसे बतलाना चाह रहे हो तुम खाई, कैसी विलक्षण बुद्धि है पाई ?

मंगलवार, 6 सितंबर 2011

एकदम अद्भुत कला है मास्‍टरी

शिक्षक दिवस पर विशेष



मास्‍टरी कला का गला कंप्‍यूटर दबा रहा है।मास्‍टरी को कला ही माना जाना चाहिए। किसी को पढ़ाना इतना आसान नहीं है, जितना समझ लिया जाता है। आजकल पढ़ाने वाले को, पढ़ने वाले पढ़ाने के लिए तैयार मिलते हैं। जरूरी नहीं है कि जो पढ़ाया जाना है, वो आपने पढ़ा ही हो। आपने नहीं पढ़ा होगा तो आपके लिए उसे पढ़ाना बहुत ही सरल होगा। आप निर्भय होकर कुछ भी कह सकते हैं। जब आपको उस बारे में कुछ मालूम ही नहीं है तो आप गलत पढ़ा रहे हैं, यह भी तो आपको नहीं मालूम हुआ।

अब यह जिम्‍मेदारी तो आपको चयन करने वाले की बनती है कि उसने आपको पढ़ाने के लिए चुना ही क्‍यों, अगर चुन लिया है, फिर तो दोष उसी का है। इससे होने वाले बुरे परिणाम भुगतने के लिए भी उसे ही तैयार रहना चाहिए। अच्‍छे परिणाम या पारिश्रमिक पर तो पढ़ाने वाले का हक बनता है, इससे कोई इंकार कैसे कर सकता है।

आपको मालूम ही है कि मास्‍टरी के बेंत यानी डंडे पर भी कानूनन रोक लग ही गई है। वैसे भी आप पढ़ाने जाते हैं, कोई लट्ठ चलाने तो जाते नहीं हैं या किसी बाबा के अनशन कार्यक्रम में सोते हुए लोगों को जगाने की जिम्‍मेदारी भी आपको नहीं सौंपी गई है। जब ऐसा है तो आपने सिर्फ पढ़ाना ही है और पढ़ाने के निशान, कोई लाठी के निशानों की तरह एकदम तरोताजा नजर भी नहीं आते हैं कि जिसको पढ़ाया है, तुरंत उसके दिमाग में झांककर देख लिया कि उसको समझ आया, नहीं आया – एकदम से इसको मापने का कोई मीटर भी अभी तक बना नहीं है, न हाल फिलहाल बनने की संभावना ही है।

परीक्षा भी आप 50 से 100 बच्‍चों की एकदम ले नहीं सकते हैं, क्‍योंकि आज न तो पढ़ने वालों और न पढ़ाने वालों के पास ही फालतू समय है जो पढ़ाने के बाद परीक्षा लेने और देने के लिए फिजूलखर्च करें। आप तो महीने के अंत में एकदम करारे-करारे लाल, नीले नोट गिनने के लिए तैयार रहा कीजिए। उसमें आपकी लापरवाही बर्दाश्‍त नहीं की जाएगी। आप पढ़ाने से छुट्टी ले सकते हैं अथवा बंक मार सकते हैं परंतु पगार वाले दिन तो आपको पगार पाने के लिए पसीना बहाना ही होगा। इससे ही मास्‍टर की मजबूती का मालूम चलता है।

मजबूती के लिए अब डंडे के प्रयोग की जरूरत, अब मास्‍टरी में नहीं रही है। पुलिस में है और खूब है तथा आजकल इस कला का प्रदर्शन चैनलों पर हर दूसरे दिन देखने को भी मिल रहा है। इससे लाठी विधा की लोकप्रियता के बारे में भी मालूम रहता है। रोज ही एकदम नए तरह के एकदम यूनीक नजारे नजर आते हैं। टीवी चैनलों के आने से आम जनता के लिए इस तरह के अजब गजब तरीकों की जानकारी पाना आसान हो गया है।

जो जानकारी पहले मिलती रही है, वो न तो विश्‍वस्‍त होती थी और उसके अफवाह होने या बाद में अफवाह साबित करने की पूरी संभावनाएं रहती थीं और इसे प्रयोग करने वालों को लोकप्रियता मिलने के रास्‍ते में यह एक ऐसी बाधा थी, जिससे पार पाना कभी आसान नहीं रहा है।
पहले बचपन में कक्षाओं में पढ़ने जाने का मतलब डंडे या बेंत से रूबरू होना भी रहा है, इसी वजह से कितने ही होनहार देश और परिवार का नाम रोशन करने से घर और समाज के अंधेरे में गुम होकर रह गए हैं, परंतु अब ऐसा नहीं है। इस तरह के अवसर मास्‍टरों के लिए अब दुर्लभ हो गए हैं। मास्‍टर बनने के बाद डंडे या बेंत चलाने का जोखिम आजकल कोई नहीं लेता है।

एक आध चपत लगाना भी बहुत दूर की बात है, अगर जोर से बच्‍चे पर चिल्‍ला भी दिए तो शाम तक खबर आ जाती है कि मास्‍टर के खिलाफ एफ आई आर दर्ज हो गई है क्‍योंकि बच्‍चे बर्दाश्‍त नहीं करते हैं और घर जाकर सीधे खुदकुशी कर लेते हैं। मास्‍टर को धमकाते भी नहीं हैं कि उन्‍हें अपनी गलती पर माफी मांगने या उसे सुधारने का अवसर मिल सके। इसमें तो सीधा जांच और जांच से पहले, सस्‍पेंड फिर गिरफ्तारी, इससे बचने के लिए थाने में दारोगा की सेवा और बाद में भी बचना मुश्किल और जेल के पीछे पहुंचना।

नौकरी भी गई और बदनामी भी मिली। अब आगे मास्‍टरी भी नहीं कर पायेंगे, ऐसा मुंह काला होता है कि कालापन चेहरे पर नहीं, पुलिस से सत्‍यापन कराते समय सबको नजर आता है।
बहरहाल,‍ जितना जोखिम पढ़ाने में नहीं है, उससे अधिक रिस्‍क तो साफ सुथरे कैरियर के साथ, बिना दागदार हुए मास्‍टरी का कार्यकाल पूरा करने में है। आप मास्‍टर भी बने रहें और मलाई भी चाटते रहें। इसके लिए आपको स्‍कूल में पढ़ाना तो नहीं ही है, साथ ही बच्‍चों से पंगा भी नहीं लेना है। अगर बच्‍चों की जेब में मोबाइल फोन हैं तो आपको ऐसे दिखाना है कि जैसे आपको इस बारे में मालूम ही नहीं है।

आप तो बिल्‍कुल मिट्टी के माधो हैं लेकिन दूसरी तरफ, बच्‍चों को साफ कह देना है कि अगर वे उत्‍तीर्ण होना चाहते हैं तो उनसे कोचिंग लेना अनिवार्य है और आपसे कोचिंग लेने पर उनके मेरिट में आने की पूरी गारंटी है। फिर आपके पास पैसा भी खूब आएगा और कोई स्‍टूडेंट आपको कभी नहीं धमकाएगा। आपके चारों ओर जी हजूरी करता नजर आएगा। इसलिए ही मास्‍टरी को आजकल कला की संज्ञा दी गई है। क्‍या आपको इसमें कुछ गफलत नजर आ रही है ?

शनिवार, 27 अगस्त 2011

पीएम ने कहा और अनशन टूट गया

पी एम भी हैं प्रसन्‍न
अन्‍ना भी हैं खुश
तोड़ने वाले हैं अनशन

पी एम ने बतलाया है
अभी अभी उनका संदेश
मेरे मोबाइल पर आया है

संदेश में लिखा है
कंप्‍यूटर प्रत्‍येक मर्ज की दवा है

टाइप करो CORRUPTION
कर्सर को वहीं मटकने दो
कंट्रोल प्‍लस ए दबाओ
फिर तुरंत डी दबाओ
कंट्रोल पर से
न ऊंगली हटाओ
देखना हुआ न चमत्‍कार
डिलीट हो गया
सारा भ्रष्‍ट्राचार

लेकिन इतनी जल्‍दी
मत खुश हो अन्‍ना
अभी रिसाइकिल में
जाकर बीन बजानी है
वहां से एम्‍पटी जगह
तुरंत खाली करानी है

उसके बाद न रहेगा भ्रष्‍टाचार
न मिलेगा करप्‍शन
चाहे करना सर्च
चाहे करना फाइंड
कितना ही लगाना माइंड

देखा मिट गया करप्‍शन
तोड़ दो अन्‍ना अपना अनशन

खाओ भरपेट राशन
अब मैं झाडूंगा भाषण
अगर नहीं आता कंप्‍यूटर चलाना
तो सीखकर आओ अन्‍ना, क्‍यों
इकट्ठा कर लिया है जमाना

जाओ अन्‍ना कंप्‍यूटर सीख कर आओ
यूं ही मत विश्‍वभर में कोहराम मचाओ
जाओ अन्‍ना कंप्‍यूटर सीख कर आओ

सारे विश्‍व का भ्रष्‍टाचार खुद अकेले मिटाओ
और सच कह रहा हं कि खूब ख्‍याति पाओ

बुधवार, 24 अगस्त 2011

पीएम जादूगर हैं या मदारी : फिर जादू की छड़ी ?

बिल्‍कुल नहीं डरा हूं मैं। अगर पीएम पूरे 40 मिनिट मेरे बारे में ही बोलते रहते, मैं तो तब भी रंच मात्र भयभीत नहीं होता। जिस पीएम से उनके संगी-साथी और देशवासी ही नहीं डरते हैं, उनसे भला मैं क्‍यों डरूंगा, जबकि सारा विश्‍व जानता है कि वे किससे डरते हैं, इसका खुलासा भी मैं नहीं करूंगा।

पीएम चाहे तो सब कुछ कर सकते हैं, पर वे चाह ही नहीं सकते, और जब उनके मन में चाह ही नहीं है तो उनके आगे कोई और राह खुल ही नहीं सकती है। जीवन में यह सच जान लेना चाहिए कि जी तो सिर्फ विचारों का वन है, वही ऐवन है जिसमें उपजता विचारों का स्‍पंदन है परंतु वन-उपवन से जिंदगी नहीं महका करती।

जिसे बतला रहे हैं जादू की छड़ी, उनके क्‍या किसी के पास भी नहीं होती है कभी। जादू की छड़ी तो कहीं पाई भी नहीं जाती, यह तो बहानागिरी है। जज्‍बा होता है कुछ कर गुजर जाने का और वो पीएम में तो है ही नहीं। मुझे जो जड़ से मिटाना चाहते हैं,

वे मिटाने की कोशिशें करते-करते एक दिन खुद ही मिट जाते हैं। जो मुझे मिटाना चाहते हैं एक बार वे खुद तो मिटने के लिए तैयार हों, वे तो जादू की छड़ी, सिर्फ इन तीन शब्‍दों को जादू की तरह इस्‍तेमाल कर रहे हैं और हर मौके पर फेल हो रहे हैं। वे पीएम हैं, मदारी नहीं है, यह तो उन्‍हें समझना चाहिए। जब मदारी नहीं हैं और न जादूगर ही हैं तो फिर क्‍यों बार बार जादू की छड़ी, जो होती ही नहीं है, उसी के इर्द-गिर्द अपने शब्‍दों के जाल-जंजाल बुनते रहते हैं।

अगर वे मदारी या जादूगर होते तो कहते कि मैं पीएम नहीं हूं और मेरे पास कुर्सी नहीं है। पर मैंने आजतक किसी मदारी या जादूगर को ऐसा कहते नहीं सुना है। आपने सुना है क्‍या ?

मजमा वही सफल होता है जिसे मदारी खुद जमाता है और उसी से भरपूर कमाता है। वही मदारी बंदर-बंदरी को मन के माफिक नचाता है, वही जहरीले सांपों को काबू में रखकर खेल दिखाता है, वही जंगली भालू को काबू करके नाच नचवाता है, वही मदारी अपने बच्‍चों को ऐसा होशियार बनाता है, उनको कलाकारी सिखाता है, उन्‍हीं से जोकर का काम लेता है, वे ही बच्‍चे हवा में रस्‍सी पर बेसहारे चलकर करतब दिखलाते हैं –

अब ऐसा तो नहीं करता है मदारी कि सारे काम खुद ही संपन्‍न करता है या करेगा तो सफल हो जाएगा। तो समझ लीजिए कि सफल प्रबंधन का जो गुर सड़कछाप मदारी जानता है, उससे हमारे पीएम क्‍यों अनभिज्ञ हैं ?

मदारी तमाशा दिखानेवाला है, वो खुद कभी तमाशा नहीं बनता। वो खुद तो सलाम भी नहीं ठोकता, वो कटोरा लेकर सबसे इनाम भी नहीं मांगता। बस सबको ड्यूटी बांट देता है, फिर खुद भाषण ही देता है, डुगडुगी की ताल पर सबको नचाता है और अपना पूरा धंधा खूब शान से चलाता है और हमारे पीएम .........

और डर ... डर मैं नहीं रहा हूं, डर गए हैं पीएम। अन्‍ना हमारे हैं जिनसे डर गए सारे हैं।

शनिवार, 20 अगस्त 2011

'अन्‍ना हमारे 'को भ्रष्‍टाचार ने पत्र लिखा

सुन अन्‍ना सुन, भ्रष्‍टाचार की मीठी धुन
फिल्‍मी गीतों में बार बार कहा गया कि आपस में प्रेम करो देशवासियों। पर देशवासी आपस में प्रेम नहीं कर पाए। उन्‍हें सदा पैसे से प्रेम रहा। कोई उन्‍हें मिला ही नहीं, जो आपस में प्रेम करना सिखलाता। सिखलाने वाला चाहता तो था कि वे आपस में प्रेम करना सीखें। पर वे धन से प्रेम करना सीख रहे थे। आपस की तो छोडि़ए, उन्‍हें तो अपने अच्‍छे और बुरे का भेद ही नहीं रहा। वे जो कार्य करते थे, वे सीधे-सीधे उन्‍हें खुद को नुकसान पहुंचाते रहे। पर वे यह समझते रहे कि फायदा हो रहा है। ऐसी स्थिति में क्‍या किया जा सकता था, इस स्थिति का लाभ उठाया उन्‍होंने, जो सत्‍ता के लालची थे या सत्‍ता में विराजमान थे। वे फायदा उठाते रहे, झोलियां न अपनी, न हमारी – दूर वालों की भरती रहे।
इन्‍हें कहा गया कि आपस में लड़ना मत। पर वे इन्‍हें लड़ाने में कामयाब होते रहे और ये लड़ते-भिड़ते रहे। फायदा लड़ाने-भिड़ाने वालों का ही होता रहा। मुझसे दो-दो हाथ करने या  लड़ने की, मुकाबला करने की बात आती तो सभी अपने को कमजोर समझते। इनकी समझ ऐसी विकसित कर दी गई थी कि इन्‍हें मुझसे से सभी कमजोर दिखलाई देते। कमजोरों को देख देखकर ये भी कमजोर होते गए। इनके कमजोर होने से देश भी कमजोर होने लगा। कितनी ही तरह की विटामिनों की ईजाद की गई परंतु सब नाकारा रहा। संसद में सब उपर से दुखी होते ही दिखते रहे। वास्‍तव में दुखी जनता होती रही। मैं फलता-फूलता रहा। तभी कॉमनवेल्‍थ खेल आयोजित हुए। मैं उसमें भी खूब जी भर कर, सिर डुबो-डुबोकर नहाया।  डुबकी मैं लगा रहा था और कॉमनमैन की वेल्‍थ डूब रही थी। जानकारी तो सभी को थी पर पर सब खुद ड्रम भरने के चक्‍कर में नजरें बचाते रहे। निगाहें भी इधर ही थीं, निशाना भी मैं था, फिर भी मुझे तनिक भी नुकसान नहीं होने पाया।
तभी अन्‍ना आए। आना कहना, हल्‍का है। अवतरित हुए बतलाना, बहुत सही है और इसी बोझ के तले दबकर मैं चीख-चिल्‍ला रहा हूं। पर मेरी चिल्‍लाहट जनता को सुनाई नहीं दे रही है। वैसे भी यह सच्‍चाई है कि अन्‍ना को देखकर मेरे सरपरस्‍तों के हाथ-पांव फूल गए हैं और उनके गलों की गलियों से आवाज ही नहीं निकल रही है, सुनाई तो तब देगी। सरकार के नुमाइंदे भीतर से बुरी तरह भन्‍ना रहे हैं और यह भनक उनके फेस पर बिल्‍कुल साफ दिखलाई दे रही है। अन्‍ना के हाथ में मुझसे मुकाबले के लिए जो गन्‍ना है, वो सरकार के नुमाइंदों के लिए तो लाठी रूप में है। जबकि जनता रूपी भगवान के लिए उसके भीतर बसी मिठास है, उसी मीठी मिठास की सबको आस है। आप चाहे उस मिठास भरे गन्‍ने से मारो किसी को अथवा घुमा दो संसद पर, सबकी खटिया खड़ी कर दो, जिससे खटिया पर सभी सवार खदबदा जाएं, गिर जाएं, औंधे मुंह लुढ़क-पुढ़क जाएं, पर यहां पर यह सब होता देखने की मजबूरी में ही मजबूती है।
चाहते तो सब हैं कि आपकी तरह बनें, मुझसे से लड़ें, कुरीतियों से भिड़ें पर जहां पर किसी को फायदा हो रहा हो, वहां से वे आंखें नहीं मूंद सकते हैं। आता हुआ भला किसे बुरा लगता है। जहां पर आ रहा हो वहां पर तो हम तन और मन से आपके साथ हैं पर जहां पर जाता दिखलाई दे रहा हो, वहां से आप हमें नदारद ही पायेंगे अन्‍ना हमारे। आप नाराज मत होना।
जहां अंधेरे में दूध डालना है तो सब पानी ही डालेंगे, इसीलिए उजाले की महिमा बखानी गई है। आप हैरान मत होना अन्‍ना हमारे। अंधेरे में ऐसा ही होता है। सुबह प्‍योर पानी भरा मिलेगा, जबकि उसमें ऐसे भी होंगे जिनके यहां पानी नहीं आ रहा होगा, पानी की किल्‍लत होगी, वे अपने अपने लोटों से हवा भी उंडेल गए होंगे क्‍योंकि फिंगर डिटेक्‍टर तो गेट पर लगा होगा, उसने तो दर्ज कर लिया होगा कि लोटे के साथ कौन कौन आया था, अब किसने पानी और किसने हवा बहाई-उड़ाई थी, इसकी जानकारी तो फिंगर डिटेक्‍टर को भी नहीं रही होगी। इन सार्वजनिक उपक्रमों में प्‍योर पानी ही एकत्र हो जाए, वो क्‍या कम है, दूध की छोड़ो, वैसे भी रोजाना ही महंगा हो रहा है। पानी की कीमतों पर ही सही, महंगाई रुकी तो हुई है। अब किसी ने भैंस थोड़े ही बांध रखी है। हम तो पब्लिक में से हैं, रात के अंधेरे में हवा-पानी ही डालेंगे। इतना क्‍या कम है कि लोटा भर के वापिस तो नहीं ला रहे हैं, नहीं तो हमें रात में ही मालूम चल जाता कि उसमें सब पानी ही उलीच गए हैं लोटे भर भर के।
अगर दूध का रंग दिखलाई दे, तो सफेद चेहरों के भ्रम में मत आना, दूध की जांच अवश्‍य करवाना, उसमें सिंथेटिक दूध भी हो सकता है। जो दिखने और नाम और स्‍वाद में दूध ही होगा, चैनल चाहे कितनी ही सनसनी फैला रहे हों, वे भी जानबूझकर की गई इस गफलत के झांसे में जरूर उलझ जायेंगे। जबकि उसमें बीमारी का घर ही होगा, सफेद रंग में भी बीमारी रह सकती है। इसे आप श्‍वेत खादी वस्‍त्रधारक नेताओं की मिसाल से अच्‍छे से समझ सकते हैं। यह धन थोड़े ही है कि काला है या सफेद, लाभकारी ही होगा।
अन्‍ना हमारे, यह देश देर से आने और जल्‍दी जाने वालों का है, पर यह उसूल सियासत में नहीं चलता है। आपने इन्‍हें चंद दिनों में ही मां की मम्‍मी की याद करा दी है। फिर भी मुझे विश्‍वास है कि आप कामचोरी और इससे उपजी हरामखोरी में तो मुझे नहीं ढूंढ रहे होंगे और न ढूंढेंगे ही। वो तो वैसे भी अब अधिकार बन चुका है। फिर भी एक बात तो बतलाओ अन्‍ना हमारे, आसमान में कितने हैं तारे, क्‍या आप गिन सकते हैं ?

बुधवार, 17 अगस्त 2011

शेयर बाजार की बेपेंदी की लुटिया


शेयर बाजार एक लोटा है। लोटा वही जो लुढ़क लुढ़क जाए। ऐसा लगता है इसकी पेंदी अमेरिका है। पेंदी हटी लुटिया डूबी। डूबने से पहले लुढ़केगी, लुढ़केगी नहीं तो डूबेगी भी नहीं, इसलिए लुटिया के डूबने के लिए लुढ़कना एक अनिवार्य शर्त है। लोटा वही जिसका पेंदा मजबूत हो। बिना पेंदे के लोटे को लुटिया ही कहा जाता है। बेपेंदी का तो बैंगन होता है। बैंगन लोटा नहीं होता, फिर भी थाली में बैठ जाए तो बैठ नहीं पाता है। इधर उधर हिलता हिलहिलाता है। लुटिया लूटती भी है फिर लुढ़कती भी है। लुटिया लुढ़कती है और लोग लुटते हैं।
सेंसेक्‍स एक लोटा था। पर अब लुटिया हो गया है। लुढ़कने से कुछ न कुछ तो बाहर गिर ही जाता है। सदा हरा भरा, भरा भरा नहीं रहता है लोटा। इसकी हरकतें देखकर बिल्‍ली बंदर की पुरानी कथा बंदरबांट वाली याद हो आई, जिसमें बंदर ने पूरी रोटी खाई है। सेंसेक्‍स में भी यही हो रहा है। पर इस नई लोटा कथा में न तराजू है, न बिल्‍ली है, न बंदर है पर जब बंदरबांट हो रही है तो मानना पड़ेगा कि मौजूद होते हुए भी नहीं दिखलाई पड़ रहे हैं ये सब। बंदरबांट सिर्फ सेंसेक्‍स में ही नहीं, सेक्‍स में भी चलती है क्‍योंकि होती है। जितने फर्जी बिल बनते हैं उनमें बांट होती है, उन्‍हें बांटने वाले उन बिलों को बनाने-देने वाले होते हैं। मुझे भी पिछले दिनों एक त‍थाकथित फर्जी झोला छाप होम्‍योपैथ डॉक्‍टर ने ऐसा ही फर्जी बिल थमाया था। कंप्‍यूटर पर छाप कर, मोहर लगाकर टिका दिया। सरकार को भी चूना और सरकार की आम जनता को लोकल दवाईयां बेच बेचकर चूना, बेचने के लिए मदद भी नामी ग्रामी अखबारों और टीवी चैनलों को विज्ञापन बेचने के नाम पर खरीदकर।
शेयर बाजारों में खूब सारे लोटे और लुटियाएं हैं जो कन्‍याओं की तरह लूट रही हैं आम निवेशक को, लुढ़क लुढ़क कर लूट रही हैं। पर जैसे फूटता है घड़ा, इस बार लोटा फूटा है अमेरिका का। घड़ा तो मिट्टी का होता है इसलिए रोज फूटता है, फूट भी रहा है पर लोटा भी फूटेगा यह न किसी ने सोचा क्‍योंकि लोटा धातु का बना होता है। इसलिए कयास यही लगते हैं कि वो लुढ़केगा तो जरूर, पर फूटेगा नहीं। लेकिन इस बार तो लोटा भी फूट गया है, पर अमेरिका का कहना है कि टूटा फूटा नहीं है, पिचका कह सकते हो, पर हम मानेंगे नहीं कि हम पिचके भी हैं। अजीब गरूर है। अमेरिका अपनी इस खामोख्‍याली के लिए मजबूर है। वैसे झंडे हम अपनी मजबूजियत के फहरा रहे हैं, बहाना जो मिल गया है। अमेरिका को अंगूठा दिखाने का, कभी ऊंगली तक न उठा पाए, फिर अंगूठा दिखाने का अवसर कैसे छोड़ सकते हैं।  
घड़ों का निर्माण जितनी तेजी से होता है और वे सस्‍ते मिलते हैं, ऐसा लोटों के मामले में नहीं है। लोटा बनाना, मिट्टटी को गूंथना नहीं है। वहां पर जिस धातु का लोटा बनाना है उस धातु को गलाना  फिर उसके लिए बनाई गई डाई (सांचे) में उसको ढालना आवश्‍यक प्रक्रिया है। पर क्‍या अमेरिका ने लोटे का निर्माण करते समय इतनी बारीकियों पर गौर किया होगा ?

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

दिमाग की आग में जलकर सब राख

खेलों में भारत रत्न पाने के असली दावेदार सुरेश कलमाड़ी हैं। किसी खेल विशेष में न सही, परंतु कॉमनवेल्थ गेम्स आयोजित करवाने में जितनी भ्रष्टता उन्होंने बरती है, उसे एक विश्व कीर्तिमान स्वीकारा गया है। निःसंदेह बिना दावा सबमिट किए असली भारतीय खेल रतन के दावेदार वे ही बनते हैं। अगर यह रत्न अगले पांच वर्षों तक लगातार उन्हें ही दिया जाता रहे, तो भी कम ही है। खेल में खेलकर तो कोई भी रत्न हथिया सकता है, लेकिन बिना खेले सिर्फ आयोजन से जुड़कर रत्न हथियाना, कोई गिल्ली डंडा खेलना नहीं है। खेलों की व्यवस्था के आयोजनपूर्व व्यवस्थाओं में ही खूब सारे घपले- घोटालों का जो कीर्तिमान भोलू कलमाड़ी ने बनाया है, उसका दूर दूर तक कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं दिखलाई देता है। सब इन्हीं का ही बूता है कि घपले भी छोटे छोटे नहीं, विशालकाय और मोटे मोटे। कई हजार और उसमें जुड़े हैं करोड़ भी। इन्हें भोलू क्यों कहा गया है, इस बारे में आपको आगे खुद ही मालूम चल जाएगा।
कलमाड़ी स्मृतिदोष की चपेट में आ गए हैं, इसका यह मतलब मत लगाएं कि उन्हें किसी ने चपेट मारी होगा जिससे वे सब भूल गए होंगे। असल में उनके दिमाग में आग लग गई है और दिमाग की आग को बुझाने के लिए अभी तक फायर ब्रिगेड रूपी किसी यंत्र की खोज नहीं हो पाई है। नारको टेस्ट तो एकमात्र छलावा है। जिस प्रकार महत्वपूर्ण दस्तावेज कार्यालयों की आग की भेंट चढ़ा दिए जाते हैं। इन्होंने अपने दिमाग की याददाश्त को आग की भेंट चढ़ा दिया है और इसी वजह से उनका भूलना उन्हें भोलू कहकर पुकारे जाने के लिए पर्याप्त है। कलमाड़ी की याददाश्त वापिस लाने के लिए जरूरत है डॉक्टरों, ओझाओं, तांत्रिकों, झोलाछाप डॉक्टरी ठगों और मुन्नाभाई स्टाइल के चिकित्सकों की क्योंकि एक ठग ही दूसरे ठग की यादों को सुरक्षित तौर पर लौटा कर वापिस ला सकता है। मुझे तो यह महसूस हो रहा है कि कलमाड़ी ने खुद ही छिपा दी होगी अपनी याददाश्त और शोर मचा दिया कि गुम हो गई है। अब उन्होंने घोषित कर दिया है कि उनके दिल में कुछ-कुछ हो रहा है। दरअसल उनका दिल भी उन्हीं की भाषा बोल रहा है। जहां फायदा मिल रहा है, वहां पर तो उनकी यादें ताजा हैं। घाटे का सौदा महसूस होने पर भूलने का अहसास कुलांचे भरने लगता है। मानो, उसमें झांसी की रानी के चेतक की आत्मा समाई हुई हो। नहीं तो वो भला इतने भोले थोड़े ही है, वे दिमाग के तेज काले घोड़े हैं, उन्होंने इसी कालेपन के पीछे सब कुछ छिपा रखा है। उनकी शिवशक्ति इसी भाले और भोलेपन के कारण बरकरार है।
वैसे भी अपनी याददाश्त को भोलू ने छुट्टा तो छोड़ा नहीं होगा जो वो रास्ता भूल भटक गई। उसके साथ जरूर किसी को भेजा जाना चाहिए था, तिहाड़ में वैसे भी बहुत सारी चीजें होती तो हैं, पर वे नजर नहीं आती हैं। इनमें मोबाइल फोन, सिम कार्ड, चाकू, ब्लेड इत्यादि जब-तब साधारण कैदियों के पास मिल जाते है, तब इनकी बुद्धि (याद) का गुम होना, हैरत में डालता है। जब कलमाड़ी को जेल में बंद किया गया था, तब उसकी याददाश्त को भी तो जेल में बंद किया गया होगा, फिर कहां पर लापरवाही हुई कि जो जरूरी चीज थी, वही गुम हो गई। कलमाड़ी खो गया होता तो इतना हल्ला नहीं मचता। सब ढूंढ तलाश कर चुप हो जाते। भारतीय जेलों में तो अक्सर कैदी बहुत आसानी से खो जाते हैं।
अब यह देखना चाहिए कि जिसकी लापरवाही है, उस पर जुर्माना लगाया जाना चाहिए, उसे बर्खास्त कर देना चाहिए, जेल में डाल देना चाहिए या उसे कह देना चाहिए कि कलमाड़ी जी की याददाश्त को तिहाड़ में से तलाशना, अब तुम्हारी जिम्मेदारी है। चाहे कंप्यूटर में फाइंड लिखकर उसे तकनीक के सहारे तलाशो, पर उसकी यादों को ढूंढकर ले आओ। तुम्हें एक्स्ट्रा इंक्रीमेंट भी देंगे और ईनाम से भी नवाजेंगे। और इससे भी हल न निकले तो एक जांच आयोग का गठन भी किया जा सकता है। भोलू को कैद करने से पहले एक बड़ा सा महाभारत स्टाइल का याददाश्त का प्रदर्शन रिकार्ड करवा लेना चाहिए था और वो इस वक्त और जरूरत के मौसम में बहुत मुफीद रहता। अब सोचना यह है कि इस गाड़ी में कौन सा गियर डाला जाए, जिससे भोलू कलमाड़ी की याददाश्त रिवर्स आए ?

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

शीला के शब्‍दों की जवानी

दिल्ली की सीएम को टारगेट करके दिल्ली के लोकायुक् ने आरोपों की बौछार कर दी है लेकिन उन्होंने बुरा मानते हुए जो सहज बयानी की है वो कितनी सरल है कि उन पर आरोप लगाए जा रहे हैं और वे हंसी-खुशी बिना बुरा माने जवाब दे रही हैं।

आप भी इसका भरपूर जायजा लीजिए। उनकी सोच है कि अगर आरोप लगाने वाले का कर्म आरोप लगाना है तो उनका धर्म लगाए गए आरोपों का उचित जवाब देना है। सकारात्मक सोच की धनी सीएम पर लगाए गए आरोप तो आप अब तक अखबारों में पढ़ ही चुके हैं, उसी संदर्भ में उनकी प्रतिक्रिया पेश है। उनका कहना है कि राजीव रत् योजना के मकान तैयार हैं, फिर मकान खुद तो चलकर रहने वाले गरीब लोगों तक जाने से रहे।

उसमें रहने वालों को खुद चलकर, अपना सामान ढोकर वहां रहने के लिए आना होगा। वैसे हमने गरीबों को अगर मकान बनाकर नहीं दिए तो उन्हें फुटपाथ पर सोने से भी तो मना नहीं किया है, जहां पर उन्हें सोने दिया जा रहा है, उसकी कीमत अगर सोने से भी मापी जाए तो कई किलो में बनेगी, गरीबों की तो भली चलाई, यह सुविधा भिखारियों को भी उपलब् है, इस अधिकार पर दिल्ली की पुलिस भी अमूमन उन्हें तंग नहीं करती है।

जहां तक सपने दिखाने की बात है, वे पूछती है कि गरीबों को सस्ते घर के रस्ते का सपना दिखाना कब से अपराध की श्रेणी में गया है। अब क्या सपने देखने-दिखाने पर भी फांसी दी जाएगी और इसे भी लोकायुक् के अधिकारों के दायरे में लाया जाएगा।

वे आगे बतला रही हैं कि जहां तक विभिन् सभाओं और मीडिया के जरिए सब्जबाग दिखलाने का मामला है, तो यह बिल्कुल झूठ है। पब्लिक ने जरूर सब्जीमंडी में या सब्जी बेचने वालों के पास सब्जियां देख ली होंगी। यह भी हो सकता है कि टीवी पर देख ली हों और वे उन्हें देखकर बाग बाग हो रहे होंगे। इसलिए इन्हें सब्जबाग समझ रहे हैं।

मैंने बाग दिखलाए हैं और सब्जियां, इसलिए यह आरोप तो तथ् से कम से कम 50 किलोमीटर तो दूर ही है। अगर आपको यह पास लग रहा है तो इसमें टीवी का ही दोष है। इसमें मैं दोषी कैसे हुई जबकि दिल्ली सरकार का कोई चैनल ही नहीं है।

लोगों को गुमराह करने की बात पर उनका कहना है कि भला कोई किसी सड़क या रास्ते को गुम कर सकता है। राहों को उठाकर कहीं और छिपा दिया जाए या उन्हें अंगूठी पहनाकर फिल् वाली मिस्टर इंडिया बना दिया जाए। यह जरूर हो सकता है कि जब खूब बरसात हो रही हो तो सड़कें पानी में नहा रही होंगी और लोग सोच रहे होंगे कि सड़कें गुम हो गई हैं या बारिश से बचने के लिए कहीं छिप गई हैं, जबकि वे डूब डूब कर स्नान कर रही होती हैं।

क्या टब स्नान का मजा सिर्फ इंसान को ही लेने का हक है, सड़कें पानी में गोते मार मार कर नहाने का आनंद क्यों नहीं ले सकतीं। वैसे इस मामले में राजनीति हावी है। जिसके चलते कभी भ्रष्टाचार, कभी खेलों में भ्रष्टाचार, कभी काले धन का भ्रष्टाचार, कभी बम फोड़ने में भ्रष्टाचार और अब तो हद हो गई कि मैंने चुनावों में जो वायदे किए उनको भी भ्रष्टाचार बतलाया जा रहा है।

आजकल आम का मौसम है। कच्चा आम बहुतायत में बाजार में मिल रहा है। इस समय यह तो कर नहीं रहे कि दस-पचास किलो कच्चा आम खरीद कर उसका अचार बना लें। सिर्फ भ्रष्टाचार का ही शोर मचा रहे हैं। इस तरह के शोर से पेट नहीं भरा करते। आम का अचार, आम पब्लिक अगर बना ले तो महंगी सब्जियां खरीदने से राहत मिलेगी। अब इसमें कोई यह सोचे कि मेरे आम के बाग हैं, इसलिए मैं आम का अचार बनाने के लिए कह रही हूं तो सोचते रहें, अचार नहीं बनायेंगे तो फिर मौका नहीं मिलेगा और पछतायेंगे। फिर अचार महंगा खरीद कर खाएंगे और मुझे ही दोषी ठहरायेंगे।

देश मुंबई बम कांड के दोषियों की तलाश में लगा है, और ये मेरी कथनी में नुक् निकालने में बिजी हो रहे हैं। इन्हें अब याद आई है। याद आई और एक दम से हमला बोल दिया है। पहले क्या ये होमवर्क कर रहे थे। अगर ये समय से आपत्ति करते तो मैं भी समय से बतला ही देती। जैसे अब बतला रही हूं तो दोष तो इनका ही हुआ श्रीमन्।

लोकायुक् को अन्ना और रामदेव ने थोड़ी सी अहमियत क्या दे दी, वो तो खुद को खुदा समझने लग गए हैं। हर कोई मुंह उठाए वहीं पहुंच रहा है, जबकि आज के माहौल में खुदा भी खुद को खुदा समझने-मानने से परहेज करता है क्योंकि खुदाई का शब् ध्यान में आते ही सड़कों की खुदाई याद आने लगती है। इसे लोगों को याद करानाउनके पीले जख्मों को हरा करना और टाइट जख्मों को पिलपिला करना है, जिससे उसमें मवाद का अहसास होता रहे और जहां मवाद होगा, वहां दर्द तो होगा ही पर यह दर्द कड़वा तीखा नहीं, मीठा मीठा ही है, शहद नहीं तो क्या हुआ, नमकीन भी तो नहीं है।

फिर क्यों लोकायुक् चिंतित हो रहे हैं ?

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

सावन के हिंडोले में बयानबम

कांग्रेस महासचिव के बयानों को सुनकर कांग्रेस के दिग्‍गज हैरान-परेशान नहीं हैं बल्कि वे सोच रहे हैं कि इसका कैसे पार्टी के हित में बेहतर इस्‍तेमाल किया जा सकता है। इस बारे में फैसला करने के लिए गुप्‍त बैठकें, सुप्‍त समय में की जा रही हैं। इन महाशय की ख्‍याति आजकल बयानबम के तौर पर हो गई है। बम जो दूसरों के फोड़ने पर फटता है, खुद से तो खुद का फोड़ा नहीं फोड़ा जाता है, उसके लिए भी डॉक्‍टर की बाट जोहते हैं। दर्द जानबूझकर कोई नहीं सींचता है, क्‍योंकि इससे दर्द की आहों में भी दर्द की अभिव्‍यक्ति होने लगती है। दर्द तब तक ही अच्‍छा लगता है जब तक दूसरे के हो रहा हो। बम भी तब तक ही भाता है, जब तक फूटता नहीं है या फूटता भी है तो उससे नुकसान सामने वाले को होता है। पर वो सामने वाला ही होना चाहिए, सामने वाली नहीं। सामने वाली के प्रति तो सबके मन में विनम्र भाव ही रहता है। विनम्र भाव तो पड़ोस वाली के साथ भी पूरा रहता है।
बयानबम की खासियत है कि धमाका भी हो जाता है, सुर्खियां भी मिल जाती हैं, फोटू भी छप जाती है, निंदा भी होती है, इस निंदा से बहुतेरों की तो निद्रा खुल जाती है। कई बार निद्रा आती ही नहीं है। बयान को बम बनाने वालों और निद्रा का तो सदा से बैर रहा है। निद्रा आ गई तो बयान का बम नहीं बनेगा या बनेगा भी देर से बनेगा। यहां पर देर आयद दुरुस्‍त आयद का सिद्धांत लाभकारी नहीं होता है। यहां पर तो समय से पहले या बिल्‍कुल समय पर ब्‍यान का फटना जरूरी है। उसके लिए बम बनने के उपयुक्‍त पात्र की तलाश करनी होती है। कौन बयान का बकरा बनेगा, जो शहीद होने को तैयार हो। यहां पर तो अनेक तैयार हो जाते हैं।
बयानबम जारी करने से पहले थोड़ी सी सुरक्षा ही तो कड़ी करनी होती है, या खुद ही हाथापाई के लिए तैयार रहो।  वो खर्च सरकार का और चर्चा का लाभ पार्टी को। बाबा भी बयानबम बनने से बच नहीं पाए हैं। इसका लाभ बाबा को मिलता है या बाबा के प्रशंसकों को, इस बारे में अभी नतीजे सामने नहीं आए हैं। बयानबम से खुद की तो फजीहत होती ही है। ब्‍यान क्‍योंकि बम है, उस बम को उगलना पड़ता है। दिमाग का इसमें इस्‍तेमाल वर्जित बतलाया गया है। वैसे इस पर बददिमाग या बेदिमाग वालों का कब्‍जा रहता है। इसका फायदा उठाने के लिए बेसिर, पैर की कल्‍पनाएं करनी होती हैं, अपनी बुद्धि को इस मुगालते में रखना पड़ता है कि मान लो आज होली है और भी अधिक लाभ लेने के लिए आज मूर्ख दिवस है और मुझे मूर्ख दिवस पर सर्वाधिक मूर्खता प्रदर्शित करनी है।
पहले बयानबम के बहुत फायदे हुआ करते थे, बम फोड़ा और मुकर गए। परंतु आजकल सीसीटीवी, कैमरे, लाइव प्रसारण के कारण कहे से मुकरना पॉसीबल नहीं होता है। पहले ऐसे जोखिम नहीं थे, तब कह दिया जाता था कि मैंने तो ऐसा नहीं कहा था। अब कहते हैं कि मेरा ऐसा करने का आशय वो नहीं है, जो आप समझ रहे हैं। मतलब आप नासमझ हैं, लेकिन यह तो बिना कहे ही समझ में आ जाता है।
नेता थोड़ा और बेशर्म हो जाए तो कुछ भी सफाई देने की जरूरत नहीं है। पार्टी खुद ही भुगतती रहेगी। करे कोई और भरे कोई और उसमें डूबकर मरे कोई तीसरा।  मतलब कत्‍ल करे राम लाल, फांसी पाए श्‍याम लाल और दौड़ लगाए लोकपाल।  आजकल फांसी का तो मौसम ही नहीं है। कसाब का किस्‍सा सब जानते हैं। सभी इलीजिबिलिटी के होते हुए भी उसे फांसी नहीं, जो जिसको मिलना चाहिए, वो उसको नहीं देंगे। उसके बदले उसे घनघोर सुरक्षा और प्रदान कर देंगे। इसे ही गंदी राजनीति या राजनीति को खेल बनाना कहा गया है। यह कानूनों का मजाक बनाना भी है।
सावन आया है और दिग्‍गी झूल रहे हैं अपने बयानों के झूले में। अब झूले बयान ही हैं। बयान दे दिया है, सावन है झूलते रहिए। जीभ का रंग काला है, इसका विवेचन करते रहिए, इसलिए तो ब्‍लैक झंडे, संडे को दिखलाए गए, सियासत की रोटियां खूब सेकी जा रही हैं जिससे वे भी जलकर काली हो जाएं।

रविवार, 3 अप्रैल 2011

वेबकुल्फियों की चुस्कियां : मूर्ख दिवस की देरीय प्रस्‍तुति

मूर्ख दिवस के दिन मैं मूर्ख हाज़िर हूँअपनी वेबकुल्फियों के साथ। इन वेबकुल्फियों का नायाब आइडिया मेरा है और मैं इस मूर्खता के लिए पहली बार अपना नया प्रॉडक्‍ट नए नए शब्‍दों के बाज़ार में पेश कर रहा हूँ। इसके बाद मैं इस प्रॉडक्‍ट को सिक्‍योर करने के लिए कार्रवाई करूँगा। अरे, सिक्‍योर करना मतलब पेटेंट हासिल करना। इस बहाने मैं अमेरिका की सैर भी कर आऊँगा क्‍योंकि मुझे पूरी जानकारी है कि किसी भी प्रॉडक्‍ट को पेटेंट कराने के लिए अमेरिका जाना ज़रूरी है। जब मैं वहाँ पर जाऊँगा तो प्रेसीडेंट बराक ओबामा से मिलकर उनके साथ फोटो भी खिंचवा कर आऊँगा। अप्रैल माह का पहला दिन और इस दिन मूर्खताएँ आजकल खुलकर सुर्खियों में सामने आ रही हैं। यह खुलकर सामने आना हाईटेक होना है। मूर्खताओं का हाईटेकीय स्‍वरूप वेब पर कुल्फियों के रूप में दिखलाई दे रहा है। वेबकूफी यानी वेब की कुल्‍फी, जिस प्रकार दूध मलाई केसर की ठंडी कुल्‍फी गर्म मौसम में ठंडक के साथ ही ज़ायक़ेदार लगती है, बशर्ते कि उसमें इस्‍तेमाल किया गया दूध हाईटेक यानी सिंथेटिक दूध न हो, वो स्‍वास्‍थ्‍य के लिए भी परम लाभकारी रहती है। वेबकुल्फियों के इस नए दौर में ब्‍लॉगों, ख़ासकर हिन्‍दी ब्‍लॉगों पर ऐसी कुल्फियों का चलन बेशुमार है। इनकी तेज रफ्तार है। जल्‍दी ही बनने-बढ़ने वाला हिन्‍दी ब्‍लॉग का व्‍यापार है। व्‍यापार यानी बाज़ार। बाज़ार जो न कर गुज़रवाये वो थोड़ा है। हिन्‍दी ब्‍लॉग गधा नहीं, घोड़ा है। घोड़े सी तेज़ रफ़्तारयुक्‍त विचारों की दौड़, सिर्फ़ इसी माध्‍यम पर निरंकुश स्‍वरूप में संभव है।
आज मूर्खता को छिपाया नहीं, बतलाया जाता है और बतलाने के लिए ब्‍लॉग से बेहतर माध्‍यम और कोई नहीं है। इससे पहले आप मूर्खता करते थे तो लालकिले पर महामूर्ख की पदवी से सम्‍मानित होने का इंतज़ार करते थे और वो सदा इंतज़ार ही रहता था और आप दुनिया से भी सिधार जाते थे क्‍योंकि वहाँ तक मूर्ख लोगों की पहुँच ही नहीं थी। मैंने खुद काफी सोचा परंतु कामयाबी तो तब मिलती, जब उसमें शामिल हो पाता। आज तक मुझे महामूर्ख सम्‍मेलन में शामिल होने तक का आमंत्रण नहीं मिला तो उसमें विजेता बनने का भाग्‍य कैसे बनता ?  मुझे नहीं लगता कि ऐसा सौभाग्‍य इस जन्‍म में मुझे मिलेगा लेकिन अब तो मुझे चाह भी नहीं है कि मैं आज हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में मूर्खों का बादशाह हूँ। अब मुझे वहाँ की मूर्खतायुक्‍तपद्मश्री का किसी होली तक या मूर्ख दिवस तक इंतज़ार नहीं है क्‍योंकि आज पूरा वेबजगत मेरे सामने मौज़ूद है। जहाँ पर मैं अपनी मूर्खताओं का डंका बजा सकता हूँ, ढोल पीट सकता हूँ, इतने पर भी मुझे कोई नहीं पीटेगा क्‍योंकि मैं रियल होने के साथ-साथ वर्चुअल भी हूँ और कोई मुझसे इस संबंध में प्रमाण पत्र भी नहीं माँगेगा। आज मुझे कोई रोक नहीं सकता, टोक नहीं सकता क्‍योंकि मैं मूर्ख1008श्री हूँ तथा स्‍वयं ही यहाँ पर संपादक, प्रकाशक और मुद्रक हूँ। मेरी मूर्खताओं के साझीदार बनने के लिए, करोड़ों देशी-विदेशी फेसबुकिए, ऑर्कुटिए, ट्विटिरिये जैसी साइटों के पाठक मौजूद हैं, इसलिए मैं अपनी मूर्खता में भी आज ख़ूब प्रसन्‍न हूँ, अपने जबड़े में जमे दाँतों से खिलखिला रहा हूँ, आप इसे दाँत फाड़ना भी कह सकते हैं। जबकि चाहे नकली भी हैं, तब भी मेरे थोबड़े के जबड़े में मज़बूती से फँसे हैं, कितना ही हँसू, बाहर नहीं गिरेंगे।  
आज मूर्खताओं को उपलब्धि बतलाकर ज़ाहिर करने का जज्‍बा वेबमाध्‍यम पर उपलब्‍ध है। मूर्खता को बतलाने के लिए आया यह विकास सकारात्‍मक है। मतलब ग़लती से खुद तो सबक लेना ही, दूसरों को भी लेने के लिए उत्‍साहित करना, दूसरे जो मेरे नितांत अपने हैं। जो ग़लती नहीं करता है वो इसे पढ़ कर सतर्क हो जाता है ताकि मूर्खता करने से बचा रहे। ब्‍लॉगों के प्रचार-प्रसार से इस प्रवृति में तेज़ी दिखलाई दे रही है। पहले ऐसी घटनाएँ-दुर्घटनाएँ दबी, ढकी, छिपी रहती थीं पर अब भरपूर आलोक बिखेरती हैं। पहले सिर्फ़ एक दिन मूर्ख दिवस पर या एक और दिन होली के दिन, लालकिले के सामने महामूर्ख सम्‍मेलन करके इतिश्री कर ली जाती है। परंतु अब ऐसा नहीं है। अब तो रोज़ आप अपने ब्‍लॉग पर महामूर्ख ही नहीं, विश्‍व महामूर्खता सम्‍मेलन कर सकते हैं। आज की मूर्खताएँ ख्‍याति भी दिला रही हैं। ब्‍लॉगों पर व्‍यक्त अनुभूतियाँ, अभिव्‍यक्तियाँ बन कर प्रचार दिला रही हैं। जो कि सिर्फ़ पोस्‍टों, टिप्‍पणियों ही नहीं, परिचर्चाओं के रूप में भी जलवा बिखेर रही हैं। हिन्‍दी ब्‍लॉगों पर पूरे विश्‍व में पाठकों का इज़ाफ़ा हुआ है। इसके माध्‍यम से लिखने की प्रवृति तेज़ी से बढ़ी है, जो कि समाज के चारित्रिक मूल्‍यों का विकास कर रही है।
ब्‍लॉग लेखकों की, टिप्‍पणीकर्ता की नई लेखक प्रजाति आपस में विश्‍वास को जन्‍म दे चुकी है। दो ब्‍लॉगर मिलें और विश्‍वास न करें – ऐसा पॉसीबल नहीं है। मैंने कई ब्‍लॉगर मिलन/सम्‍मेलनों का राजधानी दिल्‍ली, जयपुर, आगरा, मुंबई, मेरठ जैसे नगरों-महानगरों में आयोजन किया है और मुझे अपनी इन मूर्खताओं पर घमंड है, घमंडी हो गया हूँ मैं। इन आयोजनों की ख़ासियत रही है कि ऐसे अधिकतर आयोजन किसी न किसी हिन्‍दी ब्‍लॉगर के घर पर ही सफलतापूर्वक आयोजित कर लिए जाते हैं, और यह पाया है कि जिस शहर में ब्‍लॉगर सम्‍मेलन में जाना हो तो वहाँ के ब्‍लॉगर, अन्‍य ब्‍लॉगरों को अपने निवास पर नि:संकोच ठहराने का मूर्खतापूर्ण कार्य पूरी ईमानदारी से करते हैं।
इसी प्रकार मैं भी ऐसी मूर्खताओं के लिए सदैव तैयार रहता हूँ, बशर्ते कि मैं ख़ुद ही शहर से बाहर न होऊँ। हिन्‍दी ब्‍लॉगर नेक हैं, अनेक हैं, पर सदा एक रहेंगे। अभी इस पाँचवें मज़बूत खंबे पर आतंकवादियों, घुसपैठियों, चोरों, डकैतों, असामाजिक तत्‍वों, स्‍मगलरों इत्‍यादि की नज़र नहीं पड़ी है क्‍योंकि अगर उनकी निगाह में यह माध्‍यम आ गया, तो यह तय है कि वे निश्‍चय ही अपने कुकर्मों से तौबा कर लेंगे और समाज में उनके सुधरने से सकारात्‍मक बदलाव दिखाई देंगे।
इस प्रकार मूर्ख दिवस आज नई वजहों को लेकर सुर्खियों में है और यह सुर्खियाँ आह्लादित करती हैं। मूर्खताएँ यानी वेबकुल्फियाँ हिन्‍दी ब्‍लॉगों के ज़रिए सीख दे रही हैं। किसी ने कल्‍पना भी नहीं की होगी, जो आज हकीकत है। आज हिन्‍दी ब्‍लॉगों पर मूर्ख दिवस से पहले ही चर्चा-परिचर्चाएँ शुरू हो जाती हैं, इन पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ वास्‍तव में सुखद हैं। आज आप जैसा उन्‍माद क्रिकेट को लेकर देख रहे हैं, वही दीवानापन हिन्‍दी ब्‍लॉगों के संबंध में क़ायम होने वाला है, जिसके सकारात्‍मक नतीज़े सिर्फ़ इस दशक के पूरा होने पर अपने शिखर पर क़ायम देखेंगे और सबको अपनी ओर पूरी शिद्दत से आकर्षित करेंगे।
सृजनगाथा

सोमवार, 7 मार्च 2011

धक धक बजट