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हास्य जीवन का अनमोल तोहफा    ====> हास्य जीवन का प्रभात है, शीतकाल की मधुर धूप है तो ग्रीष्म की तपती दुपहरी में सघन छाया। इससे आप तो आनंद पाते ही हैं दूसरों को भी आनंदित करते हैं।

हँसे और बीमारी दूर भगाये====>आज के इस तनावपूर्ण वातावरण में व्यक्ति अपनी मुस्कुराहट को भूलता जा रहा है और उच्च रक्तचाप, शुगर, माइग्रेन, हिस्टीरिया, पागलपन, डिप्रेशन आदि बहुत सी बीमारियों को निमंत्रण दे रहा है।

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मंगलवार, 29 नवंबर 2011

तबीब कसाई हो गए? (व्यंग गीत ।)




तबीब  कसाई   हो   गए? (व्यंग गीत ।)



चेहरे    की   चमक,   तेरी  जेब   की  खनक,

सब   कुछ  देखो,  हवा  -  हवाई   हो   गए..!!

मुफ़्त   में   तबीब   ये  बदनाम   हो    गए  ?

जब   से   तबीब, इलीस  कसाई   हो   गए ?  

इलीस =  धर्म  मार्ग  से  भ्रष्ट, शैतान )


  अंतरा-१.


इन्सानियत   की   तो,   ऐसी   की   तैसी..!!

साँठ - गाँठ   है   ज़िंदा,   वैसे    की   वैसी..!!

नेता - बीमा - लेब,  सब  लुगाई   हो   गए..!!

जब  से   तबीब, इलीस  कसाई   हो   गए ?  




अंतरा-२.


कौन    अंग   दायाँ,  कौन   सा   है    बायाँ..!!

कौन    यहाँ     बच्चा,   कौन    यहाँ    बुढ़ा..!!

हाड़ - मांस    पिघल   के,  दवाई   हो   गए..!!

जब   से   तबीब,  इलीस  कसाई   हो   गए ?  


अंतरा-३.



कहाँ    है    ग़रीबी,  कहाँ   के   तुम  ग़रीब..!!

गुर्दे की  क़िमत  सुन, खुल  जाएगा नसीब..!!

बदन  -  दवा   -  दारू,   महँगाई   हो   गए..!!

जब   से   तबीब,  इलीस  कसाई   हो   गए ?   


(गुर्दा = कीडनी)



अंतरा-४.


कहाँ   के   ये   ईश्वर,  कहाँ   के   ये   गोड़..!!

ऐंठे  -  जीते  -  मरते,   है   सब   गठजोड़..!!

अस्पताल    सोने   की    खुदाई   हो  गए..!!

जब   से   तबीब, इलीस  कसाई   हो   गए ?   


अंतरा-५.


तुलसी  -  हलदी  -  हरडे,  अनर्थ  हो   गए..!!

ग्रंथ    ये    पुराने,  सब    व्यर्थ    हो   गए..!!

माँ   के   सारे    नुस्खे    दंगाई   हो   गए..!!   


तब  से  तबीब, इलीस  कसाई  हो  गए ?

(दंगाई =  उपद्रवकारी)

मार्कण्ड दवे । दिनांक - २७ -११ - २०११. 

शनिवार, 26 नवंबर 2011

ख़ुदगरज लीडर । (व्यंग गीत ।)







ख़ुदगरज  लीडर । (व्यंग गीत ।)


ख़ुद    से   भी  ख़ुदगरज  होते  हैं  लीडर ।

ख़ुद   को   ही  ख़ुदा  समझते   हैं   चीटर ।


अंतरा-१.


धन - दौलत  के  चंद  टूकड़ों   की  ख़ातिर,

हर   पल  ज़मीर   से   झगड़ते   हैं   लीडर ।

ख़ुद   को   ही  ख़ुदा  समझते   हैं   चीटर ।


अंतरा-२.


जन्नत  हथिया  कर, ईमान  दफ़ना  कर, 

जन्नत को जहन्नुम,  बदलते   हैं  लीडर ।

ख़ुद   को   ही  ख़ुदा  समझते   हैं   चीटर ।


अंतरा-३.


मर कर  जी  रहे  हम, जी लिया अब जी भर,

लहू     लोगों    का    खूब   पीते   हैं  लीडर ।

ख़ुद   को   ही   ख़ुदा   समझते   हैं   चीटर ।



अंतरा-४.



रूहें   दबा   कर,  जिस्मों   को  कूचल  कर,

तिजारत,   लाशों    की    करते   हैं   लीडर ।

ख़ुद   को   ही   ख़ुदा   समझते   हैं   चीटर ।

(तिजारत=व्यापार)


अंतरा-५.


ख़ुदा   को    ख़तावार, खुलेआम  कह  कर, 

ख़ुदा    से    भी   बदला   लेते   हैं   लीडर ।

ख़ुद   को   ही  ख़ुदा  समझते   हैं   चीटर ।


ख़ुद    से   भी   ख़ुदगरज  होते  हैं  लीडर ।

ख़ुद   को   ही   ख़ुदा  समझते   हैं   चीटर ।


मार्कण्ड दवे । दिनांक-२६-११-२०११.

रविवार, 23 अक्टूबर 2011

भ्रष्ट-व्यंग-दोहे ।





भ्रष्ट-व्यंग-दोहे ।


आज के हालात के अनुरूप, यथार्थ, भ्रष्टाचारी-व्यंगात्मक दोहे. .!!

(१)


* आदरणीय श्रीअण्णाजीके दल में घूसे हुए, तकसाधुओं को समर्पित...!!


अण्णा अण्णा सब जपे, देखत है सब ताल,

मौका जिसको जब मिले, एंठत है सब माल ।


(२)


* जेल के बजाय आज भी, जो नेता महलमें एश कर रहे हैं, उनको समर्पित..!!


भ्रष्टाचारी मत कहो, लेता कभी - कभार,

बकते हैं जो बकबकें, भरता उदर अपार ।


(३)


* भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलन कर रहे, कार्यकर्ता पर, हिंसक हमला करनेवालों को समर्पित..!!


बजरंग तो बदल गए, कलयुग गयो समाय,

लंकादहन को भूल ये, अवध को ही जलाय ।


(४)


* पार्टी फंड एंठनेवाले, राष्ट्रिय पक्षों के शिर्षस्थ नेताओं को समर्पित..!!


उजला - काला सब किया, कछु न दरद मन जान,

परम-धरम तो नक़द है, घूसखोरी करम सुजान ।


(५)


* ग़रीब जनता का लहु पीनेवाले, सभी राजनेताओं को समर्पित..!!


धन - दौलत की लत लगी, पूजत है दिन रात,

नेता बेचारा क्या करें, बिनु मांगे मिल जात ।


(६)


* हरदम दंभी प्रामाणिकता का राग रटनेवाले, सभी लोगों को समर्पित..!!


धन को काला मान के, जनता बहुत पीड़ाय,

सुख तो नेता-घर बसे, बैठा अलख जगाय ।


(७)


* जेल में बैठ कर, बिना ड़रे, मौज उड़ा रहे, सभी भ्रष्टाचारीओं को समर्पित..!!


लक्ष्मी की नाराजगी, घर खाली कर जाय,

भ्रष्टाचारी ना डरे, सब कुछ अपहर जाय ।


(८)

चुनाव के वक़्त घर बैठ कर, वोटिंग न करनेवाले, सभी नागरिको कों समर्पित..!!


टेबल - टेबल घूम के, बांटो तुम परसाद,

बच्चें भूखों जब मरे, मत करना अवसाद ।

(अवसाद = विषाद)


मार्कण्ड दवे । दिनांक- २१-१०-२०११.

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शनिवार, 24 सितंबर 2011

पत्नी..!!




(Courtesy Google images)

पत्नी..!!


प्रिय मित्र,

एक बार, एक पति देव से किसी ने सवाल किया,"पति-पत्नी के बीच विवाह - विच्छेद होने की प्रमुख वजह क्या है?"

विवाहित जीवन से त्रस्त पति ने कहा,"शादी..!!"

हमें तो इनका जवाब शत-प्रतिशत सही लगता है.!!

पति आजीवन ऐसी गलतफ़हमी में जीता है कि, मेरी पत्नी, मेरे उन ख्याल के अनुरूप, बानी-व्यवहार अपना कर,सहजीवनका सच्चा धर्म निभा रही है..!!

पर, सत्य हकीक़त यही होती है कि, विवाह के पश्चात, पति देव के ख्यालात आहिस्ता-आहिस्ता कब बदल कर पत्नी के रंग में रंग जाते हैं,पता ही नहीं चलता..!!

 हालाँकि, पति देव के मुकाबले, जगत की सभी पत्नीओं की, छठी इंद्रिय (sixth sense) बचपन से ही, जाग्रत होने की वजह से, वह ये बात अच्छी तरह जानती हैं कि, विवाहित जीवन सुखद बनाने के लिए, पति को समझने में ज्यादा समय व्यतित करना चाहिए और  उसे प्यार करने में कम से कम..!!

इसी तरह, पति देव भी, अपने नर-प्राणी होने की गुरूताग्रंथी से ग्रसित होकर, शादी के बाद थोड़े ही दिनों में समझ जाता है कि, विवाहित जीवन सुखद बिताने के लिए, पत्नी को प्रेम करने का दिखावा करने में ज्यादा समय देना चाहिए और उसे समझने के लिए कम से कम..!! (जिसे बनाने के बाद, खुद ईश्वर आजतक समझ न पाया हो, उसे कोई पति क्या ख़ाक समझ पाएगा?)

इसीलिए,ऐसा कहा जाता है कि, जीवन में दो बार आदमी, औरत को समझ नहीं पता,(१) शादी से पहले (२)शादी के बाद..!!

पत्नी को समझने में अपना दिमाग ज्यादा खर्च न करने के कारण ही, विवाहित पुरूष,किसी कुँवारे मर्द के मुकाबले ज्यादा लंबी आयु बिताते है, ये बात और है कि, विवाह करने के बाद, ज्यादातर पति देव (मर्द) लंबी आयु भुगतने के लिए राज़ी नहीं होते..!! 

 सन-१९६०-७० के दशक तक तो, भारत के कई प्रांत में,घर के मुखिया की पसंद के आगे, नतमस्तक होकर, हाँ-ना कुछ कहे बिना ही विवाह करने का रिवाज़ अमल में था । हालाँकि, ऐसे रिवाज़ के चलते कई पति-पत्नी आज भी मन ही मन अपना जीवन, किसी बेढंगी बैलगाडी की रफ़्तार से, मजबूर होकर, बेमन से संबंध निभा रहे होंगे..!!

मुझे सन-१९५८ का एक,ऐसा ही किस्सा याद आ रहा है, हमारे गुजरात के एक गाँव में, किसी कन्या को देखने के लिए गए हुए,एक युवक और उसके माता पिता को, भोजन का समय होते ही, कन्या के माता-पिता ने, मेहमानों को भोजन ग्रहण करने के लिए प्रेमपूर्वक आग्रह किया, जिसे मेहमान ठुकरा न सके । उधर  कन्या के परिवार को लगा कि, विवाह के लिए सब राज़ी है,तभी तो हमारे घर का भोजन मेहमानोंने ग्रहण किया है..!! अतः विवाह वांच्छूक युवक की झूठी थाली में, उस कन्या को उसकी माता ने भोजन परोसा । मारे शर्म के कन्या ने, अपने होनेवाले पति का झूठा  भोजन ग्रहण किया..!! हिंदु शास्त्र की मान्यता के अनुसार, जो कन्या ऐसे समय किसी युवक का झूठा खा लेती हैं तो, वह दोनों विवाह के लिए राज़ी है ऐसा माना जाता है । 

हालाँकि,बाद में पता चला कि, कन्या का वर्ण  श्याम होने के कारण, युवक इस कन्या से विवाह करने को राज़ी न था, पर परिवार के मुखिया के दबाव में आकर, उस युवक को अंत में, उसी कन्या से शादी करनी पड़ी..!!

आज भी ऐसी मान्यता है कि,"शादी-ब्याह, ईश्वर के यहाँ, पहले से तय हो जाते हैं । हम तो सिर्फ निमित्तमात्र है ।"

हमारे देश में मनोरंजन के नाम पर, प्रसारित हो रही करीब-करीब सारी सिरियल्स में, परिवार की किसी एक बहु को `वॅम्प-अनिष्ट`के रूप में पेश करके, कथा को रोचक बनाने के मसाले कूटे जाते हैं, यह देखकर मैं सोचता हूँ, ये सारे चेनल्सवाले,किसी भी नारी को इतना ख़राब क्यों दर्शाते हैं? हालाँकि,कर्कशा पत्नीओं की कलयुगी कहानी कोई नयी बात नहीं है, राम राज्य में भी कैकेयी-मंथरा की जुगलबंदीने, राजा दशरथ को सचमुच खटीया (मृत्युशैया) पकड़ने पर मजबूर करके, राजा  की खटीया खड़ी कर दी थी । इसी प्रकार महाभारत का भीषण युद्ध भी इर्षालु कर्कशा पत्नीओं के कारण ही हुआ था..!!

महान आयरिश नाट्य कार, जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ( George Bernard Shaw 26 July 1856 – 2 November 1950) कहते हैं कि," जिसकी पत्नी कर्कशा-झगड़ालू होती है, उसका पति बहुत अच्छा कवि-चिंतक-विवेचक-नाट्य कार बन सकता है..!! (इस श्रेणी में, मुझे मत गिनना, मैं अपवाद हूँ..!!)

एकबार, एक कंपनी की ऑफ़िस में, काम से सिलसिले से मैं गया । वहाँ दोपहर की चाय-पानी का विराम काल था और कंपनी  के आला अधिकारी के साथ पूरा स्टाफ मौजूद था, ऐसे में किसी बात पर स्टाफ के एक मेम्बर ने कबूल कर लिया कि, घर में उसकी पत्नी का राज है और वह अपनी पत्नी का चरण दास है..!! फिर तो क्या था..!! जैसे अपने मन में भरे पड़े, दबाव से सब लोग छुटकारा चाहते हो, धीरे-धीरे सब स्टाफ मेम्बर्स ने कबूल किया कि, वे सब पत्नी के चरण दास है और पत्नी के आगे उनकी एक नहीं चलती..!! बाद में, सारे स्टाफ मेम्बर्स चेहरे पर मैंने,`शेठ ब्रधर्स का हाजसोल चूरन` लेने के बाद हल्के होने के भाव को उभरते देखा..!! 

कर्कशा पत्नी को सुधारने का सही उपाय शायद यही है कि, आप पूर्ण निष्ठा भाव से, उनके चरण दास बन जाइए, बाकी सबकुछ अपने आप ठीक हो जाएगा? अगर कुछ  ठीक नहीं भी हो पाया तो, कम से कम, घर का माहौल ज्यादा बिगाड़ने से तो बच ही जाएगा..!! वर्ना..किसी रोज़ घरेलू हिंसा के, तरकटी मुक़द्दमों में फँस कर, पुलिसस्टेशन - कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने शुरू हो सकते हैं?

एक आखिरी नसिहत,आदरणीय श्री संजीव कुमार, विद्यासिन्हा की फिल्म,"पति-पत्नी और वोह" वाली `वोह` के चक्कर में कभी मत पड़ना, वर्ना आप को भी, रात-दिन ठंडे-ठंडे पानी से नहाने के दिन गुज़ारने का समय आ सकता है..!!

वैसे, आज आप भी, अपने सिर पर हाथ रखकर, कसम दोहरायें कि,

"मैं जो कहूँगा सच कहूँगा और सच के अलावा कुछ न कहूँगा..!!"

" क्या आप भी चरण दास हैं?"

"अरे..!! हँसना मना है, भाई..!!"


मार्कण्ड दवे । दिनांक- २०-०४-२०११.

रविवार, 4 सितंबर 2011

कौभांडी नेतागण - सेक्स समस्या.©




(courtesy-Google images)

" हमको अगर कोई छेड़ेगा तो हम छोड़ेगें नहीं ।"

योगगुरु बाबा रामदेवजी उवाच..!!

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प्रिय मित्र,

यह लेख काल्पनिक है ।

साम्यता योगानुयोग है ।

इसका हाल की घटनाओं से कोई लेनादेना नहीं है ।
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मगध के राजा धननंद के दरबार में, ऋषिवर चणक के युवा पुत्र विष्णुगुप्तने अपने राजा को, उनके शासन में प्रवर्तमान भ्रष्टाचार और भ्रष्ट अधिकारीओंके बारे में जानकारी दी, तब विष्णुगुप्त की यह बात राजा धननंद के मन को रास न आयी. राजा को यह बात में अपना अपमान भाव महसूस हुआ और उन्होंने अपने सेनापति को आदेश देकर विष्णुगुप्त को अपने राज्य की सर हद के पार फेंकवा दिया ।

राजा के इस कृत्यसे आहत विष्णुगुप्त तक्षशिला जाकर विद्यार्थीओं को अर्थ शास्त्र पढ़ाने लगे और चाणक्य के नाम से प्रसिद्ध हुए । इधर विलासी राजा धननंदके भ्रष्ट शासन से जनता त्रस्त हो गई, तब चाण्क्यने चंद्रगुप्त की सहायता से मगध में राजा धननंद से सत्ता छीन ली और प्रजा को सुशासन व्यवस्था कैसी होती है, यह बात का परिचय करवाया ।

शायद आज के भारत वर्ष में यही परिस्थिति का फिर से निर्माण हुआ है । रोज़ नये नये भ्रष्टाचार के मामले सामने आ रहे हैं और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठानेवालोंकी आवाज़ दबाने के लिए दिल्ली के आका के इशारे पर , संत, साधु और पत्रकारों से लेकर स्वच्छ अधिकारीओंको जिंदा जलाने तक के जघन्य कृत्य को अंजाम दी ये जा रहे है ।

आयकर अधिकारी- "सर योगगुरू बाबा रावणदेव का क्या करें?"

नेताजी -" अरे..,यार,फेमा-ईडी किसी को भी लगा दो पिछे..!!"

पी-पीदम्बरम-" वो नन्ना हजारेने मुझे लबाड-लुच्चा कहा?पुलिस केस ठोक दो उस पर..!!"

जनता-" अरे भाई..!! ये क्या हो रहा है?सब को नोटिस पर नोटिस भेजी जा रही है?संसद की अवमानना की शिकायत दर्ज हो रही है? मिडिया को धमकाया जा रहा है? क्या है,ये सब? अब किसी को कुछ बोलने पर भी पाबंदी आ गई है क्या? "

दोस्तों, अब आप ऐसे हास्यास्पद बातों का क्या करें । सारे नेतागण करीब करीब करोड़पति हैं, ऐसे में सावन के अंधे को सारी कायनात हरी देखना स्वाभाविक बात है ।

यह सब देखकर मेरे मन में एक सवाल उठा ।

* अगर नेताजी को जनता की भ्रष्टाचार निर्मूलन की बातें,अगर इतनी ही कड़वी लगती हैं, तो फिर मीड टर्म चुनाव के मैदान में जनता से दो-दो हाथ ही क्यों नहीं कर लेते हैं ?

मेरे मित्र ने इस सवाल का उत्तर दिया की," ये अभी भ्रष्टाचार में पकड़े गये सभी नेतागण को तनाव की वजह से सेक्स समस्या सताती है और वह सब योगासन के द्वारा सेक्स क्षमता वापस पाना चाहते हैं ।

यह उत्तर पाकर, मेरे मन में यह विचार आया, अगर ये भ्रष्ट नेता बाबा जी के पास अपनी सेक्स समस्या लेकर जाते तब यह सब पे गुस्साए बाबा जी उनको कौन सा उपाय बताते?

उपाय काल्पनिक है, फिर भी आप सुनिए ।

बाबा जी - " बताइए नेताजी, आप तो वही एस-बेन्ड वाले इसरो के, दो लाख करोड़ कौभांड वाले हैं ना? आप को क्या समस्या है?"

नेताजी -१," बाबा जी, मेरी सेक्स लाइफ़ समाप्त हो चली है, मानो सभी अंग पर तालें लग गये हैं, मैं क्या करुं?"

बाबा जी -" समझ लीजिए आपको अपनी ही तपास समिति के अध्यक्ष बना दिये गये हैं, अब आप अपने दोनों पैर फैला के, अपना सर नीचे कर के अपना ताला खुद खोलने का योगाभास कीजिए,सब ठीक हो जायेगा । चलो नेक्स्ट?"

नेताजी - २," बाबा जी मैं कोलाबा की आदर्श सोसाइटी कौभांडवाला, मुझे पहचाना?"

बाबा जी - " परिचय बाद में । समय कम है, समस्या क्या है?"

नेताजी -२," बाबा जी, दूसरों के मुकाबले मैं जल्दी क्लाईमेक्स पर पहुंच गया । देश-विदेश के दूसरे भ्रष्ट लोगों का वीडियो देखकर मैं लधुता का अनुभव कर रहा हूँ ।"

बाबा जी -" आप एक काम कीजिए । पर्यावरण वाले `तयराम नरेश` को आपत्ति न हों, ऐसी एकान्त जगह, स्थान ग्रहण करके श्वासोश्वास स्तम्भन की क्रिया करें ।आपका परफोर्मन्स सुधर जायेगा ।
नेक्स्ट?"

नेताजी -३,"बाबाजी, मैं माईन्स और मीट्टीचोरी कौभांडवाला । मेरे इतने सारे प्रयत्न के बावजूद मेरे सारे साथीदारों को संतोष नही हो रहा? क्या करुं?"

बाबा जी -" बचपन में आप मिट्टी में लेटकर खेलते (प्लॅ..!!) थे?"

नेताजी ३ -" हाँ, मैं तीन बार खेला था ।"

बाबा जी," जाइए, अपने सारे साथीदारों के साथ माईन्स और मिट्टी में लंबे समय तक चौथी बार ( 4 PLAY) खेलिए । आप के साथीदारों को परमानंद प्राप्त होगा ।"

अचानक बाबा जी किसी को देखकर, उठ खड़े हुए ।

बाबा जी," आइए,आइए, कॉमनवेल्थवाले दला तरवाडीजी, क्या समस्या है?"

नेताजी ४-" बाबा जी, मेरे पकाये हुए भोजन का स्वाद सभी ने चखा है, अब वही लोग मुझे ब्लॅकमेल की चिट्ठियाँ भेज रहे हैं । मैं हताशा के मारे ठंडा हो गया हूँ ।"

बाबा जी," अरे..!! तरवाडीजी, आप तो बगैर गेम खेले सब को पछाडनेवाले काबिल खिलाड़ी हो फिर भी ठंडे हो गए? आप एक काम करें, सब के सामने, आप अपने एक हाथ की जगह दोनों हाथ का उपयोग करें ।"

नेताजी ४ -(चौंककर)" मतलब?"

बाबा जी," आप ठंडे पड गये हैं ना? सब के सामने आप दो हाथ की हथेली को परस्पर ज़ोर से घींसे? सारा बदन गर्म हो जायेगा । देखो, ऐसे..ऐसे..!! ठीक है?"

नेताजी ५ -" ओँ..ओँ..ओँ..ओँ..!! बा..बा..जी, मैं टू जी स्पेक्टम घोटालेवाला खाजाबाबु..!! मेरी बीबी तलाक चाहती है । कहती है, तुमने अपनी जेब-तिजोरी तो गर्म कर ली,अब ये ठंडे बिस्तर का मैं क्या करुं? ओँ..ओँ..ओँ..ओँ..!! "

बाबा जी,"चुप हो जा । सारे देश को खून के आँसू रूलाकर अब खुद रोता है? मेरे यह शिष्य को साथ ले जा, तेरा बिस्तर गर्म कर देगा ।"

नेताजी ५ (अचानक चुप होकर)" बाबा जी, यह आप क्या बक रहे हो..!!"

बाबा जी," तेरा दिमाग सड़ गया है? ज्यास्ती नहीं समझने का..!! मेरा शिष्य तेरे ठंडे बिस्तर के नीचे आग जला कर गर्म कर देगा । चल अब भाग यहां से..!!"

शिष्य -" बाबा जी, आप जल्दी समाधी लगा लें । मध्यप्रदेशवालें `बकबकविज्यसिंह`;अप्रण दादा,कपिल डॅवम;पी-पीम्बरम, ऐसे सारे नेताजी आ रहे हैं । फोगटमें आपका सर खपायेगें ।"

बाबाजी," अरे..!! उनको रोकना मत, आने दे और सारे रूममें गुलाबजल छीडक दे । उन सभी को सेक्स की समस्या नहीं है । उनके उदरमें, नेता होनेका अभिमान का गेस भर गया है, आने दे, वायुमूक्तासन कराके उसका सारा गेस अभी नीकाल देता हूँ ।"

MARKAND DAVE. DT: ०३-०९-२०११.

सोमवार, 1 अगस्त 2011

आधुनिक बोधकथाएं - ६. प्रिय कविता ।



सौजन्य-गूगल।

एक बड़े ही स्मार्ट और हेन्डसम युवा कवि के साक्षात्कार का, एक  कार्यक्रम , टी.वी. पर, भरी दोपहर में, प्रसारित हो रहा था । 

इस कार्यक्रम को, एक  हॉटेल  में  किटी  पार्टी  मना  रही, कुछ  आधुनिक-मुक्त विचारोंवाली महिलाएं, बड़े चाव से  निहार रही थीं । 

टी.वी. एन्कर-"सर, आप कविता कब से लिख रहे हैं?"

युवा कवि-" जब मैं, कॉलेज में अभ्यास करता था तब से..!!"

टी.वी. एन्कर-" सर, आपको कौन सी कविता सब से अधिक प्रिय है?"

युवा कवि-" देखिए, वैसे तो मुझे मेरी सारी कविता प्रिय है,पर मेरी `चाहत` नाम की, एक कविता मुझे आज भी सब से अधिक प्रिय है ।"

टी.वी. एन्कर-"सर, आपकी कोई ताज़ा कविता का नाम आप दर्शको को बताएंगे?"

अब, टी.वी. एन्कर के इस सवाल, जवाब वह युवा कवि देता,इस से पहले ही, किटी पार्टी में जमा हुई, कुछ महिलाओं में से एक ने कहा," यह युवा कवि, कॉलेज के आख़री साल मेरे साथ ही पढ़ता था और उसकी यही प्रिय कविता, मेरे यहाँ छप कर,आज चार साल की हो गई है, हमारी उस बच्ची का नाम भी `चाहत` है..!!"


यह सुनकर दुसरी महिला बोली," यह कवि, ढाई साल से  मेरे साथ नौकरी कर रहा है और उसकी `चाहत` नाम की, ऐसी ही एक और प्रिय  कविता मेरे यहाँ छप कर, अभी  दो  साल की हो गई है..!!"

बस, इतना सुनने भर की देरी थी और तीसरी एक महिला गुस्सा हो कर बोली," क्या बात करती हैं आप दोनों? ये  सा...ला..कवि..!! इतना बदमाश है? चार माह के पश्चात  उसकी एक और कविता मैं  भी प्रकाशित करनेवाली हूँ, जिसका नाम भी उसने अभी से `चाहत` रखा है..!!"

यह  सुनकर  वे  दोनों  महिलाएं  चीख  उठी,"क्या कह रही हो तुम?"

आख़री महिला ने बड़े मायूस स्वर में कहा," इस ठग के साथ,पिछले साल ही, मेरी शादी हुई है..अब मेरा क्या होगा..!!"

उन दो महिलाओं ने,उदास महिला को, ढाढ़स बंधाते हुए कहा," अब कविराज, तुम्हारे यहाँ पूरा कविता संग्रह प्रकाशित करेंगे..और क्या..!!"  


आधुनिक बोध- किसी भी कवि राज से, विवाह रचाने के पूर्व, उन्होंने अपनी प्रिय कविताओं को, कई जगहों पर छापा तो नहीं है ना? ये बात अवश्य चेक कर लेना चाहिए..!!
मार्कंड दवे । दिनांक-०१-०८-२०११.

बुधवार, 20 जुलाई 2011

श्री मोबाईल नारायण व्रत कथा ।

श्री मोबाईल नारायण व्रत कथा ।


(courtesy-Google images)


॥ श्री नारद उवाच ॥

" मर्त्यलोके जनाः सर्वे नाना क्लेश समन्विताः ।
  नाना योनि समुत्पन्नाः पच्यन्ते पाप कर्मभिः॥११॥"

" हे प्रभो, मनुष्य लोक में सभी मानव विविध योनि में उत्पन्न हो कर, नाना प्रकार के दुखों से लिप्त हो कर, अपने पाप कर्मों से पीड़ित है । उनके यह दुःख कौन से नाना उपाय द्वारा शांत हो सकते हैं? मुझे कृपया बताएं, मैं वह सब श्रवण करना चाहता हूँ । "

॥ श्री भगवान उवाच ॥

" साधु पृष्टं त्वया वत्स लोकानुग्रहकांक्षाया ।
संत्कृत्वा मुच्यते मोहात तच्छृणुष्व वदामि ते ॥१३॥"

" हे वत्स, मनुष्य के हित की इच्छा से आपने मुझे सही बात जानना चाही है; जिसको करने से मनुष्य मोहमाया से मुक्त होता है,बह मैं आप को बताता हूँ सुनें ।"

(प्रथमोध्याय -श्रीसत्यनाराणय व्रत कथा)

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हे प्रिय वत्स, (दोस्त)

आज के घोर कलयुग में, संसार के सारे दुखों से मुक्ति दिलानेवाली, श्री मोबाईल नारायण व्रत कथा ही है । यह कथा को विधि पूर्वक करने से मनुष्य तत्काल  पृथ्वी लोक पर सर्वे सुख भोग कर, तमाम दुःख से आजीवन मोक्ष प्राप्त करता है । आज मैं भी, आपको यह व्रत कथा सुनाता हूँ वह आप सर्वे इसे  ध्यान से श्रवण करें ।

श्री मोबाईल नारायण प्रित कथा;अध्याय-प्रथम ।

आज होली-धूलेटी के इस पावन महा पर्व के दिन, संसार का कोई भी मानव पूर्ण श्रद्धा एवं प्रितीभाव मन में धारण कर, भगवान श्री मोबाईल नारायण की (खरीददारी) पूजा कर सकता है । कलयुग में, इस मनुष्य लोक में, अनेक दुखों से मुक्ति पाने के लिए, यह सबसे सरल और श्रेष्ठ उपाय है ।

ईतिश्री सेटेलाईट पुराने रेवा खंडे श्री मोबाईल नारायण कथायां प्रथमोડध्यायः संपूर्ण ।

बोले, श्री मोबाईल नारायण भगवान की....ई..ई..जय..अ.अ,,!!

( सभी भक्त गण अपने-अपने लोटे (पात्र) के उपर अपना चम्मच टकराएं, अगर पास लोटा या चम्मच न हो तो, अपने मोबाईल में कोई `शीला की जवानी` का रिंग टोन बजाएं ।

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श्री मोबाईल नारायण प्रित कथा अध्याय-द्वितीय ।

निर्धन प्रेमोच्छुक कॉलेजियन प्रेमी और एक मासूम, सुंदर  कन्या को प्राप्त हुए पून्य फल की कथा ।

॥ लेखक उवाच ॥

हे वत्स, संसार में, जिसने श्री मोबाईल नारायण  का व्रत सब से पहले किया था वह कथा मैं आपको सुना रहा हूँ ।

भारत की पून्य भूमि पर एक निर्धन कोलेजियन प्रेमी युवक, धरती पर  एक मासूम कन्या के विरह में सुधबुध खो कर, भ्रमित हो कर, इधर-उधर की ख़ाक छान रहा था । उसे इस तरह अत्यंत दुःखी  पाकर, भगवान श्री कामदेवजी ने अत्यंत प्यारभरे स्वर में, उस प्रेमी से प्रश्न किया," हे प्रेमीओं की जाति में श्रेष्ठ । आप अत्यंत दुःखी क्यों है? यह मैं जानना चाहता हूँ इसलिए मुझे विस्तार से बताइए ।"

॥ प्रेमी उवाच ॥

" हे श्री कामदेव प्रभु, मेरे साथ कॉलेज में पढ़ती हुई एक मासूम सुंदर कन्या के विरह से पीड़ित ऐसा में एक प्रेमी हूँ । अगर आप मेरा यह दुःख दूर करने योग्य कोई सरल उपाय जानते हैं तो कृपा करके मुझे बताएँ।

प्रेमी युवक की आर्द्रतापूर्ण वाणी से द्रवित होकर, श्री कामदेव जी ने अपने चिर परिचित मंद-मंद मुस्कान बिखेरते  हुए  अंदाज़ में, यह प्रेमी को भगवान श्री मोबाईल नारायण नामक देव की मूर्ति को अपने हाथों से अर्पण किया । यह नवयुवक को भगवान श्री कामदेवजी ने बताया की, अभी-अभी थोडी देर पहले ही, वही मासूम सुंदर कन्या को भी, भगवान श्री मोबाईल नारायण की ऐसी ही एक प्रतिकृति उन्होंने अर्पण की है । इतना कहकर भगवान श्री कामदेव जीने उस मासूम सुंदर कन्या के श्री मोबाईल नारायण से संपर्क करने के सारे विधि-विधान से, विरही प्रेमी को अवगत कराया और अनंत-असीम प्रेम का अहसास कराने विरही प्रेमी के शरीर में प्रवेश कर, अंतर्ध्यान हो गये ।

" श्री कामदेव भगवान ने, भगवान श्री मोबाईल नारायण का जो व्रत करने के लिए, मुझे विधि समझाया है, वह मैं  श्रद्धा पूर्वक ज़रूर करुंगा ।" यह सोचते हुए, विरही कॉलेजियन प्रेमी को सारी रात नींद भी  न  आ पाई ।

दूसरे दिन, प्रातःकाल में, जाग कर नवयुवक ने," आज मैं श्री मोबाईल नारायण का व्रत ज़रूर रखूंगा ।" मन में ऐसा संकल्प धर कर भगवान श्री कामदेवजी का सच्चे हृदय से स्मरण करके, विधि विधान अनुसार अपने श्री मोबाईल नारायण से, वह मासूम सुंदर कॉलेज कन्या के श्री मोबाईल नारायण से संपर्क किया ।

भगवान श्रीकामदेवजी के दर्शाए विधि विधान को सफलतापूर्वक ढंग से करने के कारण, व्रत के विधि अनुसार, व्रत पूर्णता के बाद, दो घंटे पश्चात, कॉलेज के पास की एक महंगी रेस्त्रां में दोनों प्रेमी पंखी  आमने सामने, व्रत कथा का `महा-प्रसाद` ग्रहण करने  हेतु, मॅक्सिकन-थाई फूड का ऑर्डर देकर साथ-साथ बैठे हुए थे ।

( " बोले, श्री मो..बा..ई..!!," अरे भाई साहब, ठहरिए, ज़रा ठहरिए.....अभी देर है ।  ज्यादा जोश  दिखाएँगे तो श्री मोबाईल नारायण रूठ जायेंगे ..!!)

श्री मोबाईल नारायण की इस पवित्र व्रत कथा अनुसार, वह निर्धन (कड़का-लुख्खा ) प्रेमी के पास, अपने से भी ज्यादा महँगा और स्टाईलिश श्री मोबाईल नारायण को देखकर, उस मासूम सुंदर कॉलेज कन्या ने, विरह में तड़पते हुए उस सच्चे प्रेमी युवक को, हर रोज़ के तिरस्कार भाव से विपरित, बहुत ज्यादा प्रेम-भाव व्यक्त किया ।  कालक्रम के बदलते ही, वह प्रेमी नवयुवक ने विरह के दुःख से मुक्त हो कर अपने मनवांच्छित प्यार को पा लिया  ।

भगवान श्री कामदेव जी द्वारा बताए गए यह व्रत को  इस के पश्चात उन दोनों प्रेमीओं ने, प्रति माह श्री मोबाईल नारायण की नई प्रतिकृति खरीद कर, श्री मोबाईल नारायण का व्रत विधि पूर्वक बार-बार, प्रति माह कर के, वह मासूम कन्या और नवयुवक ने, प्रति मास अलग-अलग नया प्रेमी और प्रेमिका को पा कर अंत में इन्होंने संसार के सर्वे सुख को(?) ( ग़लत मत सोचें..!!) प्राप्त किया ।

भगवान श्री मोबाईल नारायण के इस पावन व्रत को, प्रति मास विधि पूर्वक करने फलस्वरूप, अपने निर्धन मित्र को अचानक नयी बार-बार नवीन प्रेमिका और नये प्रेमी के साथ कॉलेज में प्रसन्न होते देखकर, समग्र (HE-SHE) मित्र गणने भी यह पावन व्रत करने का मन में निर्धार किया और सभी यह पृथ्वी लोक में नाना प्रकार के प्रेम नामक मनवांच्छित सुख के अधिकारी बने ।

ईतिश्री सेटेलाईटपुराणे रेवाखंडे श्रीमोबाईलपारायण कथायां द्वितियोध्यायः संपूर्ण।

(ए..भाईसाहब..!! ए..सुनिए..ना; अब आप ज़ोर से बोल सकते हैं..!!)

बोले, श्री मोबाईल नारायण भगवान की....ई..ई..जय..अ.अ,,!!

( सभी भक्त गण अपने-अपने लोटे (पात्र) के उपर अपना चम्मच टकराएं, अगर पास लोटा या चम्मच न हो तो, अपने मोबाईल में कोई `मुन्नी बदनाम हुई` का रिंग टोन बजाएं ।)

 हे परम सुखी प्रेमी जन, यह पावन कथा में किए गये वर्णन  अनुसार, प्रति मास, पुराने श्री मोबाईल नारायण की, मोह माया से मुक्त होने हेतु, कथा पूर्ण होने के पश्चात व्रत कथा का महा-प्रसाद ग्रहण करना अति आवश्यक  है । ऐसा न करने से, भगवान श्री मोबाईल नारायण दुःखी होकर रूठ जाते हैं तथा बार-बार नेटवर्क की समस्या खड़ी करने लगते हैं ।

आज की इस पावन कथा में, उन सभी मासूम सुंदर कन्याओं के, पहलवान, कुस्तीबाज, पिता-मामा-चाचा- भाई यहाँ अभी-अभी उपस्थित हुए हैं । यह कथा समापन का महा-प्रसाद (ही..ही..ही..!!) वितरण विधि उन्हीं के कर कमल से संपन्न होना है, कृपया आप कहीं मत जाईएगा, कुछ समजे..ए..ए..ए.ए..!!

मासूम सुंदर कन्याओं के, पहलवान, कुस्तीबाज, पिता-मामा-चाचा- भाई के करकमलों से प्राप्त महा-प्रसाद आपको ज्यादा गर्म लगता हो तो, ग़म गलत करने के लिए, सॉरी मुँह की जलन-गर्मी गलत करने के लिए, रास्ते में कहीं अपना बाईक खड़ा रखकर, आप फटाफट ठंडाई या भांग पी सकते हैं ।

बोले, श्री मोबाईल नारायण भगवान की....ई..ई..जय..अ.अ,,!!

( सभी भक्त गण अपने-अपने लोटे (पात्र) के उपर अपना चम्मच टकराएं, अगर पास लोटा या चम्मच न हो तो, अपने मोबाईल में कोई `हूड दबंग-दबंग-हुड-हुड-हूड, दबंग-दबंग-दबंग` का रिंग टोन बजाएं ।

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प्यारे युवा प्रेमी दोस्तों, वैसे तो, यह व्रत कथा, सब को अपनी-अपनी क्षमता अनुसार, महा प्रसाद प्राप्ति के बाद पूर्ण होनी है । सिर्फ भगवान श्री कामदेवजी की `आरती` करना ही बाकी है, सभी भक्त अपने-अपने जूते-बूट-चप्पल, दोनों हाथों में ग्रहण करें और रोनी सी  सूरत बना कर, ऊँचे सुर में, ज़ोर से  चिल्लाती हुई आवाज़ में, `जय  कामदेव-जय कामदेव`` आरती में कृपया हमें साथ दें ।

श्री मोबाईल नारायण व्रत कथा आरती..!!

" समरुं रिलायंस, टाटा, प्रेमे  डो..को..मा (२)

  मनवांच्छित,वर देते,सब को मोबाईल देवा.

जय..कामदेव..!!

१. सुंदर-स्लीम स्वरूप, मन मोहक देवा..(२)

 सत्य-असत्य कथनसे, होती तम सेवा.

जय..कामदेव..!!

२. उल्का मुख गीरता, प्रेमी जन देवा (२)

नित नये कर सोहे, भजते हैं काम देवा.

जय..कामदेव..!!

(अस्तु, अस्तु, अस्तु, भगवान श्री मोबाईल नारायण की स्तुतिमें श्रीकामदेवजी की ये आरती के आगे के बाकी सारे अंतरे आप विद्वान पाठक मित्र खुद ही लिख लेना । मेरा कंठ-आकंठ दर्द से भर जाने की वजह से, क्षमा करना,  अब आगे मैं  गा नही पाउंगा ।)

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MARKAND DAVE PRESENTS,

"SHRI KRISHNA SHARANAM MAMH PART- 1 TO 9"





मार्कण्ड दवे । दिनांक; २० -२ -२०११.