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हास्य जीवन का अनमोल तोहफा    ====> हास्य जीवन का प्रभात है, शीतकाल की मधुर धूप है तो ग्रीष्म की तपती दुपहरी में सघन छाया। इससे आप तो आनंद पाते ही हैं दूसरों को भी आनंदित करते हैं।

हँसे और बीमारी दूर भगाये====>आज के इस तनावपूर्ण वातावरण में व्यक्ति अपनी मुस्कुराहट को भूलता जा रहा है और उच्च रक्तचाप, शुगर, माइग्रेन, हिस्टीरिया, पागलपन, डिप्रेशन आदि बहुत सी बीमारियों को निमंत्रण दे रहा है।

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मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

लालच का अंत ?

       किसी गांव में एक समय चार मित्र बेहतर भविष्य की तलाश में भोजन-पानी की आवश्यक तैयारी के साथ शहर की ओर निकले । रास्ते में विश्राम के समय एक सन्यासी से मुलाकात के बाद उन्होंने अपना मकसद उन सन्यासी को बताया, तब सन्यासी ने उन्हें चार बत्तीयां देते हुए कहा कि सामने दिख रही पहाडी पर तुम जाओ । जहाँ भी कोई बत्ती गिरे वहीं थोडी खुदाई करने पर तुम्हें तुम्हारे उद्देश्य की पूर्ति जितना धन प्राप्त हो जावेगा । सभी ने आपस में विचार-विमर्श कर सन्यासीजी को धन्यवाद दिया और पहाडी की ओर चढना प्रारम्भ किया ।
 
          कुछ दूर चढने पर एक बत्ती गिर गई । सबने वहाँ खुदाई की तो अन्दर लोहा ही लोहा दिखने लगा । एक मित्र ने कहा कि अपना मकसद इस लोहे को बेचकर पूरा हो सकता है । किन्तु बाकि तीनों मित्रों को उसकी बात समझ में नहीं आई । तब वह मित्र वहीं रुककर अपने लिये उस लोहे के भण्डार को ले जाने की व्यवस्था में लग गया और शेष तीनों मित्र आगे निकल गये ।
 
           और थोडी चढाई चढने पर फिर एक बत्ती गिरी । वहाँ तीनों ने खुदाई की तो भरपूर तांबा वहाँ मौजूद पाया । उनमें से फिर एक मित्र बोला ये उस लोहे की तुलना में कहीं अधिक बेहतर विकल्प है और इसमें हम तीनों का भविष्य बन सकता है । तब बाकि दो मित्रों को उसकी बात सही नहीं लगी और वह मित्र तांबे के द्वारा अपना भविष्य संवारने वहीं रुक गया व शेष दोनों मित्र फिर आगे चढने लगे । 
 
            कुछ और उपर चढने पर एक बत्ती फिर गिरी । दोनों मित्रों ने वहाँ खुदाई करके देखा तो वहाँ चांदी की ढेरों सिल्लीयां निकली ।
तब दोनों में से एक मित्र की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा । उसने दूसरे से कहा- वे दोनों तो लोहे और तांबे में ही रह गये यहाँ तो इतनी चांदी मौजूद है कि हमें अब जीवन में कोई कमी ही नहीं रहेगी । किन्तु दूसरे मित्र ने कहा कि ये चांदी तुम ले जाओ मैं अभी और आगे जाऊंगा । तब संतुष्ट मित्र चांदी ले जाने की व्यवस्था में लग गया और दूसरा फिर उपर की ओर निकल गया ।

           वह थोडा ही और उपर पहुंचा कि चौथी बत्ती भी गिरी । उसने वहाँ खुदाई की तो उसकी उम्मीद के मुताबिक वहाँ सोने का खजाना दिखने लगा । अब तो उसकी प्रसन्नता की सीमा न रही । उसने उपर की ओर देखा तो पहाडी की चोटी थोडी ही दूरी पर दिख रही थी । तब उसने सोचा कि ये पहाड तो बहुमूल्य संपदाओं से भरा पडा है और ये बत्तियां तो उन स्वामीजी ने प्रतीक रुप में ही दी हैं । इस सोने पर तो मेरे अलावा अब और किसी का कोई हिस्सा भी नहीं बचा है किन्तु जिस तरह इस पहाड पर लोहा, तांबा, चांदी व सोना मिला है ऐसे ही इस पहाडी की चोटी पर हीरे-जवाहरात भी अवश्य ही मौजूद होंगे । लगे हाथों मैं उस चोटी पर भी देख लूं ।
 
           यह सोचकर वह व्यक्ति उस पहाडी की चोटी पर पहुंचा, लेकिन आश्चर्यजनक तरीके से उसे वहाँ एक ऐसा आदमी दिखा जो हिल-डुल भी नहीं पा रहा था और उसके सिर पर एक बडा सा चक्र धंसा हुआ था जो निरन्तर घूम रहा था । बडे आश्चर्य़ के साथ उसने उस चक्र वाले व्यक्ति से पूछा- आप कौन हैं और आपके सिर में ये चक्र कैसे फंसा घूम रहा है ? उसके इतना पूछते ही चमत्कारिक तरीके से वह चक्र पहले से मौजूद व्यक्ति के सिर से उतरकर पहाड चढने वाले उस अन्तिम चौथे मित्र की सिर में धंस गया । मुक्त होने वाला व्यक्ति उससे बोला- धन्यवाद तुम्हारा जो अपने लालच के कारण तुम उपर तक आगए । अब न तुम्हें कभी भूख-प्यास लगेगी और न ही ये चक्र तुम्हारे सिर से हटेगा । हाँ यदि कोई तुमसे बडा लालची तुम्हारी किस्मत से यहाँ तक आ जावेगा तभी तुम अपनी मुक्ति का कामना कर सकते हो । मैं तो अब इस बोझ से मुक्त होकर जा रहा हूँ ।
 
            पुरातन काल की ये कथा कितनी सत्य या असत्य है ये तो शायद कोई भी नहीं जानता किन्तु लालच का भूत तो ऐसा ही है जिसकी गिरफ्त में देश-दुनिया की नामी-गिरामी शख्सियतें भी सर पर ये चक्र धंसवाए भोजन-पानी कि चिन्ता से कहीं अधिक और बडे भण्डार की तलाश में घूम रही हैं, और भ्रष्टाचार  व विध्वंस के नये-नये तरीके इजाद भी करवा रही हैं ।  आपका
क्या ख्याल है ?


      

बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

जुगलबन्दी एक झकझकी की.

स ब्लागवुड में नये-पुराने, छोटे-बडे, गद्य-पद्य सभी प्रकार के चिट्ठाकारों की एक चाह जो शिद्दत से उभरकर सामने आते दिखती है वो ये कि मेरे आलेख के नीचे चारों दिशाओं से टिप्पणियों की भरपूर फसल लहलहाते दिखे । चिट्ठाकार इसके लिये जहाँ खडा है वहीं पूरी जागरुकता से विषय तलाश रहा है ।

कुछ ज्यादा जागरुक लेखक तो जैसे जब भी अपने कम्प्यूटर से अलग हटते होंगे तो तत्काल केमरा भी उनके साथ चल रहे जरुरी सामान यथा पर्स, चाबी, चश्मा, रुमाल जैसी एक अनिवार्य आवश्यकता के रुप में साथ लग लेता होगा कि विषय के साथ ही चित्र भी तत्काल लपेटे में आ जावे तो सोने में सुहागा । क्या पता कब ऐसा चित्र ही मिल जावे कि बगैर किसी लेख की मेहनत के ही टिप्पणियों का जलजला हमारे लिये लेता आवे और माफी चाहते हुए निवेदन करना चाहूँगा कि मैं भी कोई इस चाहत से अलग नहीं हूँ ।

तो मेरी व ऐसे सभी चिट्ठाकारों के लिये मेरे मस्तिष्क में एक झकझकी कुलबुला रही है जिसे मैं यहाँ परोसना चाह रहा हूँ । सभी विद्वजनों से निवेदन है कि इसे कविता समझने की गल्ति ना करें क्योंकि मेरे परम आदरणीय स्व. पिताजी सहित मेरे काका, ताऊ और उनके सभी वंशज जहाँ तक मेरी नजरें जा सकती है जिसमें अपनी कल्पना भी जोड दूँ तो मेरी सात पुश्तों ने आज तक कभी कविता नहीं की, तो मेरा तो प्रश्न ही नहीं बचता ।

हाँ इस चिट्ठा-जगत की सोहबत में कभी मैं तुकबन्दी भिडाना चालू करदूँ और मुझसे बाद की पीढियों के लिये ये मार्ग प्रशस्त हो जावे तो जुदा बात है । फिलहाल तो आप मेरी इस झकझकी से ही काम चलालें-

एक बात और साहित्य में प्रेरणा कहीं से भी ली जा सकती है फिर भी इस झकझकी को शुरु करने के पहले मैं इस ब्लागवुड के परम आदरणीय भीष्म-पितामह को विशेष रुप से नमन करते हुए उनसे क्षमा या आशीष अवश्य चाहूँगा । निवेदन है -

चिट्ठे जो सब पसन्द कर सकें
ऐसा ज्ञान कहाँ से लाऊँ,

टिप्पणी से समृद्ध जो करदे,
वो आलेख कहाँ से लाऊँ.

छपते ही वाहवाही करलें
वो पाठक मैं कहाँ से लाऊँ.

टिप्पी जो लेखक को पसन्द हो
वो अल्फाज कहाँ से लाऊँ.


शेअर से पैसा जो जुटाए
ऐसी टिप्स कहाँ से लाऊँ


बैठे-बैठे खर्च चल सके,
ऐसा काम कहाँ से लाऊँ


घर में सबको सदा सुहाए
वो व्यवहार कहाँ से लाऊँ,


खेमेबाजी में भी घुस सकूँ
वो चमचाई कहाँ से लाऊँ


टिप्पणी से समृद्ध जो करदे,
वो आलेख कहाँ से लाऊँ.


चिट्ठे जो सब पसन्द कर सकें
ऐसा ज्ञान कहाँ से लाऊँ.