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हास्य जीवन का अनमोल तोहफा    ====> हास्य जीवन का प्रभात है, शीतकाल की मधुर धूप है तो ग्रीष्म की तपती दुपहरी में सघन छाया। इससे आप तो आनंद पाते ही हैं दूसरों को भी आनंदित करते हैं।

हँसे और बीमारी दूर भगाये====>आज के इस तनावपूर्ण वातावरण में व्यक्ति अपनी मुस्कुराहट को भूलता जा रहा है और उच्च रक्तचाप, शुगर, माइग्रेन, हिस्टीरिया, पागलपन, डिप्रेशन आदि बहुत सी बीमारियों को निमंत्रण दे रहा है।

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सोमवार, 16 मई 2011

भाग दो - रामू काका और राहुल बाबा का गीता संवाद

अष्टावक्र


अब चुनाव युद्ध का समय आ चुका था  राज्य मे महज तिहाई हिस्सा मांगने के बावजूद मुलायम कुरूव्रुद्ध  और और गांधार कुमारी महामाया ने इंकार कर दिया था । दूत भेजने बुलाने का समय जा चुका था रणभेरी बज चुकी थी । प्रचार रथ मे खड़े होकर सारथी रामू काका से बाबा ने कहा मेरा रथ हमारी और विरोधियों की सेनाओ के बीच खड़ा करे । मै हमारी सेनाओं से युद्ध के अभिलाषी सभी वीरो को देखना चाहता हूं । रथ के बीच मे आते ही राहुल बाबा ने विपक्षी दलो के ध्वजो से सजी उनकी सेनाओ और सेनापतियों को देखा महारथियों को भी देखा और आम सैनिको को भी देखा जो दल भक्ती के कारण युद्ध मे आ जुटे थे । मरने मारने को उतारू इन सभी को देख बाबा का मन विषाद से भर गया ।


और बोले रामू काका ईडिया जैसे टेन कन्ट्रीस का राज्य भी मिल जाये तो भी मेरे एनसेस्टर्स के वर्क लैंड मे मै अपनो पर ही वार नही कर सकता  कुरूव्रुद्ध मुलायम और और गांधार कुमारी महामाया दोनो ही पूज्यनीय हैं क्या आपको याद नही डील परमाणू से लेकर 2 G तक हर मौके पर इनका स्नेह हमें मिलता रहा है  कुरूव्रुद्ध ने तो डील परमाणू मे हमारी रक्षा के लिये अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी और  गांधार कुमारी ने हमारे अलावा क्या किसी और को भट्टा परसौल जाने दिया था। और पितामह लाल किशन को तो देखो कब से राज्याभिषेक के लिये पाईपलाईन मे लगे हैं क्या हो जायेगा जो एक बार ये ही बन जायें ।  मै प्रचार नही करूगा ऐसा कह बाबा रथ मे ही नीचे बैठ गये ।




रामू काका तुरंत राम किशन बन गये और ओज पूर्ण स्वर मे बोले - जनता को टॊपी पहनाने वाले उच्च राजकुल मे जन्म लेकर भी यह कुविचार आपके मन मे आया कैसे ।  हे इंदिरेश अपनी गौरव पूर्ण कुलगाथा को याद कीजिये कैसे आपकी महान दादी ने आपातकाल लगाने तक मे हिचक न की थी कैसे उनके पिता ने इसी राजगद्दी के लिये देश का बटवारा भी मंजूर कर लिया था । कैसे आपके परम प्रतापी चाचा ने अपनी प्रचंडता से आर्यावर्त को हिला कर रख दिया था समस्त फ़िल्मी अप्सरायें भी उनके तेज से डर उनके सामने न्रत्य किया करती थीं । आपकी माता को ही लीजिये सात समुद्र पार के राज्य की होने पर भी उन्होने कितनी कुशलता से यहां की राजनीती सीख आपके उत्तराधिकार की रक्षा की है । हे इटिलेश आप अपने कुल को कलंकित न कीजिये पकड़िये माईक और प्रचार युद्ध शुरू कीजिये । अपना अक्षय भाषण तुणीर उठाइये और प्रहार कीजिये ।


बाबा इतना सुन कर भी तत्पर न हुये बोले रामू काका क्या मेरे आरोप अस्त्र से कुरूव्रुद्ध और गांधार कुमारी आहत न होगी मोहन दादा को कमजोर कह चुके लालकिशन दादा को मै उनसे उम्र मे आधा यदि कमजोर कह दूंगा तो क्या वे व्यथित न होंगे । क्या इससे मर्यादा भी भंग न होगी । रामू काका मुस्कुराये बोले हे राजीव नंदन ये सब क्षत्रीय राजनेता हैं इन पर आरोप अस्त्र का कोई असर नही होता और आश्वासन बाण के सम्मोहन मे ये आते नहीं हैं युद्ध हार जाने पर भी इनका और आपका अंदरूनी प्रेम कम न होगा । और युद्ध समाप्ती के बाद इन सब से आपका पुनः प्रेम स्थापित हो जायेगा और यदि किसी का  मन दुख भी जाये तो आप लालकिशन दादा की तरह माफ़ीनामा जारी कर देना ।


क्रमशः
पिछला घटना क्रम जानने के लिये -   http://hasyavyang.blogspot.com/2011/05/blog-post_14.html

 

शनिवार, 14 मई 2011

दिग्गी मामा नही ये मामू है मम्मी का रामू है- एक

अष्टावक्र


राहुल बाबा मम्मी के पास आकर रोने लगे मम्मी ने चुप कराते हुये पूछा क्या हुआ राजकुमार । राहुल बाबा ने शिकायत की मेरा यूपी बाल उद्यान एक दम उजड़ गया है । मम्मी ने कहा चिंता मत करो राजकुमार रामू काका को साथ ले जाओ वे उसे चमन कर देंगे । बाबा अचरज मे पड़ गये बोले अरे ये तो दिग्गी मामू हैं आप इन्हे रामू काका क्यों कह रही हैं । मम्मी ने घबरा कर यहां वहां देखा और बोली बेटा इनसे सार्वजनिक नजदीकी अच्छी नही इनको रामू काका ही कहना । राहुल बाबा अड़ गये पर रामू काका ही क्यों मम्मी ने समझाया बेटा कुछ नाम अमर हो जाते हैं । उदाहरण के लिये एक अमर सिंह साहब है जिनका नाम हरिराम नाई पड़ गया । बाबा अभी भी न समझे बोले ये सिंह अमर क्यों हो गये । मम्मी ने पौराणिक कथा सुनाई एक मुलायम परशुराम थे उन्होने कसम खायी मै धरती से सिंह को मिटा दूंगा । लड़ते लड़ते जब सिंह की तलवार घिस गयी तब वे रामू काका के पास गये काका ने सलाह दी इस घिसी हुई तलवार से तो केवल बाल ही काटे जा सकते हैं अतः आप नाई बन जाओ । कालांतर मे शोले फ़िल्म आयी तब से सिंह साहब का नाम हरिराम नाई हो गया । और ये वाले हरिराम आपको नये पौधे उगाने के लिये तरह तरह की खाद देंगे


राहुल बाबा खुशी खुशी यूपी बाल उद्यान पहुंचे रामू काका ने उन्हे एक पौधा दिया ये पौधा फ़लो से लदा हुआ था । देख्ते ही बाबा ने किलकारी भरी वाह ओसामा पौधा मजा आ गया । सकपकाये रामू काका ने यहां वहां देखा और बाबा को समझाया गजबे करते हैं राजकुमार ओसामा जी बोलिये वरना फ़ल गायब हो जायेंगे और इसमे कांटे उग जायेंगे । बाबा का मन न भरा बोले चलो ब्राह्मण वट व्रुक्ष लगायें रामू काका पसीना पसीना हो गये बाबा इसका पेड़ नही लगाना है केवल बोनसाई लगाना है आप तो पूरा बाग फ़िर से उजाड़ दोगे । आप एक काम करो मोहन दादा के साथ बुदेलखंड वाला हिस्सा घूमने जाओ और वहां आश्वासन के कई पेड़ लगा कर आना । राहुल बाबा बिफ़र गये मेरे पापा से भी आप लोगो ने यही कहा था वहां जाता हूं तो लोग कुछ बोलते तो नही हैं पर उनकी सूनी आखें 60 सालो का हिसाब मांगती हैं । हमारी राज परिवार के लगाये पेड़ फ़ल कब देंगे
 रामू काका को बाबा के मुख से निकली गंभीर बाते अच्छी न लगी बोले चलो बाबा हाथी की सवारी कर आते हैं पूरे उद्यान मे उसकी मूर्ती लगी है । बाबा गुस्सा हो चुके थे बोले रामू काका अब मै केवल आयातित पेड़ लगाउंगा विकास का परमाणू पेड़ उगाउंगा रामू काका बोले बेटा अभी इस उद्यान को हरा भरा तो होने दो जब यहां का फ़ल हमको मिलेगा फ़िर हम सब कुछ करेंगे अभी तो हमको यहां बाटला हाउस का कैक्टस मालेगांव का बेशरम और ऐसे बहुत से पौधे उगाने होंगे । मुस्लिम तुष्टीकरण वाली घांस की तो जगह ही नही है उसके लिये माया की मूर्ती और साईकिल स्टैंड को तोड़ना हॊगा
और हमारे हरीराम नाई जी भी वक्त जरूरत छटाई का काम कर ही सकते हैं ।

बुधवार, 11 मई 2011

बेड़ा गर्क हो पुरूस्कार पाने वाले ब्लागरो का

अष्टावक्र

दिल्ली से लौटे ललित शर्मा जी से रायपुर स्टेशन पर मुलाकात हो गयी उनकी चढ़ी हुई मूछे स्पष्ट तौर पर पुरूस्कार की खुशी झलका रही थी । मुझे देखते ही प्रसन्नता से बोले क्या हाल है दवे जी मेरा सीना चाक हो गया मरी हुयी आवज मे मैने कहा ठीक ही है । शर्मा जी पुराने चावल है दर्द ताड़ गये पूछा क्या बात है भाई मैने कहा छोड़िये गुरूदेव आप बताइये कैसी कटी दिल्ली मे । शर्मा जी उत्साह से चालू हो गये और मेरे सीने मे ज्वाला और भड़कने लगी मै जोर से चिल्लाया बस बस अब मुझसे न सुना जायेगा । शर्मा जी बोले यार जब से मिला है अलग टाईप का दिख रहा है बात क्या है ।

मुझसे रहा न गया अकेले अकेले इनाम पा लिया अब हम दुखी भी न हों ये हक भी छीन लो । शर्मा जी हड़बड़ाये यार तू तो जुम्मा जुम्मा चार महिने से ब्लागिंग कर रहा है तेरे को इनाम कैसे मिल जाता । मैने पूछ लिया क्या वरिष्ठता के आधार पर पुरूस्कार बटे हैं । शर्मा जी बोले वो बात नही है पर लोग सालो से लिख रहे हैं सैकड़ो की संख्या मे लेख लिख चुके हैं तूने तो 50 भी नही लिखे होंगे । मैने फ़िर पूछा क्या संख्या के आधार पर इनाम बटे हैं । तू बात समझ ही नही रहा है लोगो के लेखो मे सैकड़ो की संख्या मे कमेंट आते तुम्हारे ब्लाग मे कितने आते हैं मैने कहा गुरू टोपी मत घुमाओ तू मेरी खुजा मै तेरी खुजाउं वाले कमेंट को कमेंट नही कहते " अच्छा लेख मेरे ब्लाग पर भी आना हवे ए गुड डॆ " क्या ऐसे कमेंट पुरूस्कार का आधार थे


शर्मा जी अब नाराज हो चुके थे बोले दो मिनट बिना बोले मेरी बात सुनोगे तो बोलता हूं वरना मै चला । मैने सहमती मे सर हिलाया शर्मा जी बोले मेरे भाई संस्था ने प्रतियोगिता रखी थी उसमे लोगो ने अपना लेख भेजा उसमे से संस्था ने 51 लोगो को चुन कर उन्हे पुरूस्कार दिये । यदि आपने भेजा होता और उनको लेख पसंद आता तो आपको भी मिलता आपने भेजा ही नही तो पुरूस्कार कैसा । मैने कहा मेरे जैसे लेट आने वालों या जो लेख भेज नही पाये थे उनसे लेट फ़ीस ले लेते और उनको भी मौका देते अरे बता ही देते की इतना बड़ा पुरूस्कार समारोह होने वाला है लोग सतर्क न हो जाते । मेल भेज दिया आमंत्रण का बस अरे भाई हम भी सम्मानित सदस्य हैं टिकट भेजा होता या फोन ही कर दिया होता हमारा अपमान तो हुआ है बस मै इससे आगे कुछ नही जानता ।


और तो और ऐसा समारोह किया कि ब्लागीवुड धर्म के आधार पर बट गया जिनको आपने सम्मान गौर कीजियेगा पुरूस्कार नही सम्मान नही दिया उनको अपना अलग समारोह करना पड़ गया दो जगह खर्चा हुआ वो अलग अरे भाई उनके पुरूस्कार भी इसी मंच से बाट देते 51 के बदले 71 सही भीड़ भी ज्यादा होती सब खुश रहते और खर्चा शेयर हो जाता वो अलग । ललित शर्मा जी लाजवाब थे बोले मेरे चाचा मै क्या करूं कि तेरा गुस्सा शांत हो जाये । मैने कहा पुरूस्कार के दिन मैने दुखी होकर चुरा कर एक तुकबंदी बनाई है पूरा सुनना पड़ेगा मजबूरी मे शर्मा जी बोले इरशाद


मै शुरू हो गया



कितने ऐश उड़ाते होंगे

कितना इतराते होंगे

जाने कैसे लोग वो होंगे

जो इनाम पाते होंगे


इनाम की याद के बादेसमां मे

और तो क्या होता होगा

हम लोग जो पहले से थे बिफ़रे

और बिफ़र जाते होंगे


वो जो इनाम न पाने वाला है न

हमको उनसे मतलब था

इनाम पाने वालो से क्या मतलब

मिलता होगा पाते होंगे


शर्मा जी कुछ तो हाल सुनाओ

उन कयामत लिफ़ाफ़ो का

वो जो पाते होंगे उनको

खुशी से पगला जाते होंगे


मै इतना ही सुना पाया था कि शर्मा जी ने हाथ जोड़े बोले मेरे भाई ये लिफ़ाफ़ा धर और बोल तो मेरा पुरूस्कार भी रख ले आज के बाद मै कसम खाता हूं जहां तुझे पुरूस्कार न मिलेगा मै भी नही लूंगा । हाथ मे लिफ़ाफ़ा लिये और शर्मा जी का वादा लिये मै रंजो गम भुलाकर चैन से घर की ओर रवाना हो गया ।

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

भगवान शिवजी और आदिवासियो का चढ़ावा

 

अष्टावक्र


                                            

धरती से शिव पूजन अटेंड कर कैलाश लौटे भोलेनाथ को मुस्कुराते और थोड़ा लड़खड़ाते देख मां पार्वती के मन मे शक उत्पन्न हुआ  । उन्होने प्रभु से कारण पूछा परंतु वे बात को अनसुना कर सीधे शयन कक्ष चले गये और २ मिनट मे ही उनके खर्राटों की आवाज आने लगी । भगवान के समीप जाने पर माता को महिला इत्र की खुशबू आयी उन्होने से सोचा आज क्या हुआ है इसका पता लगाना ही होगा

 माता ने एक बड़े से थाल मे नाना तरह के व्यंजन रखे और साथ ही 100 ग्राम सूखी घांस भी रख ली । नंदी के पास पहुच कर माता ने सूखी घास उसके सामने रख वापस मुड़ी ही थी कि नंदी चीत्कार कर उठा मै मुखबिरी करने को तैयार हूं माते । मुस्कुराते हुये माता ने कहा फ़टाफ़ट  आज का घटनाक्रम पूरा बताओ  । नंदी बोला आज प्रभु बड़े खदानपति के यहां गये थे । आर्गेनिक सामग्री से बने वहां नाना प्रकार के व्यंजन , मदिरा थी । प्रभु  को जानी वाकर की ब्लू लेवल व्हिस्की का भोग लगा सुंदर सुंदर महिलाये प्रभु से चिपक कर ऐसा नाच गा रही थी की पूछो मत । वो तो मै था जो प्रभु का पतित्व बचाकर उनको ले आया -  नंदी ने गर्व से कहा

अगले दिन सुबह जब प्रभु तैयार होकर निकल रहे थे तो माता ने टोका क्या बात है आजकल आप केवल अमीरो के यहां जाते हैं बाकी भक्तो ने क्या पाप किये हैं । पिछले कई सालों से आप किसी आदिवासी भक्त के बुलावे मे नही गये क्या आप अब  मेदभाव करने लगे हैं । प्रभु ने नंदी की झुकी हुई गरदन देख सारा माजरा समझ लिया । मुस्कुराकर माता से बोले क्या बिना कामदेव की मदद से तुम मुझे बहला पायी थी जो इस मक्कार की बातों मे आ रही हो । मेरे लिये स्त्री क्या पुरूष क्या मै तो जहां स्वादिष्ट भोग चढ़ता है और लोग प्रेम से बुलाते हैं वहीं चला जाता हूं । माता फ़िर भी अड़ी रहीं मै कुछ नही जानती पहले की बात और थी  कलयुग मे पतियो का कोई भरोसा नही है ।  जब तक मैं न कहूं आपको आदिवासियो के यहां ही जाना होगा  क्या आपको आदिवासी स्वादिष्ट चढ़ावा नही चढ़ाते ।

प्रभु ने आदिवासियो का चढ़ावा याद कर ठंडी सांस ली और बोले उनका चढ़ावा तो मुझे सबसे प्रिय है । बेल बेर आम जामुन शह्तूत गंगाइमली  धतूरा आदि नाना प्रकार के जंगली फ़ल , तरह तरह के कंदमूल, पलाश आदि फ़ूल , जंगली जड़ीबूटिया खाने वाली गायो का शुद्ध पीला दूध , महुआ सल्फ़ी आदी जड़ीबूटी मिश्रित मदिरा , चिरौंजी , दो वर्षो बाद खेत से निकाली हुई कुटकी का अनाज आहा इनके लिये तो मै स्वयं नारायण की दावत भी ठुकरा सकता हूं

प्रसन्न चित माता ने कहा फ़िर आज से तुम उनकी ही पूजा मे जाओगे । प्रभु ने बुझे मन से कहा प्रिये अब आदिवासी है कहां जो मै जाउं माता ने तुरंत रजिस्टर सामने किया ये देखो करोड़ो हैं । प्रभु ने कहा प्रिये अब ये केवल सरनेम के आदिवासी हैं । ये सब अब मिलो मे , खदानो मे और भवन निर्माण के कार्यो मे रत गरीब मजदूर हैं । इनके यहां जाउगा तो ३ रू. किलो वाला सरकारी चावल जहरीली शराब और किसी विवाह समारोह से उठाये हुये बासी फ़ूल ही मिलेंगे । दूध चढ़ायेंगे तो यूरिया मिला सब्जी देंगे तो जहर मिली । देवताओ के हिस्से का विष पीने के बाद अब मुझमे और विष पीने की ताकत नही

अचंभित माता ने कहा ऐसा कैसे हो गया अब ये सब अपना पुराना चढ़ावा क्यो नही ला सकते । जब मै आदिवासियो के यहा आपके साथ जाती थी तब तो वे बड़े खुशहाल लोग थे । शाम को वे कैसे भव्य नाचगाना करते थे उनमे से किसी ने  आपसे भोजन  नही मांगा था और वे कभी भूखे भी नही सोते थे । प्रभु ने जवाब दिया उनको भोजन देने वाला जंगल अब नही रहा प्रिये पूंजीवाद ने फ़ल और फ़ूलदार पेड़ो को  सफ़ाचट करके उनके बदले अपने मतलब के इमारती पेड़ जैसे सागौन धावड़ा साल नीलगिरी आदि लगा दिये । ये इमारती जंगल आदिवासियो और वन्यप्राणियो के लिये बांझ है । इनमे भोजन का एक दाना भी नही । नतीजतन ये आदिवासी मजदूर हो गये अब तुम बताओ जो खुद का पेट नही भर सकते उनपर मै अपना बोझ कैसे डालूं


माता भड़क गयी आप भी गजब भगवान हो जिन लोगो ने आपके भक्तो का ये हाल किया आप उनकी पूजा स्वीकार करते हो आपको शर्म नही आती । प्रभु उदास भाव से बोले तुम्ही बताओ भगवान को पूजा और भोग तो चाहिये न बिना भक्तो के भगवान है कहां । फ़िर प्रभु ने मुस्कुरा कर कहा मै तो हूं ही भोलेनाथ क्या रावण क्या राम मै तो हर किसी को वरदान दे देता हूं । कहो तुम इसी भोलेपन पर रीझ कर ही तो मुझसे विवाह करने आयी थी कि नही । रही बात पूंजीपतियो की इनके पाप का घड़ा भरने दो ऐसा जनसैलाब उठेगा कि इनको नानी याद आ जायेगी ।

हां तुम सरकारी अधिकारियों और नेताओं को समझा कर इन इमारती वनो को मूल प्राक्रुतिक वनो मे बदलवा सको तो देख लो । इससे आदिवासियो का जीवन फ़िर से खुशहाल हो जायेगा और मै इनका चढ़ावा  छोड़ कभी माडर्न भक्तिनियो के पास नही जाउंगा । माता जैसे जाने को तत्पर हुई तो प्रभु ने कहा - सुनो बाघ को लेकर मत जाना कही संसारचंद शिकार न कर ले । एक काम करो इस नंदी को ले जाओ वैसे भी ये चुगलखोर अब मेरे किसी काम का नही । प्रभु फ़िर धीरे से फ़ुसफ़ुसा कर नंदी से कहा जा बेटा सरकारी दफ़्तरो के चक्कर काट काट कर तेरे खुर न घिस गये तो मेरा नाम भी महादेव नही ।

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

श्री निरमा बाबा की चौथी आंख

निरमा बाबा की चौथी आंख


एक दिन सुबह सुबह पत्नी ने मेरे हाथो से झाड़ू लेकर गर्मागरम चाय की प्याली रख दी । आसन्न खतरे को भांप कर मै सर्तक हो गया । श्रीमती ने कहा सुनो आज कल मेरा समय खराब चल रहा है क्यो न किसी अच्छे बाबा की शरण मे चलें | मै मन ही मन भुनभुनाया झाड़ू पोछा मै कर रहा हूं और समय इनका खराब चल रहा है । श्रीमती ने निरमा बाबा की जानकारी दी बड़े पहुंचे हुये बाबा हैं टीवी चैनलो मे छाये रहते हैं । मैने बहुत समझाया कि बाबा लोगो का चक्कर बेकार है भाई केवल टोपी देते अरे उनमे ऐसी शक्तियां होती तो खुद का भला पहले करते काहे गरीबो से पैसे लेने की दरकार होती और ये टीवी वाले भी इनको नैतिकता से कोई लेना देना थोड़े है जिससे पैसा मिला उसको दिखा दिया । लेकिन समझाना व्यर्थ था पूरे तीन हजार रूपये बाबा के बैंक खाते मे जमा करके बाबा से उनके एक शिविर मे मिलने का नंबर लगा ।



पहुंचा तो देखा सैकड़ो की भीड़ थी संपर्क स्थल पर एक दादा टाईप के भक्त ने मनी रिसीट की जांच की और ससम्मान लाईन मे लगा दिया । नियत स्थान पर पहुचते ही मैने नजर घुमाई चारो ओर भक्ती का सागर हिलोरे मार रहा था वही कुछ मेरे टाईप के असंतुष्ट भी थे जो कि बलपूर्वक लाये गये थे । बाबा का कार्यक्रम शुरू हुआ सबसे पहले लाटरी लगी वाले अंदाज मे कुछ भक्तो ने बाबा का गुणगा्न शुरू किया किसी की लड़की की शादी बाबा के आशीर्वाद से हुई थी किसी का व्यापार रतन टाटा की तरह चमक गया था लाईने ऐसी बोल रहे थे कि मानो स्वयं कादर खान ने लिखी हो मैने मन ही मन अनुमान लगाया कम से कम 3000 प्रतिदिन लेते होंगे । उधर पत्नी ने विजयी निगाहो से मुझे देखा मानो मुझे उसका उपकार मानते हुये रात को आधा घंटा अतिरिक्त हाथ पैर दबाने का निर्देश दे रही हो ।

 खैर नये भक्तो का नंबर आया एक ने अपनी समस्या बताई उसके लड़के का मन पढ़ाई मे नही लगता था । बाबा ने पूछा गाय को रोटी देते हो जवाब मिला हां बाबा ,  पराठा खिलाते हो "हां बाबा" । मैने मन ही मन सोचा कि अब फ़से बाबाजी लेकिन बाबा भी महा ज्ञानी थे उनने पूछा ज्वार गेहूं और बाजरे की मिश्रित रोटी खिलाते हो  । अब इसका जवाब तो ब्रह्मा जी को भी न से ही देना पड़ता बेचारा भक्त क्या कहता । बाबा ने विजयी मुस्कान से कहा किरपा कैसे होगी रोज ३ रोटी खिलाया करो और फ़िर हाथ उठा कर आशिर्वाद दिया । भक्त भी खुशी खुशी  दंडवत हो गया । ऐसे ही बाबा किसी को आलू की चाट खाने या खिलाने बोल रहे थे तो किसी को नरियल बाटने और १०० फ़ुट दूर से ही उनकी शक्तीशाली किरपा भक्तो पर हो जा रही थी ।


अब हमारा नंबर आया भोली श्रीमती ने श्रद्धा पूर्वक सिर नवाया पीछे मै भी अनिच्छा से खड़ा हो गया बाबा ने पूछा क्या दिक्कत है बेटा श्रीमती ने जवाब दिया मेरे पति लेखक भी हैं पर जहां भी अपनी रचनाएं भेजते हैं मेल आ जाती है क्षमा कीजियेगा अभी हमारे यहां भुगतान की सुविधा नही है वैसे आप लिखते शानदार है ।आप ही बताओ बाबा पैसा ही नही मिलेगा तो बेचारा लेखक जियेगा कैसे । बाबा ने ध्यान से मेरी ओर देखा और अपनी चौथी आंख का प्रयोग कर मेरे चेहरे पर उभरी अश्रद्धा को भी पढ़ लिया और मुझे अपना पर्मानेंट चेला बनाने का प्रण कर लिया शायद उनको अपना प्रवचन लिखवाने के लिये किसी लेखक की दरकार रही होगी ।


बाबा ने पूछा क्यों मदिरा पीते हो पीछे से श्रीमती ने गर्व से कहा पीते थे बाबा पर मैने शादी के बाद छुड़वा दी है । बाबा ने पूछा आखिरी बार कब पी थी मैने श्रीमती की ओर देख भय से सूखे होठो पर जीभ फ़ेरी बाबा ने कहा डरो मत सही सही बोलो पत्नी भी जलती आखों से घूर रही थी मानो कह रही हो कि पीने मे शर्म नही आयी अब बताने मे लजा रहे हैं मैने धीरे से कहा दो हफ़्ते पहले । "कहां पी थी" मैने धीरे से जवाब दिया हिन्दी की दुर्दशा सम्मेलन मे गया था वहां । भुगतान किसने किया था अब गर्व करने की बारी मेरी थी  जी एक अमीर हिंदी प्रेमी ने । बाबा ने पूछा अपने पैसे से कब पी थी आखिरी बार मैने कहा पेड न्यूज के विरोध मे हुये सम्मेलन मे १ महिने पहले । बाबा मुसकुराये बेटा तू तो भोलेनाथ का भक्त है नही पियेगा तो किरपा कैसे होगी रोज तीन पैग पिया कर जब तक मुफ़्त मिले तो ठीक है पर ध्यान रहे पीना रोज है ।


मै ठगा सा खड़ा रह गया वाह ऐसे किरपालू बाबा और मै मूर्ख आज तक इनसे दूर था मै बाबा के चरणॊ मे दंडवत हो गया । अभी मुझ पर और कुपा होनी बाकी थी बाबा ने कहा बेटा एक बात ध्यान रहे घर मे झाड़ू पोछा कुछ भी किया तो तेरा भाग्य तुझसे रूठ जायेगा । मै आकंठ चीत्कार उठा "निरमा बाबा की" पुरा शिविर गूंज उठा सारे पुरूष भक्त बोल उठे "जय" मै कसम खा कर कह सकता हूं कि उसमे एक भी महिला की आवाज न थी । बाबा की भक्ती मे डूब कर मैने  तुरंत अगले शिविर के लिये नगद रसीद कटाई  ( अभी बर्तन धोने और खाना बनाने से मुक्ती मिलना बाकी जो था ) और सपत्नीक घर की ओर लौट चला ।

घर लौट कर मैने एक हफ़्ते तक स्वर्ग की अनुभूती की ऐसा लग रहा था मानो नीचभंग राजयोग स्वयं मेरी कुंडली मे उतर आया हो यहां तक की अड़ोसी पड़ोसी भी मुझसे जलने लगे थे कि एक दिन मैने अपने पैरो मे कुल्हाड़ी मार ली । हुआ कुछ ऐसा कि रात की ठीक से उतरी भी न थी और नींद भी मेरी खुली न थी कि  श्रीमती ने मुझसे पूछा क्यों जी क्या ये बाबा लोग सच्चे होते हैं मेरे मुह से निकल गया अरे सब पाखंडी है साले  भोले भाले लोगो को ठगते हैं बस क्या था मेरे उपर एक बाल्टी पानी पड़ा और हाथो मे झाड़ू थमा दिया गया । वो दिन है और आज का मै अपने आप को कभी माफ़ नही कर पाता हूं ।