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मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

चिरंतन कहानियाँ ।(अकबर-बिरबल)

चिरंतन कहानियाँ ।

http://mktvfilms.blogspot.com/2011/04/blog-post_05.html
(अकबर-बिरबल)
 
पहले के ज़माने में राजा और उनके मंत्री आधी रात को वेष बदल कर,प्रजा का हालचाल जानने के लिए,  रात्रि चर्या के लिए निकल पड़ते थे ।
 
ऐसे ही एक बार  शहनशाह अकबर और चतुर मंत्री  बिरबल, वेष बदल कर रात्रि नगर भ्रमण को निकल पड़े ।
 
सारी रात नगर भ्रमण करते-करते, सुबह होने को आई । अकबर और बिरबल काफ़ी थक गए थे और सुबह भी होने को आई थी । इतने में, उन्होंने नगर के बाहर एक साधु-संत की कुटीर देखी ।  थोड़ा विश्राम पाने के लिए, दोनों कुटीर के आंगन में, एक बड़े से पेड़ के नीचे बैठ गए । कुछ देर बाद, संत की कुटीर के पास उगे हुए मैया तुलसीजी के पौधे की ओर,बिरबल का ध्यान गया। तुलसीमैया को देखकर, बिरबल उठ खड़ा हुआ और उसके पास जाकर पौधे को श्रद्धा पूर्वक नमन करके उसकी प्रदक्षिणा करने लगा ।
 
बिरबल की ऐसी क्रियाएं देखकर, अकबर को मज़ाक सुझा उन्होंने अज्ञान जताते हुए बिरबल से पूछा," बिरबल इस सामान्य पौधे को नमन करके तुमने उसकी प्रदक्षिणा क्यों करी?"
 
बिरबल ने बादशाह को आदर-प्रेम के साथ समझाते हुए कहा,"जहाँपनाह, हमारे धर्म में उस पौधे को तुलसी मैया कहते हैं । हमारे इष्टदेव भगवान श्रीविष्णुजी को तुलसीमाता अति प्रिय हैं, इसलिए हम तुलसीजी को माता का दर्जा देकर उनको वंदन करते हैं, उसकी प्रदक्षिणा करते हैं । आप तो सर्व धर्म समान मानते हैं, अगर आप भी हमारी तुलसीमैया को वंदन करके प्रदक्षिणा करेंगे तो मुझे अच्छा लगेगा..!!"
 
पर न जाने क्यों, बादशाह आज बिरबल की मज़ाक उड़ाने के मुड़ में थे अतः, बिरबल की बात अनसुनी सी करके,  बिना कुछ कहे, वहाँ से उठकर, अकबर आगे  चल दिए ।
 
अपनी इतनी छोटी सी बात, बादशाह ने न मानी, यह देखकर बिरबल को बहुत बुरा लगा ,इसलिए मौन धारण करके, बिरबल भी अकबर के पिछे-पिछे चल पड़ा । कुछ देर के बाद, बिरबल की नाराज़गी को देखकर, अकबर को शर्म आ गई । बादशाह ने मन में सोचा," मुझे बिरबल के धर्म और आस्था की मज़ाक नहीं उड़ाना चाहिए। मुझ से बहुत बड़ी ग़लती हो गई ।" यह सोचकर बिरबल की नाराज़गी दूर करने के लिए बिरबल के साथ, बादशाह अन्य विषय पर बातें करने लगे । समय आने पर बादशाह को सबक सिखाने की मन में ठान कर, फिलहाल अपने मन को समझा कर, बिरबल भी, बादशाह के साथ सहज बर्ताव करने लगा । अब तो सूरज भी निकल आया था और नगर में रोज़ की तरह प्रजा की सामान्य चहल पहल भी शुरु हो गई थीं, अतः  बादशाह और बिरबल भी नगर में अपने-अपने निवास स्थान की और चलने लगे ।
 
अचानक रास्ते की एक ओर बिरबल ने, किसी जंगली वनस्पति का एक लता झुंड देखा । देखते ही मानो, बादशाह को `सर्वधर्म समभाव` का सबक सिखाने का एक अच्छा सा मौका बिरबल के हाथ लग गया । झट से बादशाह को थोड़ा सा इंतज़ार करने लिए कहकर, बिरबल ने उस जंगली वनस्पति की प्रदक्षिणा की और बादशाह की ओर अपनी पीठ करके, उस लता झुंड को गले लगा कर, उसके पत्ते को अपने बदन पर मसलने का सिर्फ अभिनय किया ।
 
बिरबल की ये अजीबो ग़रीब क्रियाएं देखकर,अकबर को मन ही मन हँसी ज़रुर फूटीं पर, उसने हँसी को होठों तक आने नहीं दी । अकबर के चेहरे पर मौन सवाल और आश्चर्य देखकर, बिना पूछे ही बिरबल ने अकबर को बताया," जैसे तुलसीजी, धर्म और आस्था के अनुसार हमारी `माता`  है, वैसे ही ये वनस्पति का ये लता झूंड हमारे धर्म अनुसार,`पिता` के समान है..!!"
 
अब तो अकबर के होठों पर हँसी के साथ सवाल फूट पडा," पर बिरबल, तुमने अपनी तुलसीमैया को सिर्फ नमन किया और यह पिताजी को अपने गले से लगाकर, उनको अपने बदन पर खूब रगड़ा..!! ऐसा क्यों?"
 
बिरबलने चेहरा गंभीर रखते हुए उत्तर दिया," हमारे धर्म के अनुसार `माता` को देवी स्वरूप मान कर, उनको सिर्फ नमन करने की परंपरा है और पिता को गले लगाकर, हम उनका बदन सहलाते हैं । मगर आप ये सब जानकर क्या करेंगे?  आप भी चाहे तो मेरे पिताजी को गले लगा सकते थे,मगर आप तो हमारे धर्म-आस्था की मज़ाक का आनंद उठा रहे हैं..!!  खैर, सुबह हो गई है..अब,च..लें?
 
बादशाह को लगा," बिरबल का कोई भरोसा नहीं ..!! बातों बातों में, भरे दरबार में, वह सब को बता देगा की, मैंने दूसरे धर्म का अपमान किया है? अब तो उसको खुश करने के लिए, बे-मन से ही सही पर, बिरबल ने  जो धार्मिक क्रिया अपने पिता के साथ की हैं, मुझे भी  उसे दोहराना चाहिए..!!"
 
अतः, बिरबल को खुश करने के लिए, अकबर  उस जंगली वनस्पति के लता झूंड़ के पास गया, उसकी प्रदक्षिणा करके, उसे गले भी लगाया और अपने बदन पर भी खूब रगडा..!!
 
आप सभी विद्वान साहित्यकार मित्रों को तो पता ही होगा की,  `कौंच` को छुने से खुजली होती है..!!
 
अकबर को सारे बदन में  बहुत खुजली होने लगी और साथ में पीड़ा भी..!! अकबर ने बदन को खुजलाते हुए, बिरबल से पूछा," अरे बिरबल तेरा ये कैसा बाप है, तुमने उसे गले लगाया तो तुम्हें कुछ असर न हुआ और मेरे सारे बदन को काट रहा है?"
 
बादशाह की ऐसी हालत देखकर, बिरबल ने  मुस्कुराते हुए  कहा," जहाँपनाह, लगता है आपने मेरी तुलसी माता का अपमान किया था उसी बात से नाराज़ और ग़ुस्सा होकर,  सज़ा देने के लिए, मेरे पिताजी आपको  बहुत काट रहे हैं। आइन्दा से किसी की भी धर्म या फिर आस्था का मज़ाक मत उड़ाना । "
 
बोध- किसी भी धर्म का मज़ाक नहीं करना चाहिए, ॥ सर्व धर्म एक समानाः ॥
 
मार्कण्ड दवे- दिनांक- ०५-०४-२०११.  

9 टिप्पणियाँ:

हा हा हा , सही सबक सिखाया

बढ़िया कहानी लिखी है

अपना धर्म सभी को प्रिय लगता है इसलिए किसी के धर्म का अपमान नहीँ करना चाहिऐ।

सबका अपना-2 धर्म होता हैँ

किसी धर्म का अपमान नही करना चाहिये

Interesting Story shared by you ever. Being in love is, perhaps, the most fascinating aspect anyone can experience. प्यार की कहानियाँ Thank You.

इससे ज्यादा बकवास और हो ही नहीं सकता।

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